28/02/2024
मृत्यु भोज पर गहरी चोट
ढाणी गारण पृष्ठभूमि से...
मृत्यु भोज समाज में व्याप्त एक असामाजिक और अमानवीय परंपरा है । किसी प्रियजन की मृत्यु पर मिष्ठान और शामियाने लगाना मानवीय मूल्यों की अवहेलना नहीं तो और क्या है ? हमें प्रियजन की मृत्यु का अपमान करने का किसी संतान को कोई हक नहीं।हमें मृत्यु दिवस की बजाय जन्मदिवस मनाना चाहिए। किसी प्रियजन के उम्र दराज होकर जाने में संतोष तो हो सकता है पर खुशी का कोई कारण नहीं बनता । यह कहना है गांव ढाणी गारन के मास्टर लीला राम भॊभरिया जी का जिनकी माता 87 वर्षीय शांति देवी का निधन दिनांक 22 फरवरी 2024 को हो गया । सच में शांति देवी अपने नाम के सार्थकता लिए हुए थे बड़े ही सहज स्वभाव की सहह्रदय महिला रही । स्वर्गीय पति श्री जय नारायण भॊभरिया की संगिनी बन जीवन की धूप छांव में उनके साथ देती रही । उन्हीं के तप कर्म की बदौलत उनके दोनों बेटों ने वो मुकाम हासिल किया जो उन हालातो में बहुत कम कर पाते हैं । मास्टर लीलाराम जी ने बताया कि वह और उनका छोटा भाई डॉक्टर जसवंत सिंह भोभरिया एमडी एमएस तथा समस्त भॊभरिया परिवार ने मिलकर मृत्यु भोज पर मिष्ठान की बजाय सादा भोजन ही परोसने का निर्णय लिया। गांव ढाणी गारण में भॊभरिया परिवार ने जहां एक और मृत्यु भोज जैसी अमानवीय परंपरा पर चोट की है वहीं समाज को नई पहल, नई दिशा और सोच दी है । मास्टर लीलाराम व डॉ जसवंत सिंह दोनों ही गांव के पुस्तकालय के साथ-साथ अन्य सामाजिक-आर्थिक कार्यों में बढ़ चढ़कर अपना सहयोग देते रहे हैं । इस अवसर पर उन्होंने बताया कि समाज के उत्थान का एक ही मार्ग है वह है शिक्षा इसके लिए समाज को रूढ़िवादी परंपराओं पर खर्च करने की बजाय बच्चों की बेहतरीन शिक्षा के लिए, उनके अच्छे मुस्तकबिल के लिए खर्च करने चाहिए।
बुजुर्ग जो कल गुजर गया एक किताब घर उजड़ गया सुबोध समाज और सभ्यता का तो आंचल सिकुड़ गया..... सुबहसिंहसुबोध की कलम से