11/06/2026
बिहार की राजनीति में नेपोटिज्म: विरासत का बोझ
बिहार की राजनीति नेपोटिज्म (परिवारवाद) की जंगली आग में जल रही है। इसकी सबसे नई और चर्चित मिसाल है नीतीश कुमार के इकलौते बेटे निशांत कुमार का राजनीतिक उदय। इंजीनियरिंग की डिग्री लेकर आए निशांत को कुछ ही समय में जेडीयू में अहम पद और स्वास्थ्य मंत्री जैसी जिम्मेदारी सौंपी गई। पिता की सत्ता और संगठन का सहारा लेकर वे बिना किसी लंबे संघर्ष या साबित प्रदर्शन के सीधे सत्ता के केंद्र में पहुंच गए। यह बिहार के युवाओं के लिए स्पष्ट संदेश है — मेरिट नहीं, रक्त संबंध मायने रखता है।
यह परंपरा नई नहीं है। लालू प्रसाद यादव के परिवार ने तो इसे और भी खुलेआम अपनाया। उनके बेटे तेजस्वी यादव उपमुख्यमंत्री बने, तेज प्रताप यादव मंत्री रहे — परिवार के लगभग हर सक्रिय सदस्य को राजनीति में जगह मिल गई। राजद पूरी तरह परिवारवादी पार्टी बन चुकी है। इसी तरह कांग्रेस, बीजेपी और अन्य छोटे दलों में भी नेता अपने बेटे-बेटियों, भतीजों और रिश्तेदारों को टिकट और पद देते दिखते हैं। बिहार की राजनीति अब ‘परिवार की संपत्ति’ जैसी हो गई है।
बिहार पर पड़ रहा नकारात्मक प्रभाव
इस नेपोटिज्म ने बिहार को गहरी चोट पहुंचाई है:
योग्यता की हत्या: सच्चे, मेहनती और विजन वाले युवा नेता हाशिए पर धकेल दिए जा रहे हैं। सत्ता परिवार के हाथों में केंद्रित होने से फैसले व्यक्तिगत वफादारी और परिवार हित पर आधारित हो जाते हैं, न कि विकास और सुशासन पर।
विकास में रुकावट: बिहार शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और उद्योग में पिछड़ा हुआ है। परिवारवादी नेतृत्व में न तो नई सोच आती है और न ही जवाबदेही। निशांत कुमार जैसे नए चेहरे भी पिता की छाया से बाहर निकलकर कुछ ठोस काम दिखाने में अभी तक असफल नजर आते हैं।
युवाओं में निराशा: बिहार के लाखों पढ़े-लिखे युवा या तो दिल्ली-मुंबई भाग रहे हैं या राजनीति से मुंह मोड़ रहे हैं। जब देखते हैं कि ऊपर पहुंचने का रास्ता सिर्फ ‘पापा का नाम’ है, तो उनकी आकांक्षा और मेहनत का गला घोंट दिया जाता है।
भविष्य में और बुरा असर पड़ेगा। अगर यह सिलसिला जारी रहा तो बिहार की राजनीति और भी सिकुड़ जाएगी। सक्षम प्रशासन की जगह परिवार-केंद्रित, भ्रष्ट और अक्षम शासन स्थापित हो जाएगा। विकास की गति धीमी रहेगी, निवेशक दूर भागेंगे और बिहार ‘परिवारों का गुलाम’ राज्य बनकर रह जाएगा। लोकतंत्र की जड़ें कमजोर होंगी क्योंकि आम voter को लगेगा कि उसकी भागीदारी सिर्फ वोट देने तक सीमित है, सत्ता तो वंशानुगत है।
समय आ गया है कि बिहार की जनता नेपोटिज्म को अस्वीकार करे। नेताओं से पूछा जाए — अपने बेटे को मौका देने से पहले, क्या आपने बिहार के बेटों को मौका दिया? जब तक परिवारवाद चलेगा, बिहार का सच्चा उत्थान सिर्फ सपना बना रहेगा।