प्रवाह

प्रवाह Contact information, map and directions, contact form, opening hours, services, ratings, photos, videos and announcements from प्रवाह, Social service, Bharatpur.

31/08/2024

अगली बार किसी रेस्टोरेंट में जाने से पहले सोचियेगा..!!

कुछ दिन पहले एक परिचित मित्र मुझे पार्टी के लिये एक मशहूर रेस्टोरेंट में ले गये।

मैं अक़्सर बाहर खाना खाने से कतराता हूँ किन्तु मित्र का सामाजिक दबाव तले जाना पड़ा।

आजकल पनीर खाना रईसी की निशानी है इसलिए उन्होंने कुछ डिश पनीर की ऑर्डर की।

प्लेट में रखे पनीर के अनियमित टुकड़े मुझे कुछ अजीब से लगे। ऐसा लगा की उन्हें कांट छांट कर पकाया है।

मैंने वेटर से कुक को बुलाने के लिए कहा, कुक के आने पर मैंने उससे पूछा पनीर के टुकड़े अलग अलग आकार के व अलग रंगों के क्यों हैं तो उसने कहा ये स्पेशल डिश है।

मैंने कहा की मैँ एक और प्लेट पैक करवा कर ले जाना चाहता हूं लेकिन वो मुझे ये डिश बनाकर दिखाये।

सारा रेस्टोरेंट अकबका गया...?

बहुत से लोग थे जो खाना रोककर मुझे देखने लगे...

स्टाफ तरह तरह के बहाने करने लगा। आखिर वेटर ने पुलिस के डर से बताया की अक्सर लोग प्लेटों में खाना,सब्जी सलाद व रोटी इत्यादी छोड़ देते हैं।

रसोई में वो फेंका नही जाता। पनीर व सब्जी के बड़े टुकड़ों को इकट्ठा कर दुबारा से सब्जी की शक्ल में परोस दिया जाता है।

प्लेटों में बची सलाद के टुकड़े दुबारा से परोस दिए जाते है । प्लेटों में बचे सूखे चिकन व मांस के टुकड़ों को काटकर करी के रूप में दुबारा पका दिया जाता है। बासी व सड़ी सब्जियाँ भी करी की शक्ल में छुप जाती हैं...

ये बड़े बड़े होटलों का सच है। अगली बार जब प्लेट में खाना बचे तो उसे इकट्ठा कर एक प्लास्टिक की थैली में साथ ले जाएं व बाहर जाकर उसे या तो किसी जानवर को दे दें या स्वयं से कचरेदान में फेकेँ

वरना क्या पता आपका जुठा खाना कोई और खाये या आप किसी और कि प्लेट का बचा खाना खाएं।

एक बार मैं दिल्ली गया था एक यजमान के बुलाने पर उनके साथ.....

लंबी यात्रा के बाद हम सभी को कड़ाके की भूख लगी थी सो एक साफ से दिखने वाले रेस्टोरेंट पर रुक गये । समय नष्ट ना करने के लिए खाना मंगाई गया....

एक साफ से ट्रे में दाल, सब्जी,चावल, रायता व साथ एक टोकरी में रोटियां आई।

पहले कुछ कौर में ध्यान नही गया फिर मुझे कुछ ठीक नही लगा। मुझे रोटी में खट्टेपन का अहसास हुआ, फिर सब्जी की ओर ध्यान दिया तो देखा सब्जी में हर टुकड़े का रंग अलग अलग सा था। चावल चखा तो वहां भी माजरा गड़बड़ था।

सारा खाना छोड़ दिया।

फिर काउंटर पर बिल पूछा यो 650 का बिल थमाया।

मैंने कहा 'भैया! पैसे तो दूँगा लेकिन एक बार आपके रसोई देखना चाहता हूं" वो अटपटा गया और पूछने लगा "क्यों?"*

मैंने कहा "जो पैसे देता है उसे देखने का हक़ है कि खाना साफ बनता है या नहीँ?

इससे पहले की वो कुछ समझ पाता मैंने होटल की रसोई की ओर रुख किया।

आश्चर्य की सीमा ना रही जब देखा रसोई में कोई खाना नहीं पक रहा था। एक टोकरी में कुछ रोटियां पड़ी थी। फ्रिज खोला तो खुले डिब्बों में अलग अलग प्रकार की पकी हुई सब्जियां पड़ी हुई थी।

कुछ खाने में तो फफूंद भी लगी हुई थी।*

फ्रिज से बदबू का भभका आ रहा था।

डांटने पर रसोइये ने बताया की सब्जियां करीब एक हफ्ता पुरानी हैं। परोसने के समय वो उन्हें कुछ तेल डालकर कड़ाई में तेज गर्म कर देता है और धनिया टमाटर से सजा देता है।

रोटी का आटा 2 दिन में एक बार ही गूंधता है।

कई कई घण्टे जब बिजली चली जाती है तो खाना खराब होने लगता है तो वो उसे तेज़ मसालों के पीछे छुपाकर परोस देते हैं। रोटी का आटा खराब हो तो उसे वो नॉन बनाकर परोस देते हैं।

मैंने रेस्टोरेंट मालिक से कहा कि "आप भी कभी यात्रा करते होंगे, इश्वेर करे जब अगली बार आप भूख से बिलबिला रहे हों तो आपको बिल्कुल वैसा ही खाना मिले जैसा आप परोसते हैं

उसका चेहरा स्याह हो गया....

