06/08/2020
जीवन की वास्तिविक पहचान के क्या मायने होते है?
So Let's Begin.... कृपया पूरा पढ़े कुछ सीखने को अवश्य मिलेगा।
सबसे पहला सवाल यही है कि क्या जीवन मैं कुछ भी चीज पूर्ण रूप से सही या गलत होती है और अगर कोई भी चीज सही या गलत होती भी है तो उसे सही और गलत ठहराने के मापदंड क्या होते हैं? आदर्शवाद वैसे तो समाजशास्त्र और राजनीतिशास्त्र विषय की एक विचारधारा है लेकिन इसका सीधा सा संबंध हम सबके व्यवहारिक जीवन से ही होता है।
यह सिद्धांत स्पष्ट रूप से इस बात पर जोर डालता है कि जीवन में सबकुछ नैतिक मूल्यों के अनुसार उचित ही किया जाना चाहिए लाइफ मैं कभी भी गलती नहीं करनी चाहिए लेकिन अब सवाल यहां पर यह है कि क्या जीवन को इस विचारधारा के अनुसार हमेशा नैतिक मूल्यों के हिसाब से जिया जा सकता है? मैं अपने जीवन के पिछले 5 सालों के तार्किक अनुभव के आधार पर कहना चाहूंगा कि जीवन हमेशा आदर्शवादी सिद्धान्तों के अनुसार जी पाना कभी भी पूर्ण रूप से संभव नहीं हो सकता क्योंकि जीवन का पथ एक सीधी रेखा मैं होता ही नहीं है जीवन मैं कई बार ऐसे पड़ाव आ ही जाते हैं जहाँ इंसान को अपने मूल्यों के साथ भी ज्यादा ना सही लेकिन कुछ समय के लिए समझौता करने पर मजबूर होना ही पड़ जाता है। अच्छा खासा इंसान जिसके पास मजबूत तर्कशक्ति और सकारात्मक विचारों का असीम भण्डार होने के बावजूद भी जीवन मैं आने वाले अनचाहे विपरीत परिस्थितियों के तूफान मैं खुद को स्थिर नहीं रख पाता है कहने का भावार्थ यही है कि कोई भी इंसान कितना भी मजबूत क्यों न हो लेकिन जीवन के कई पड़ावों पर समय की असीम शक्ति के सामने धाराशाही हो जाता है और वह बुरी तरह से बिखर जाता है उसे सबकुछ निराशा के सागर में विलीन होता हुआ प्रतीत होता है। मेरा मानना है कि ताकतवर हम नहीं समय होता है वो एक जटके मैं आपको अर्श से फर्श पर ला सकता है इतिहास की गोद मैं ऐसे कितने अनगिनत उद्धरण नहीं होंगे जो समय की एकात्मक असीम सत्ता की प्रामाणिकता को साबित नहीं करतें हैं।
इसलिए हमें कभी भी भौतिकवादी उपलब्धियों के आधार पर "मैं" होने का गुमान भूलकर भी नहीं करना चाहिए क्या पता समय की मार का अगला कोड़ा आप पर पड़ जाए। मानव समाज को अपनी आधुनिकता पर बहुत गुमान होता है ना लेकिन आज एक छोटे से कोरोना वायरस ने पूरी दुनिया को हिला के रख दिया है अमेरिका और यूरोपीय देशों के इतना ताकवर होने के बावजूद इस छोटे से वायरस के प्रभाव से धराशायी हो चुके है अमेरिका अब तक चिकित्सा के क्षेत्र में दिए जाने वाले दुनिया के सबसे बड़े नॉबेल पुरुस्कार को पाने मैं अग्रणी रहता हुआ आया है लेकिन आज इस देश में 1 लाख से ज्यादा लोग अपनी जान गवा चुके हैं।
मैं इस उदहारण के द्वारा बस यहीं बताना चाहता हूं कि इंसान की अपनी सीमाएं होती हैं कभी भी अल्प लाभ की वजह से गुमान नहीं करना चाहिए।
दूसरा मैं यही कहूंगा कि जीवन में गलत रास्ते को अपनाना बहुत आसान होता है हमें एक छोटा सा विचार ही हमारे पूरे अनुशासित जीवन को एक झटके में बिगाड़ सकता है इसलिए भटकना बहुत आसान होता है और और परिस्थिति में सही रास्ते पर चलना बहुत कठिन होता है ज्यादातर लोग सही रास्ते की शुरुआती मुसीबतों से घबराकर उस रास्ते को छोड़ देते हैं लेकिन जो व्यक्ति उस रास्ते के शुरुआती भय से लड़ने का निश्चय करके आगे बढ़ने का अडिग निर्णय लेता है वो अंत मैं विजयी भी बनता है। इसलिए फैसला हमें करना होता है कि हमें जीवन में कौनसा रास्ता और क्यू चुनना चाहिए?
