Sheth j.p government Ayurveda college

Sheth j.p government Ayurveda college this page is created for ayurveda doctors and students

26/09/2019
15/04/2018

આધુનિક તબીબી વિજ્ઞાન ની દ્રષ્ટિએ મોંઘા ઇન્વેસ્ટીગેશન અને મોટા નામવાળા ડિસીઝ ને આયુ. ચિકિત્સા શાસ્ત્ર માં નામજોગ વર્ણન શોધવું અઘરૂ છે... એટલે એની સિમ્પટોમેટીક રીલીફ મળે એવી જ ટ્રીટમેન્ટ જ આયુર્વેદ દ્વારા થઇ શકે છે... બાકી તો ... ચરક મહર્ષિ પણ કહે છે કે દરેક રોગ ના નિશ્ચિત નામ ના આવડે તો પણ ચિકિત્સકે મુંઝાવવું નહી... દોષ દુષ્ય સંમૂર્છના સમજી ને યુક્તિ લગાવવી...

ચિકિત્સક તો માત્ર શરીર ને વ્યાધિ વિકાર દૂર કરવામાં થોડીક સહાયતા કરે છે બાકી હિંલીગ પાવર તો શરીર નો પોતાનો જ હોય છે...

10/05/2017

चढ़ी हुई नस 10 सेकेंड में ऐसे उतारें

नस चढ़ना एक बहुत साधारण सी प्रक्रिया है, लेकिन जब भी शरीर में कहीं भी नस चढ़ जाए, जान ही निकाल देती है और अगर रात को सोते समय पैर की नस चढ़ जाए तो व्यक्ति चकरघिन्नी की तरह घूम कर उठ बैठता है, सूजन और दर्द अलग |

नस चाहे कही की भी हो पैर की हो या कोई और .इस स्थिति में दायें हाथ की उंगली दाहिने कान के नीचे की तरफ रखें और फिर आप हल्का सा दबाए हुए उंगली को उपर और नीचे गति दें और ये प्रक्रिया करीब 10 सेकेंड तक करते रहें |

इसमें ध्यान ये रखना है कि दिए हुए चित्र के अनुसार आप लंबाई में अपने शरीर को आधा आधा दो भागों में चिन्हित करें, अब जिस भाग में नस चढ़ी है उसके विपरीत भाग के कान के निचले जोड़ पर उंगली से दबाते हुए उंगली को हल्का सा ऊपर और हल्का सा नीचे की तरफ बार बार 10 सेकेंड तक करते रहें | नस उतर जाएगी |

