07/05/2026
मिलिए बिहार के नए स्वास्थ्य मंत्री निशांत कुमार जी से। निशांत कुमार जी ने वर्षों तक “मुख्यमंत्री पुत्र” होने का असहनीय कष्ट झेला।
बचपन से ही सत्ता की चमक-दमक का बोझ उठाना कोई आसान काम नहीं होता।
जहां आम लोग बसों और ट्रेनों में धक्के खाते रहे, वहां इन्होंने VIP गाड़ियों की मुलायम सीटों पर बैठकर संघर्ष का कठिन अध्याय लिखा।
सरकारी बंगलों की ऊंची दीवारों के भीतर रहकर इन्होंने त्याग और तपस्या की ऐसी मिसाल पेश की, जिसे इतिहास शायद स्वर्ण अक्षरों में लिखेगा।
एसी कमरों में बैठकर जनता की तकलीफों पर चिंतन करना, बड़े-बड़े अधिकारियों को आदेश देते देखना, सत्ता के गलियारों की चमकती फर्श पर चलना… ये सब कोई मामूली संघर्ष नहीं होता।
जब दूसरे नेता वर्षों तक गांव-गांव घूमकर पोस्टर लगाते रहे, लाठी खाते रहे, जेल जाते रहे, चुनाव लड़ते रहे, तब इन्होंने सीधे सत्ता के वातावरण में रहकर राजनीति की “कठोर ट्रेनिंग” ली।
जनता के बीच जाकर वोट मांगने जैसी छोटी-मोटी औपचारिकताओं में समय बर्बाद नहीं किया, क्योंकि संघर्ष का स्तर बहुत ऊंचा था।
कहते हैं कई बार उन्हें मंत्री आवास से सचिवालय तक जाने में ट्रैफिक भी झेलना पड़ा।
कई महत्वपूर्ण बैठकों में सिर्फ “मुख्यमंत्री पुत्र” के रूप में पहचान मिली, जबकि अंदर ही अंदर एक स्वास्थ्य मंत्री जन्म लेने के लिए तड़प रहा था।
आज जब स्वास्थ्य मंत्री बने हैं, तो यह सिर्फ पद नहीं बल्कि वर्षों की वही कठिन साधना, विरासत की तपस्या और सत्ता के संरक्षण में किया गया मौन संघर्ष है।
अब जो लोग परिवारवाद की बात करते हैं, उन्हें समझना चाहिए कि इतनी बड़ी कुर्सी यूं ही नहीं मिलती…
इसके लिए सही परिवार में जन्म लेने का कठिन संघर्ष करना पड़ता है।