09/03/2021
खई के पान भवानीमंडी वाला - By: Kailash Jain, Advocate
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पान सदियों से हमारी सांस्कृतिक परंपराओं का अटूट हिस्सा रहे हैं। भोजन के बाद पान का सेवन न केवल भारत बल्कि संपूर्ण दक्षिणी पूर्वी एशियाई देशों पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, म्यांमार, मलेशिया, इंडोनेशिया और यहां तक कि वियतनाम तक में एक परंपरा के रूप में प्रचलित रहा है। हिंदू धार्मिक ग्रंथों में वेदों आदि में पान की पवित्रता का उल्लेख मिलता है। आज भी नामकरण, विवाह, यज्ञोपवीत, पूजा आदि अनुष्ठान में पान एक अनिवार्य वस्तु की तरह उपयोग होता है। मुगल काल में पान का संस्कृति बेहद फूली फली । मुखशुद्धि के इस साधन को संस्कृत में तांबूल, मराठी में नागवेल, गुजराती में नागुरबेल, तेलुगु में पक्कू कहा जाता है।
यूं तो पान की दुकानें हर शहर गांव में आज भी मौजूद है लेकिन आज न तो उस जमाने के पान मौजूद है न पान की दुकानें हैं और न ही पान के दीवाने वे लोग... गुटका पाउच ने पान के उस रसभरे संसार को लील लिया है।
इस मुख्तसर-सी भूमिका के बाद हम आपको लिए चलते हैं भवानीमंडी के नगर के लगभग आधी सदी पुराने पान संसार में.. आज शायद पान की कीमत 10 से ₹15 तक है लेकिन उस दौर में शानदार जायकेदार पान सिर्फ 10 पैसे मूल्य पर उपलब्ध था और शायद आज की पीढ़ी यह जानकर ताज्जुब करें कि पान के मुरीद दिन में बीस-बीस, पच्चीस-पच्चीस पान खाते थे ।
मीठा गुलकंद चटनी बाहर से युक्त पान महिलाओं और खासतौर पर बच्चों में खासा लोकप्रिय हुआ करता था। बच्चों को पान के एक पान के दो टुकड़े करके खिलाया जाता था। कई परिचित पान वाले ग्राहक के साथ आए बच्चे को मुफ्त पान देते थे।
पान के शौकीन अपने-अपने टेस्ट के मुताबिक पान खाते थे। पान की किस्मों में मीठा पत्ता, बांग्ला,देशी, मद्रास
आदि होती थी। मीठा पत्ता सबसे महंगा और मद्रास सबसे सस्ता माना जाता था। तंबाकू खाने वाले लोगों में कई लोग सिर्फ देसी तंबाकू सुपारी का पान खाते थे। तो कुछ लोग पीपरमेंट के शौकीन होते थे। ज्यादातर युवा पान में सुगंधित तंबाकू बाबा जर्दा( 90 नम्बर) या रत्ना ( 300 नम्बर) और किमाम से युक्त पान का सेवन करते। तंबाकू का पान खाने की शुरुआत करने वाले नैसिखिये मुस्कीदाने से सहज करते हैं, जो धीरे-धीरे जाफरानी पत्ती से होते हुए देसी तंबाकू तक पहुंचती ।
अब जिक्र उस दौर में भवानी मंडी की मशहूर पान की दुकानों का- स्टेशन तिराहे पर स्थित मस्ताना पान भंडार भवानीमंडी की सबसे पुरानी पान की दुकानों में गिनी जाती है। सोशलिस्ट पार्टी के दबंग नेता कन्हैयालाल मस्ताना की दुकान पर सुबह से रात तक नगर की मशहूर हस्तियों का तांता लगा रहता था। हाल के दिनों तक उनके पुत्र रमेश मस्ताना इस दुकान को संचालित किया करते थे। उनके निधन के बाद तीसरी पीढ़ी रमेश का पुत्र वासु मस्ताना पान भंडार पर बैठता है।
नजाकत मंजिल चौराहे पर भेरु का तमन्ना पान भंडार चर्चित पान की दुकानों में शुमार रहा है। बाद में यह स्टेशन रोड पर मेसर्स लक्ष्मीचंद माणकचंद लोढ़ा की दुकान के पास स्थानांतरित हो गया। नजाकत मंजिल के सामने स्थित इस गुमटी में स्वामीजी और बाद में मिट्ठनलाल जी सेब वाले के पुत्र द्वारा भी पान की दुकान चलाई गई । इन दुकान के ठीक सामने बद्री दादा का शर्मा पान भंडार होत था ।
