13/03/2026
ओम श्री गणेशाय नमः| श्री समर्थ सदगुरुदेव श्रीमान गिरी जी महाराज की जय हो, ओम नमः शिवाय, प्राकृत जगत अनित्य अपूर्ण और नाशवान है| अतः प्राकृतिक वस्तुओं स्थितियों में सुख की खोज करना वास्तव में मूर्खता ही है| यहां पर मनुष्य जो भी प्राप्त करता है , वह स्थाई नहीं होता है और उसका वियोग होना अवश्यंभावी है | वास्तव में सुख यहां पर उसी को मिलता है, जो जगत को भगवान में और भगवान को जगत में भरा देखता है |वही नित्य और पूर्ण परमानंद स्वरूप परमात्मा को देखता हुआ,अपने कर्मों को यथा विधि करता हुआ, सदाचार का पालन करता हुआ,अपने जीवन को आनंदमय बना लेता है| हमारा भारत देश पुरातन काल से ही ऋषि मुनियों का देश रहा है, जो कठोर आत्म संयम से अपनी इंद्रियों पर विजय प्राप्त कर लेते थे और अपने जीवन को तपस्यामय बनाकर परोपकार में अपना जीवन व्यतीत करते हुए जनकल्याण करते हुए हमारे देश की संस्कृति एवं संस्कारों को स्थायित्व रखने में प्रयासरत रहते थे, जो त्रिकालदर्शी थे जो भूत भविष्य और वर्तमान काल को जानने में समर्थ थे जो हमारे देश को सुशोभित करते थे हमारा आर्यावर्त भारत देश अनेक महिमामंडित तीर्थों की पुण्य स्थली है,जैसे उत्तराखंड में हरिद्वार, ऋषिकेश,बदरीनाथ धाम, केदारनाथ, गंगोत्री,यमुनोत्री, पूर्व में जगन्नाथ पुरी दक्षिण में रामेश्वर धाम,पश्चिम में द्वारकापुरी ऐसे हजारों तीर्थों से सुशोभित हो रहा है, जहां हम जाकरउन पुण्य तीर्थ स्थलों के दर्शन करके अपने आप को भाग्यशाली मानते हैं एवं आत्म शांति को प्राप्त करते हैं, हमारी पावन भारत भूमि पर स्वयं परब्रह्म परमात्मा भी अनेक रूपों में अवतरित होते आए हैं, वह भगवान पृथ्वी का भार उतारने, दुष्टों का संहार करने, धर्म की स्थापना करने, के लिए पृथ्वी पर अवतार धारण करते हैं, जिसका उल्लेख हमें पुराणों में ग्रंथों में एवं शास्त्रों में मिलता है, जिन को पढ़कर और समझ कर हमें सत्य के रास्ते पर चलने की प्रेरणा मिलती है, जिन को पढ़कर हम अपने जीवन में अपनाकर हमारे जीवन को धन्य बना लेते हैं| इसी तरह से ग्राम कुंवर कोटरी में श्री समर्थ सतगुरु देव श्री मान गिरी जी महाराज भी जन कल्याण के लिए अवतरित हुए हैं, जिन्होंने अपनी तपस्या एवं योग साधना के फल स्वरुप परब्रह्म परमात्मा को प्राप्त करके हजारों लाखों लोगों के नर्क में जीवन का उद्धार कर रहे हैं, आज से लगभग 500 वर्ष पूर्व ग्राम कुंवर कोटरी में एक बहुत बड़ा मठ था जहां पर अनेक साधु संत लोग योग साधना में रत रहते थे, उसी काल में समर्थ श्री सदगुरुदेव मानगिरी जी महाराज भी भगवान परमात्मा की प्राप्ति में लीन थे |भगवान के साक्षात्कार के उपरांत सद्गुरु ने समाधि लेने का निर्णय लिया और जहां पर आज गुरुदेव का मंदिर बना हुआ है वहां पर एक गड्ढा खोदने का लोगों को निर्देश दिया, लोगों द्वारा गहरा गड्ढा खोदा गया, गड्ढा बनने के उपरांत उसी में गुरुदेव ने अपना आसन लगा लिया, और गड्ढे को ऊपर से बंद करने का आदेश दिया, गड्ढे को बंद कर दिया गया, फिर अपने योग के बल पर समर्थ सदगुरुदेव हरिद्वार मां भागीरथी के पावन तटपर पहुंच गए, जहां पर कुंवर कोटरी के यात्री भी गए हुए थे, तब गुरुदेव ने उन लोगों से कहा कि आज से मेरी समाधि वाले स्थान की लकवा से पीड़ित लोग पांच परिक्रमा करेंगे उनकी लकवे की बीमारी ठीक हो जाएगी, ऐसा कहकर गुरु महाराज वहीं पर अंतर्ध्यान हो गए तभी से आज तक लकवा से पीड़ित लोगों का रोग दूर हो रहा है, पुराने जमाने में यह बीमारी बहुत कम लोगों को होती थी लेकिन आज के जमाने में यह बीमारी बहुत ज्यादा दृष्टिगोचर हो रही है, परंतु जो भी इस बीमारी से ग्रसित लोग कुंवर कोटरी गुरु महाराज के यहां पर आते हैं, वह पांच परिक्रमा करने मात्र से ही रोग से मुक्त हो जाते हैं, गुरुदेव की ऐसी असीम कृपा है कि वह देखते ही देखते दौड़ने लग जाते हैं, यहां आने के बाद और दर्शन करने के बाद ऐसा मान लेना चाहिए कि हम रोग मुक्त हो गए हैं, ऐसा अपने मन में अटल विश्वास होना चाहिए, जो लोग इस स्थान को अंधविश्वास का दर्जा देते थे वह भी अस्पतालों में जाकर लाखों रुपए लगाकर और येन केन प्रकारेण फिर उनको यही आना पड़ा और वह ठीक हो गए, अनेक दूर-दूर के भक्त लोगों को उनकी भावना एवं उनका विश्वास उनको यहां तक लाने में सफल हो जाता है, प्रत्येक गुरुवार को यहां विशाल भंडारा होता है एवं विशाल भक्तों का जनसमूह एकत्रित हो जाता है| दूर-दूर से आए हुए गायन विद्या में निपुण लोग गुरु महाराज के प्रति अपनी आस्थाओं को अपने भावों को भजनों के माध्यम से व्यक्त करते हैं| गुरु महाराज को प्रसन्न करने का प्रयास करते हैं, चारों तरफ गुरु महाराज के जयकारों से पूरा वायुमंडल शुद्धता को प्राप्त हो जाता है| अखंड रूप से प्रज्वलित कुंड का धुआँ सारे प्रदूषित वातावरण, एवं दूषित वायुमंडल को शुद्ध करने की क्षमता रखता है| जय-जय समर्थ सदगुरुदेव, सत्यम शिवम सुंदरम,
- ब्रजमोहन सक्सेना
कुंवर कोटरी