आखिरी सवाल सफलता के मायने क्या होने चाहिए?
क्या सिर्फ एक नौकरी प्राप्त करके शादी करके सैटल हो जाना ही सफलता का मापदंड ठहराया जा सकता है? अच्छा घर, अच्छी गाड़ी और अच्छी लाइफ स्टाइल ही सफलता के घोतक होते हैं?अगर ऐसा है तो क्या कार्लमार्क्स जिनके पास जीवन के आखिरी समय में अपनी रचनाओं को छपवाने के लिए भी पैसे नहीं थे, या फिर अम्बेडकरजी जो एक शानदार बैरिस्टर होने के बाद भी अपने बच्चों को इलाज के अभाव मैं बचा नहीं पाए ,या फिर गांधीजी जिन्होंने लगभग 28 साल तक एक धोती पहनकर ही जीवन निकाल दिया और लगभग 5 से 6 साल जेल मैं बिता दिए और जीवन के अंत मैं एक चरमपंथी के द्वारा गोली से मार दिए गए, या फिर एक 23 साल का लड़का जो शादी करने से यह कहकर इनकार कर देता है कि शादी तो कोई भी कर सकता है लेकिन देश के के लिए हर कोई अपनी जान न्यौछावर नहीं कर सकता और अंत मैं वो देश के लिए अपने साथियों के साथ 23 साल की उम्र में हँसते हँसते फाँसी के फंदे पर चढ़ जाता है, मैं ऐसे कई और उदहारण दे सकता हूं जिन्होंने देश और समाज के लिए अपनी सभी खुशिओं को त्याग दिया। तो मूल सवाल यही उठता है कि क्या इन सबके पास नोकरी ,बड़ा घर या गाड़ी बंगला था अगर नहीं था तो क्या ये सब लोग असफल घोषित कर दिए जाएंगे? सोचना आपको है कि आपके लिए सफलता के मापदंड क्या होंगे? क्या सिर्फ भौतिकवाद ही तुम्हारी सफलता का घोतक होगा?
निष्कर्ष- इस पोस्ट के आखिरी मैं यहीं कहना चाहूंगा कि कोई भी इंसान परफेक्ट नहीं होता हम सब मैं हमेशा कुछ न कुछ कमियां मौजूद रहती हैं इसलिये हमें हमेशा आलोचनात्मक आत्मविश्लेषण की प्रवृत्ति खुद के अंदर ढालनी होगी । हमें किसी के बारे में जजमेंटल होने से बचना चाहिए।
जीवन में परिपक्वता की निशानी विनम्रता के बिना हमेशा अधूरी होती है इसलिए हमें हमेशा अपने व्यवहार में विनम्र होना चाहिए अपने से अलग विचारों को भी सहमति के साथ सम्मान देना चाहिए। इंसान के लिए मानवीय प्रेमभाव की प्रेरणा हमेशा अनिवार्य होनी चाहिए।
आखिर में उन सभी लोगों को मैं ह्रदय से आभार प्रकट करता हूं जिन्होंने भी "Project Change" की मुहिम को समझ कर आगे आकर हर सम्भव मदद प्रदान करने का आश्वासन दिया है। देखो हमारा किसी पर भी कोई दबाव नहीं हैं कि आप सामाजिक हित के लिए डोनेशन दे ये आपकी स्वेच्छा का विषय की आप सहयोग करें या न करें। क्योंकि आपका पैसा हमारी पूरी टीम के किसी भी मेंबर को नहीं कि चाहिए। बस जितना मैंने पढ़ा व समझा है और बहुत बड़े महानायकों ने भी अनुभवों से बार बार यही दोहराया है कि पैसे का महत्व तब ही मुल्यवान होता है जब हम गरीब और असहाय लोगों के हक़ के लिए लड़े।
उम्मीद करता हूं की आप इस ब्लॉग को पढ़कर और थोड़ा ठहरकर इन विचारों के बारे चिंतन करके खुद पर लागू करेंगे। अंत में यही कहना चाहूंगा कि अपनी प्रतिक्रिया ज़रूर दें। आपकी छोटी सी प्रतिक्रिया Project Change लिए बहुत मायने रखेगी।
शुक्रिया !
Kripal Singh