10/07/2026
लुलावत पड़िहारो का जागीरी ठिकाना
सुरधना पड़िहारान बीकानेर जिले से मात्र 15 km दूरी पर स्थित लुलावत पड़िहार राजपूतों का जागीर का ठिकाना है मंडोर के शासक राणा रूपडोजी पड़िहार 6 भाई थे जिसमें 2 नंबर पर भाई राणा बलूजी पड़िहार थे राणा बलूजी पड़िहार राणा रूपडोजी के साथ मंडोर दहेज में देने के बाद वहां पलायन कर छायण गांव आ गए थे और वहां से पलायन कर बीकानेर की तरफ आ गए थे इनके दो पुत्र थे जिनमें एक का नाम राणा उदोजी पड़िहार और दूसरे का नाम राणा बूदोजी पड़िहार था और राणा उदोजी ने उदासर बसाया जो बीकानेर के निकट स्थित है और बूदोजी पड़िहार वहां पलायन कर गांव सुरधना पड़िहारान बसाया इस गांव की स्थापना लगभग सन 1636 में की गई थी और यह यह जागीरी ठिकाना था इस जागीर के अंतर्गत लगभग 12 गांव आते थे और इस ठिकाने के पास लगभग 8 हजार बीघा भूमि थी और और यहां के बुजुर्ग व्यक्तियों द्वारा बताया जाता है कि महाराजा गंगासिंह जी बीकानेर से चलकर यहां शिकार करने के लिए आते थे और अपने घोड़े यहां छोड़ते थे और बताया जाता है कि यहां पर एक महल था जिसे आम लोग महलायात कहकर पुकारते थे और दीपावली के दिन इस महलायत और जूनागढ़ किले पर दीपक जलते थे तो दिखाई देते थे क्योंकि यह महल और जूनागढ़ दोनो एक ही रेखा में स्थित है और यह पहले बड़ा महल था उसके बाद जब छपनिया अकाल पड़ा तब यहां के जागीरदार पड़िहार सरदारों ने प्रजा से कहा अब अन्न समाप्त हो गया है और आप इस महल की ईंट निकालकर बच दो और आप भी खाओ और हमें भी खिलाओ तब इस किले की ईंटें निकालकर बेची गई और जिनका उपयोग रामपुरिया हवेली बीकानेर में किया गया और अभी भी इस महल का कुछ भाग बचा हुआ जिसमें आज भी निवास करते है और एक साइड का भाग देखरख नहीं करने के कारण खंडहर बन चुका है इस ठिकाने में पुराने समय में कई व्यक्ति सरकारी पदों पर भी रहे चुके है और आज भी यहाँ की धरती बताती है कि यहां पर कई सतीया और जुझार भी हुए जिनकीआज भी मूर्तियां निकली हुई है जिनकी देखरख नहीं होने के कारण मिट रही है और यहां पर पानी की कमी आने पर यहां से कुछ पड़िहार भाई पलायन कर गये जिन्होंने आगे जाकर दुलचासर, सूरतसिंहपुरा, कोटासर, खारड़ा, राजपुरिया गांव बसाए और आज भी यहाँ काफी संख्या में निवास करते है अब सुरधना पड़िहारान में मीठा पानी है और यहां के पड़िहार कृषि कार्य पर निर्भर है