26/12/2025
बरसात के दिन थे। छिंदधाम के घाट पर बारिश की बूंदें घास पर गिर रही थीं, और दूर मंदिर की घंटियों की आवाज़ धीमे-धीमे बह रही थी। हवा में मिट्टी की खुशबू घुली हुई थी और नर्म-सी धूप बादलों से झांक रही थी।
मैं अकेला ही वहां बैठा था। मन थका हुआ था — रोज़मर्रा की ज़िंदगी से, भागदौड़ से, और शायद खुद से भी। तभी, एक बुज़ुर्ग बाबा धीरे-धीरे चलते हुए मेरी बगल में आकर बैठ गए। उन्होंने बस मुस्कराकर देखा और पूछा —
"क्या खोया है जो इतना भारी लग रहा है बेटा?"
मैं चुप रहा।
कुछ पल की चुप्पी के बाद उन्होंने खुद ही कहना शुरू किया —
"जानता है ये जो सामने बह रही नदी है ना… इसे कई लोग बस पानी समझते हैं, पर जिसने दुख के बीच शांति ढूंढ ली, उसके लिए ये मां है। ये छिंदधाम सिर्फ एक जगह नहीं है, ये एक अनुभव है।"
उनकी आंखें झील जैसी शांत थीं।
मैंने पूछा, "आप यहां रोज़ आते हैं?"
वो मुस्कराए, बोले,
"मैं नहीं आता बेटा… ये जगह बुला लेती है। जब किसी का मन टूटा होता है, जब किसी की उम्मीद बुझती है, छिंदधाम उसे खींच लाता है। यहां सिर्फ भगवान नहीं मिलते, कभी-कभी खुद से भी मुलाकात हो जाती है।"
बातों ही बातों में उन्होंने मुझे एक छोटी सी बात कही जो दिल में उतर गई —
"शांति कहीं बाहर नहीं मिलती, बेटा। जब तू बहाव में भरोसा करना सीख जाएगा… तब तेरा जीवन भी इस नदी की तरह बहने लगेगा — शांत, सरल, लेकिन गहरा।"
मैं कुछ नहीं बोल पाया।
बस उतना ही काफी था।
वो बाबा उठे, लाठी उठाई और मुस्कराकर चले गए। मैंने देखा — उनके पांव के निशान मिट्टी में थे, लेकिन धीरे-धीरे बारिश ने उन्हें भी मिटा दिया।
शायद जीवन भी ऐसा ही होता है…
छोटे-छोटे स्पर्श, छोटी मुलाकातें, और फिर… सब बह जाता है — पर जो असर होता है, वो भीतर हमेशा रह जाता है।
उस दिन के बाद, मैं हर महीने छिंदधाम जाता हूं। कभी कोई सवाल नहीं होता, कभी कोई मन्नत नहीं होती। बस बैठता हूं… और नदी को बहते देखता हूं।
और हर बार, कुछ नया बहकर भीतर उतर जाता है।