नगर के उम्र दराज के लोगों की स्मृति में वर्तमान सत्यवीर मार्केट के स्थान पर मौजूद माहेश्वरी होटल अवश्य होगी। माहेश्वरी होटल के बाहर मामाजी की प्रसिद्ध पान की दुकान थी जो बाद के सालों में रामपुरावाले कड़ावतजी की दुकान में स्थानांतरित हो गई ।भंवरलाल हरकचंद की दुकान के सामने स्थित रामनिवासजी की दुकान भी भवानीमंडी की पुरानी पान की दुकानों में गिनी जाती थी। आजकल इस दुकान को उनके पुत्र हाडोती बैंक के पास संचालित कर रहे हैं।
वर्तमान में विजयराजे सिंधिया कॉम्प्लेक्स में स्थित भांग वाले मामाजी की पान की दुकान पहले सामने पूरणमल जी परतानी की होटल के बाहर चलती थी। इस दुकान पर रखी बंदर की मूर्ति आज भी मौजूद है। राधेश्याम मंदिर की दुकानों में भौजू पान वाले की दुकान भी भवानीमंडी की सर्वाधिक प्राचीन पान-शॉप में शामिल है। एक जमाने में नामी-गिरामी लोगों की भीड़ से यह दुकान आबाद रहती थी । भोजू के भाई नत्थू की पान की दुकान के मोहन टॉकीज के अंदर थी तो विजय टॉकीज के बाहर पंडित जी का मीठा पान मशहूर था । दाढ़ी वाले उपाध्यायजी की दुकान मोहन टॉकीज के सामने होती थी तो जागीरदारजी की दुकान के कोने में मोहन सिंधी की दुकान थी। कन्हैया स्वीट्स के बाहर फुटपाथ पर स्थित रामगोपालजी पोरवाल की पान की दुकान रात में सर्वाधिक देर तक खुली रहने वाली दुकान थी ।
विशाल होटल के नीचे मनोहर पान वाले की दुकान, राजेंद्र बुक डिपो वाले की दुकान के सामने लच्छू की प्रसिद्ध पान की दुकान, वर्तमान में मोतीलाल कन्हैयालाल की दुकान के स्थान पर राजस्थान बैंक था,उसके सामने सुंदरलालजी की होटल व बड़ के नीचे लालू की पान की दुकान थी।
एल एम लोढ़ा के सामने रेवाचन्द सिंधी व नन्द पान वाले की दुकानें प्रसिद्ध थीं। पास ही बावला पान भंडार था।
अदालत के पास गिरिराज की होटल के बाहर स्व. पुरुषोत्तम सोनी की दुकान थी। कालवा स्थान पर एक जमाने में उमाशंकर गुप्ता का पानी उत्तम क्वालिटी की सुपारी के लिए जाना जाता है। रोडवेज बस स्टैंड के साथ साथ पचपहाड़ वाले श्याम जी का महाराजा पान भंडार जैन मंदिर सामने, गुरूद्वारा के सामने कई सालों तक चलता रहा। तेज भवन के सामने लियाकत का पान भी लज्जतदार रहता था।
स्व जगदीश जी पोरवाल द्वारा स्थापित बाल निकेतन के सामने स्थित पान की दुकान पान की मशहर दुकानों में गिनी जाती है।पहले रेल्वे स्टेशन के पास मौजूद डायमंड पान भंडार आजकल सब्जीमंडी में चल रहा है । टगर मोहल्ले में हाई स्कूल के पास ओमजी पोरवाल की पान की दुकान भी काफी पुरानी है ।
अन्य कई पान की दुकान का अपना इतिहास रहा है। उनके नाम याद नहीं आ रहे हैं। आगामी संस्करण में शामिल किया जा सकता है ।
पान का कारोबार नकद के स्थान पर उधार में अधिक चलता था। तकरीबन हर दुकान पर ग्राहकों के पचासों खाते चला करते थे, जिनका हिसाब कहीं छह माह में तो कई साल भर में होता था ।
उस जमाने में पान के खास मुरीदो की सूची बहुत लंबी है, किंतु समय अधिक हो जाने से सारे नाम याद नहीं आ रहे हैं। फिर भी डॉक्टर शांतिलाल जी जैन, पी डी गुप्ता एडवोकेट,बालाबक्स बद्रीलाल के नन्दू दादा,नवनीत जी ,सत्तार भाई, हरिरामजी मुनीम, शोभाग जी दाल मिल वाले ,पूनमजी गोखरू, रामप्रतापजी जायसवाल, डॉ श्याममनोहरजी, केवलजी सोगानी ,भूदेवजी शर्मा गजराजजी जैन,अशोकजी शाह, वर्धमान जी गांग आदि उस जमाने के पान के खास मुरीदों में शुमार हैं।
भवानी मंडी में पान की दुकानों को पान के शौकीनों का यहआंशिक इतिहास है, इसे मात्र स्मृति के आधार पर आलेखित गया है । आवश्यक सुझाव प्राप्त होने पर संशोधन संभव है।
कैलाश जैन, एडवोकेट,
भवानी मंडी (राजस्थान)
9214551663