06/12/2025
डॉ. आंबेडकर के परिनिर्वाण दिवस पर जब हम उनके विचारों और संघर्ष को स्मरण करते हैं, तो यह भी आवश्यक है कि हम ईमानदारी से यह देखें कि आज दलित समाज किस स्थिति में खड़ा है।
निस्संदेह, शिक्षा, रोजगार, राजनीति और सामाजिक सम्मान के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुई है—पर यह प्रगति समान रूप से नहीं बंटी है। सामाजिक चेतना और राजनीतिक समझ आज भी अनेक हिस्सों में विखंडित दिखाई देती है। बाबासाहेब ने जिस “स्वाभिमान आधारित नेतृत्व” का सपना देखा था, वह आज भी बाहरी संरचनाओं और आंतरिक विभाजनों के बीच संघर्षरत है।
आज दलित समाज की सबसे बड़ी चुनौती वही है जिसे आंबेडकर ने लगभग एक सदी पहले पहचान लिया था—
एकता की कमी, राजनीतिक भ्रम और नेतृत्व को कमजोर करने वाली बाहरी शक्तियाँ।
समाज के एक हिस्से ने शिक्षा और अवसरों से उन्नति की है, लेकिन बड़ा हिस्सा आज भी शोषण, आर्थिक असुरक्षा और सांस्कृतिक अपमान से जूझ रहा है। आंबेडकर ने कहा था कि “आर्थिक और राजनीतिक शक्ति के बिना सामाजिक सुधार असंभव है”—आज भी दलित समुदाय का बड़ा वर्ग राजनीतिक रूप से उपयोग तो किया जाता है, पर निर्णायक शक्ति से दूर रखा जाता है।
सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि समाज के अंदर ही कई बार ऐसे विभाजन पैदा किए जाते हैं जो सामूहिक शक्ति को कमजोर कर देते हैं। कई लोग आज भी नेतृत्व को अवसर नहीं, बल्कि संदेह की नजर से देखते हैं—वही स्थिति जिसे आंबेडकर ने कहा था:
“My greatest difficulty is not from my opponents but from my own people.”
आज आवश्यकता है कि दलित समाज लोकतंत्र में अपनी भूमिका को केवल मतदाता तक सीमित न रखे, बल्कि निर्णयकर्ता बने। वोट को सिर्फ उम्मीदवार नहीं, बल्कि अपने भविष्य को दिया जाने वाला निर्णय माने। Babasaheb के “Be educated, be organized, be agitated” का अर्थ आज यह है कि—
✓ शिक्षा केवल डिग्री न बने, चेतना बने।
✓ संगठन केवल भीड़ न बने, शक्ति बने।
✓ संघर्ष केवल प्रतिक्रिया न बने, बल्कि दृष्टि और दिशा के साथ हो।
यदि समाज अपने नेतृत्व को खुद तैयार नहीं करेगा, तो वही होगा जिसकी चेतावनी बाबासाहेब ने दी थी—
“अगर हम अपना मार्ग स्वयं नहीं बनाएंगे, तो दूसरे हमारे लिए मार्ग चुनेंगे—जो हमारे हित में नहीं होगा।”
आज दलित समाज के सामने दो रास्ते हैं—
एक, बिखरी हुई राजनीति, भ्रम और प्रतीक-आधारित सम्मान में उलझे रहना।
दूसरा, आंबेडकर के विचारों के अनुसार शक्ति, संगठन, स्वाभिमान और राजनीतिक स्वायत्तता की दिशा में संगठित यात्रा शुरू करना।
आज का समय इतिहास का मोड़ है।
समाज चाहे तो इस मोड़ को परिवर्तन का क्षण बना सकता है—
और चाहे तो जैसे-तैसे चलने वाली स्थिति को स्वीकार कर सकता है।
पर याद रखिए:
आंबेडकर की विरासत केवल श्रद्धांजलि से नहीं, बल्कि उनके अधूरे काम को आगे बढ़ाने से जीवित रहती है।
जय भीम।