20/11/2025
ये तस्वीर सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज आदर्श कुमार गोयल की है। कल जिन 272 माननीयों ने राहुल गांधी को पत्र लिखा है उसमे शामिल 16 जजों की लिस्ट में इनका नाम सबसे ऊपर है। मैं इन्हें नहीं जानता था लेकिन ख़बरों की दुनिया की एक ख़ासियत होती है ख़बरें कभी मरती नहीं जैसे गुनाह कभी नहीं मरते।
मई 2003 में डीडीए घोटाले में हाईकोर्ट के पूर्व जज शमित मुखर्जी गिरफ्तार हो गए तो टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने एक खोजी रिपोर्ट छापी। उस रिपोर्ट में कहा गया था कि मई 2001 में जिस अधिवक्ता आदर्श कुमार गोयल कि बतौर जज नियुक्ति की गई वह आरएसएस के ही एक संगठन अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद से जुड़े हैं जबकि जजों की नियुक्ति में यह जरूरी है कि किसी भी जज की कोई राजनैतिक संबद्धता न हो। सिर्फ़ इतना ही नहीं आईबी की रिपोर्ट में उनको भ्रष्टतम व्यक्ति बताया गया। आईबी की बेहद गंभीर टिप्पणियों के बावजूद विधि मंत्रालय की सिफारिश पर पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में बतौर जज नियुक्ति हुई थी
आपको बता दें कि हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति के लिए राज्य, राज्यपाल और सुप्रीम कोर्ट द्वारा भेजे गए नाम पहले विधि मंत्रालय को भेजे जाते हैं और विधि मंत्रालय उन नामों को इंटेलिजेंस ब्यूरो को भेजता है। खबर कहती है कि उनकी नियुक्ति से पहले एक बड़ी बाधा थी। गोयल का नाम, चार अन्य लोगों के साथ, के. आर. नारायणन के अनुमोदन के लिए भेजा गया, जो उस समय राष्ट्रपति थे।नारायणन ने पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के अतिरिक्त न्यायाधीश के रूप में एम. के. मित्तल की नियुक्ति को मंजूरी तो दे दी, लेकिन गोयल सहित तीन अन्य लोगों के बारे में कुछ टिप्पणियाँ कीं और फ़ाइल विधि मंत्रालय को वापस भेज दी।
तत्कालीन क़ानून मंत्री अरुण जेटली ने विधि मंत्रालय सिफ़ारिश का बचाव किया। 19 मई, 2001 के एक गोपनीय नोट में, जेटली ने गोयल की ईमानदारी पर आईबी के निष्कर्ष को "कलंक" बताकर खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के कॉलेजियम, दोनों ने उन पर पुनर्विचार किया था। उन्होंने मुख्य न्यायाधीश और पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के कॉलेजियम के सदस्यों के हवाले से कहा कि गोयल की "एक ईमानदार और ईमानदार वकील के रूप में बेदाग़ प्रतिष्ठा है।"
21 मई, 2001 को प्रधानमंत्री वाजपेयी ने हस्ताक्षर किए और फ़ाइल फिर से नारायणन के पास भेज दी गई। एक बार फ़ाइल वापस भेजने के बाद, नारायणन पर नियुक्ति को मंजूरी देने का संवैधानिक दायित्व था, लेकिन उन्होंने अपनी नाखुशी ज़ाहिर कर दी।
यह कहानी यहीं खत्म नहीं होती है इसके अभी कई हिस्से हैं जो बारी बारी से सामने आयेंगे। सिर्फ़ इतना बता दें मौजूदा मोदी सरकार ने इन्हें नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल का चेयरमैन बना दिया।