आज आपको खतरो, धोखों व ठगी से सिर्फ़ जागरूकता ही बचा सकती है क्योंकी भगवान को भी दुष्टों ने घेर रखा है।

भारत से सही व गलत का भेद खत्म होता जा रहा है....

हर दुकान व प्रतिष्ठान में एक कोने में भगवान का बड़ा या छोटा मंदिर होता है, व्यपारी सवेरे आते ही उसमे धूप दीप लगाता है, गल्ले को हाथ जोड़ता है और फिर सामान के साथ आत्मा बेचने का कारोबार शुरू हो जाता है!!!

भगवान से मांगते वक़्त ये नही सोचते की वो स्वयं दुनिया को क्या दे रहे हैं....!!

जागरूक बनिये...!!
और कोई चारा नही है...!!

स्वस्थ रहे मस्त रहे, जागरूक बने 😃😊

26/08/2024

बंदीगृह के तालों के टूटने से अधिक कठिन उस भय का टूटना था, जो वर्षों से एक दुष्ट की कैद में पड़े पड़े अपने सामने अपने छह पुत्रों की बलि देख चुके पति-पत्नी के हृदय में स्थायी रूप से बसा हुआ था। सोचिये न, कितना कठिन रहा होगा नवजात बच्चे को गोद में उठा कर नन्दगाँव पहुँचाने की सोच भी लेना! कहीं किसी सैनिक की नींद खुल गयी, तो? युगों बीत गए अंधेरे कमरे में रहते रहते, नन्दगाँव की राह भूल गए तो? हजारों प्रश्न पैरों की बेड़ी बन कर रोक रहे होंगे न? पर उस पिता ने एक झटके में सारी बेड़ियों को तोड़ा और निकल पड़े।
भादो के भयावह मेघ बरस रहे थे। कुछ क्षण पहले जन्मा बालक उस भयानक बारिश में भीग रहा था, और पिता उसे शीश पर उठाए भागे जा रहे थे। कौन पिता अपने नवजात को भादो की बरसात में लगातार भिगोने की सोच पायेगा जी? पर उन्होंने इस भय को भी ठोकर मारी और दौड़ते रहे।
राह में यमुना मिलीं। अपने प्रचंड वेग से बहती यमुना! भादो के महीने में बढियायी यमुना! उसमें अकेले उतरने की सोच कर भी कांप जाय आदमी, फिर अपने नवजात बालक को लेकर? ऊपर से अंधेरी रात... सांप, घड़ियाल, मगरमच्छ... उन्होंने इस भय को भी ठोकर मारी और उतर गए।
जल बढ़ता जा रहा था। कमर से बढ़ कर पेट तक, पेट से बढ़कर छाती तक, छाती से गर्दन तक... साक्षात मृत्यु के मुख में घुसे थे वसुदेव जी! रुक जाँय? लौट पड़ें? किसी दूसरे गांव में पहुँचा दें? मन में ऐसे भाव भी आ सकते थे न? पर वे रुके नहीं। वह जो माथे पर बालक था, जिसे बचाने के लिए भाग रहे थे, उसी का भरोसा भी था।
सोचिये तो! जिसके प्राण बचाने के लिए यमुना में कूद पड़े हैं, उसी से उम्मीद है कि प्राण बचा लेगा? कितना विरोधाभाष है न? पर जीवन में ऐसा भी होता है, और खूब होता है। याद रखिये, धर्म जब सूप में पड़े उस नवजात बालक की तरह शक्तिहीन दिखे, तब भी उसपर भरोसा बनाये रखना है। वह शक्तिहीन दिखता भर है, होता नहीं है।
हाँ तो वे यमुनाजी को पार कर गए। भागते भागते मित्र के गाँव पहुँचे, उनके घर पहुँचे, अपने बालक को वहाँ रखा और उनकी कन्या को लेकर लौट आये... फिर उसी बंदीगृह में, उसी अंधेरी कोठरी में, उसी दैत्य के अधिकार में...
उस दिन के तिरासी वर्ष बाद! उस समर भूमि में जहाँ संसार के समस्त योद्धा अपने सर्वश्रेष्ठ अस्त्र-शस्त्रों के साथ युद्ध के लिए तैयार खड़े थे, वे सबके मध्य निहत्थे खड़े होकर कहते हैं, मामेकं शरणम व्रज! मेरी शरण में आओ अर्जुन, इसी में संसार की भलाई है। वे कहते केवल अर्जुन से हैं, पर सन्देश समस्त योद्धाओं के लिए है। मेरी शरण में आओ तभी बचोगे, अन्यथा नाश हो जाएगा सब का...
इस कथा को मानवीय दृष्टि से देखिये, महाभारत के धर्मक्षेत्र में खड़े संसार के सबसे प्रभावशाली व्यक्ति के देवत्व में उस भयभीत पिता का भी योगदान है, जिन्होंने उस भयानक रात्रि में भय के बंधन को तोड़ते हुए हहराती यमुना में उतरने का निर्णय लिया था।
इस संसार में भगवान श्रीकृष्ण के जीवन से अधिक मोटिवेशन कही नहीं। कहीं भी नहीं।
कृष्ण यूँ ही नहीं मिलते। मृत्यु की आंखों में आंख डाल कर यमुना में उतरने का निर्णय लेना पड़ता है। उनके ऊपर भरोसा कर के भय को मारिये, वे यहीं हैं। यह उन्ही का देश है और हम उन्हीं की संतान... वे हमें कभी छोड़ ही नहीं सकते।

Address

Bharatpur
321001

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when प्रवाह posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Share

Category