06/01/2026
विनम्र श्रद्धांजलि
परम पूज्य श्री राम सुमिरन दास जी महाराज : एक संत, एक चेतना, एक अविनाशी विरासत परम पूज्य श्री राम सुमिरन दास जी महाराज वास्तव में ईश्वर के विशेष आशीर्वाद से विभूषित संत थे। उनका जीवन इस सत्य का साक्ष्य है कि जब कोई आत्मा पूर्णतः सेवा, साधना और निष्काम कर्म में लीन हो जाती है, तो ईश्वर स्वयं उसके माध्यम से कार्य करते हैं। ऐसे संत विरले ही जन्म लेते हैं और समाज को दिशा देकर स्वयं इतिहास बन जाते हैं।
बाबा राम सुमिरन दास जी को जीवन में अनेक बार कलंकित करने का प्रयास किया गया, किंतु हर बार वे और अधिक निखरकर सामने आए। उन्हें कलंकित करने वाले स्वयं समय के प्रवाह में तार-तार हो गए। यह कोई संयोग नहीं था, बल्कि उनकी निर्लिप्तता, समता और सिद्धि का परिणाम था। वे प्रशंसा और निंदा—दोनों से परे एक ऐसे संत थे, जिनके लिए केवल सत्य और सेवा ही साध्य था।
यह आकस्मिक नहीं है कि पूरे भारत में उनके शिष्यों का विस्तार है। लोगों ने स्वयं आग्रह कर उन्हें अनेक ठाकुरबारियों का दायित्व सौंपा। जिस-जिस ठाकुरबाड़ी की जिम्मेदारी उन्होंने ली, उसका उन्होंने न केवल भौतिक उद्धार किया, बल्कि आध्यात्मिक पुनर्जागरण भी किया। जीर्ण-शीर्ण अवस्था में पड़ी ठाकुरबारियों को उन्होंने फिर से आस्था, अनुशासन और मर्यादा का केंद्र बना दिया।
जब बिहार की अनेक ठाकुरबाड़ियाँ उपेक्षा और खस्ताहाल स्थिति से जूझ रही थीं, तब बाबा ने फतेहा ठाकुरबाड़ी में गीता धाम की स्थापना कर सनातन संस्कृति, धर्म और अध्यात्म को नई ऊर्जा प्रदान की। फतेहा जैसे छोटे से गाँव से निकलकर उनकी आभा का राष्ट्रीय स्तर तक पहुँचना, उनकी साधना और ईश्वरीय कृपा का ही प्रमाण है।
अनेक शिष्यों का आध्यात्मिक जन्म बाबा के आशीर्वाद से ही संभव हुआ। आत्माराम जैसे शिष्य का प्रकट होना भी बाबा की कृपा का ही परिणाम माना जाता है। वे गुरु नहीं, बल्कि शिष्यों के जीवन में मार्गदर्शक प्रकाश थे।
मेरा स्वयं का अनुभव भी बाबा की दिव्यता का साक्षी है। एक बार बढ़ौना में आयोजित यज्ञ में मैंने उन्हें ससम्मान आमंत्रित किया। बाबा ने वहाँ नाम-जप की महत्ता को समझाया और उसे यज्ञ का अनिवार्य अंग बना दिया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि बिना नाम-स्मरण के कोई भी अनुष्ठान पूर्ण नहीं हो सकता। यह उनके गहन आध्यात्मिक दृष्टिकोण को दर्शाता है।
बाबा राम सुमिरन दास जी का जीवन अत्यंत सरल, सहज और विरागपूर्ण था। उनमें किसी प्रकार का दिखावा नहीं था। उनकी निर्पेक्षता ही उनकी सिद्धि का प्रमाण थी। वे न पद के आकांक्षी थे, न प्रसिद्धि के। उनकी सादगी में ही उनकी महानता निहित थी।
ऐसी अनेक घटनाएँ हैं जो यह सिद्ध करती हैं कि बाबा पर ईश्वर की विशेष कृपा थी। उनकी समता, साधना और सिद्धि ने ही उन्हें जन-जन का संत बनाया। वे केवल फतेहा या शेरपुर तक सीमित नहीं रहे—उनकी चेतना और प्रभाव ने सीमाएँ लांघ दीं।
संत कभी मरते नहीं। वे शरीर छोड़ते हैं, पर चेतना में अमर रहते हैं। बाबा राम सुमिरन दास जी अविनाशी हैं, अमर हैं। जितनी बार उन्हें नमन किया जाए, उतना कम है। यदि कभी अवसर मिले, तो फतेहा ठाकुरबाड़ी और शेरपुर ठाकुरबाड़ी अवश्य जाएँ—वहाँ आज भी अनुभूति होगी कि बाबा राम सुमिरन दास जी क्या थे, और क्या हैं। उनका जीवन स्वयं एक ग्रंथ है—जिसे पढ़ने के लिए शब्द नहीं, श्रद्धा चाहिए।
शत्-शत् नमन। जय बाबा भंडारी। जय गीता धाम, फतेहा।