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17/02/2017

Appendicitis (आंत्रपुच्छ प्रदाह ) का आयुर्वेदिक सफल उपचारइसके मुख्य कारण होता है लम्बे समय तक कब्ज़ का रहना , पेट में पलने वाला परजीवी व आँतों के रोग इत्यादि से अपेंडिक्स की नाली में रुकावट आ जाता है |भोजन में रेशे का न होना या कमी भी इस समस्या के लिए जिम्मेदार होताहै |यदि भोजन का कोई अंश आंत के शुरू के हिस्से में अटक कर सतह में पहुंच जाता है, तो वह अपेंडिक्स के वाल्व को बंद कर देता है। इसका परिणाम यह होता है कि सामान्यतः अपेंडिक्स से जो एक विशेष प्रकार का स्राव होता है, उसके निकलने का मार्ग अवरुद्ध होने से वह बाहर नहीं निकल पाता और अंदर ही सड़ने लगता है, जिसके कारण अपेंडिक्स में सूजन आ जाती है। इस तरह जब अपेंडिक्स संक्रमण ग्रस्त हो जाता है,तो अपेंडिसाइटिस रोग कहलाता है। अपेंडिसाइटिस का यह रोग शाकाहारियों की अपेक्षा मांसाहारियों को अधिक होता है और उन पर उसका असर भी अधिक तीव्र और भयंकर होता है। अमरूद, नींबू, संतरा आदि फलों के बीज, या किसी अन्य बाहरी वस्तु का अपेंडिक्स में फंस या रुकजाना, संक्रमण पैदा करने वाले जीवाणुओं का उस जगह पर पहुंच जाना, अपेंडिक्स में कठोरता पैदा हो जाना, क्षय रोग में जीवाणुओं द्वारा अपेंडिक्स का संक्रमित हो कर उसमें ट्यूबर सृदश आकृतियां बन जाना, अपेंडिक्स में कैंसर या अन्य प्रकार की रसौली उत्पन्न हो जाना, अपेंडिक्स के स्थान पर चोट आदि लग जाना, पुराना कब्ज संकोचक, गरिष्ठ और दोषयुक्त आहार का सेवन करना, अपेंडिक्स सिकुड़ जाना, उसमें रुकावट उत्पन्न हो जाना अपेंडिसाइटस के कारण होते हैं।पेट के दायें भाग में नाभि से हटकर लगभग 6 सेमी की दूरी तक दर्द होता है। यह दर्द कभी कम तो कभी तेज होने लगता है यहां तक कि हिलने डुलने से दर्द और तेज हो जाता है।आंत्रपुच्छ यानी अपेंडिक्स की चिकित्सा आयुर्वेद में औषधी द्वाराभी की जा सकती है। मगर आपातकालीन में तो शल्य (सर्जिकल) चिकित्सा ही सही है।भोजन तथा परहेज :पथ्य : पूरा आराम करना, फलों का रस, पर्लवाली, साबूदाना और दूसरे तरल पदार्थ खायें। रोटी न खायें, दस्त की दवा लेना, खटाई, ज्यादा तेल से बने चटपटे मसालेदार चीजें न खायें।बनतुलसी :बनतुलसी को पीसकर लुगदी बना लें किसी लोहे की करछुल पर गर्म करें (भूनना नहीं है) उस पर थोड़ा-सा नमक छिड़क दें और दर्द वाले स्थान पर इस लुगदी की टिकिया बनाकर 48 घंटे में 3 बार बदल कर बांधें। रोगी को इस अवधि में बिस्तर पर आराम करना चाहिए। इस चिकित्सा से 48 घंटे में रोग दूर हो जाता है। इसके पत्ते दर्द कम करते हैं। सूजन कम करते हैं। सूजन व दर्द वाले स्थान पर इसका लेप करने से फायदा होता है।गाजर :आंत्रपुच्छ प्रदाह में गाजर का रस पीना फायदेमंद है। काली गाजर सबसे ज्यादा फायदेमंद है।दूध :दूध को एक बार उबालकर ठंडा कर पीने से लाभ होता है।टमाटर :लाल टमाटर में सेंधानमक और अदरक डालकर भोजन के पहले खाने से फायदा होता है।इमली :इमली के बीजों का अन्दरूनी सफेद गर्भ (गिरी) को निकालकर पीस लें। बने लेप को मलने और लगाने से सूजन में और पेट फूलने में आराम आता है।गुग्गुल :गुग्गुल लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग से 1 ग्राम की मात्रा में सुबह शाम गुड़ के साथ खाने से फायदा होता है।सिनुआर :सिनुआर के पत्तों का रस 10 से 20 ग्राम सुबह-शाम खाने से आंतों का दर्द दूर होता है। साथ ही सिनुआर, करंज, नीम और धतूरे के पत्तों को एक साथ पीसकर हल्का गर्म-गर्म जहां दर्द हो वहां बांधने से लाभ होता है।नागदन्ती :नागदन्ती की जड़ की छाल 3 से 6 ग्राम सुबह-शाम निर्गुण्डी (सिनुआर) और करंज के साथ लेने से आंतों के दर्द में लाभ होता है। यह आंत में तेज दर्द हो या बाहर से दर्द हो हर जगह प्रयोग किया जा सकता है। यह न्यूमोनिया, फेफड़े का दर्द, अंडकोष की सूजन, यकृत की सूजन तथा फोड़ा आदि में फायदेमंद है।रानीकूल (मुनियारा) :रानीकूल की जड़ का चूर्ण 3 से 6 ग्राम सुबह-शाम लेने से लाभ होता है। इससे आंत से सम्बन्धी दूसरे रोगों में भी फायदा होता है। इसका पंचांग (जड़, तना, फल, फूल, पत्ती का चूर्ण) फेफड़े की जलन में भी फायदेमंद होता है।हुरहुर :पेट में जिस स्थान पर दर्द महसूस हो उस स्थान पर पीले फूलोंवाली हुरहुर के सिर्फ पत्तों को पीसकर लेप करने से दर्द मिट जाता है।राई :पेट के निचले भाग में दायीं ओर राई पीसकर लेप करने से दर्द दूर होता है। मगर ध्यान रहे कि एक घंटे से ज्यादा देर तक लेप लगा नहीं रहना चाहिए। वरना छाले भी पड़ सकते हैं.पालक का साग :आंत से सम्बन्धित रोगों में पालक का साग खाना फायदेमंद है।चौलाई :चौलाई का साग लेकर पीस लें और उसका लेप करें। इससे शांति मिलेगी और पीड़ा दूर होगी।बड़ी लोणा :बड़ी लोणा का साग पीसकर आंत की सूजन वाले स्थान पर लेप लगायें या उसे बांधें। इससे दर्द कम होता है और सूजन दूर होती है।चांगेरी :चांगेरी के साग को पीसकर लेप बना लें और उसे पेट के दर्द वाले हिस्से में बांधें। इससे लाभ होगा।

05/05/2016
farewell function of intern doctors....
10/01/2016

farewell function of intern doctors....

24/10/2015

Yoga for Different Body Types or Doshas

Whether it is food, lifestyle or exercise, the first question is – what is the correct practice for each individual? People have started realizing that each individual is unique, hence the attention needed by each one is very different from the others. The diet which is appropriate for one individual, however complete and wholesome, may not be good for another. Herbs, lifestyle and even exercise need individualized attention.

Every person has different physical, mental and even spiritual capabilities and capacities that require specialized attention. One needs to know what works for each of us, what our body type is and what kind of Yoga we should practice.

Body Types or Doshas

Vata Dosha

People with a dominant Vata Dosha are very creative, imaginative and spontaneous. On the other hand they can also get quite restless due to the principle of movement. Physically they are thin, lean, sometimes may have dry skin and scanty hair. They like warmth and try to avoid cold and dry temperatures. Appetite is quite irregular to an extent where they may even forget to eat food. Although very friendly by nature, they can sometimes get quite jealous and possessive. Their hobbies are art, music, reading, travelling and anything that sets their mind on the imagination trip. All artists are generally Vata dominant.

Pitta Dosha

Persons with Pitta as the dominant Dosha are authoritative, determined, focussed in life. On the other hand they can also get quite angry, demanding and irritated at the smallest mistake. This is due to the dominant element of fire in their constitution. Physically they are moderate built, with warm and soft skin. They generally prefer a cool atmosphere and get sun burnt when under the sun for a long time. Their appetite and thirst are strong and tend to eat several small meals throughout the day. Their hobbies are quite intellectual which also include chess. They generally like all kinds of sports which include

Vd damaniya sir comes in our clg for lecture..
01/10/2015

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