29/07/2026
आंख मूंद कर कुछ भी न मानना चाहिए और न उसे सत्य बताकर प्रचारित करना चाहिए। जैसे ज्योतिबा फुले की जिंदगी के बारे में कितने ही गल्प हैं। पहली बात यही झूठ है कि वह अछूत थे। न तो वह अछूत थे, और न ही उनके साथ ऐसा कोई बर्ताव कभी हुआ था। यही इतिहास सत्य है।
ज्योतिबा फुले की जीवन-गाथा से जुड़े मूल स्रोतों को खंगाल रहा हूं। एक में उल्लेख है कि उन्हें एक मराठा ब्राह्मण मित्र के विवाह में केवल इसलिए अपमानित किया गया कि वह शूद्र जाति से थे। मित्र की बारात में उन्हें न्यौता भी मिला था, फिर भी यह घटना घट गई?
अनेक शोधपत्रों में इस घटना का वर्णन आता है। प्रश्न है कि क्या यह घटना वाकई में घटित हुई थी? इसका संदर्भ आखिर कहां है? इसका उत्तर मैंने अनेक प्रामाणिक स्रोतों में खोजने का प्रयास किया। सच्चाई ये है कि यह पूरा प्रकरण ही मिथ्या और असत्य है। शीघ्र इस पर शोधपत्र प्रकाशित हो जाएगा। कुछ तथ्यों की ओर केवल ध्यान आकर्षित कर रहा हूं।
ज्योतिबा फुले उस जमाने में जबकि स्कूल आदि नहीं थे, तब पुणे के सबसे आलीशान चर्च द्वारा स्थापित स्कॉटिश मिशन स्कूल में पढ़ने भेजे गए। वास्तविकता यह है कि ज्योतिबा फुले के पिता गोविंद राव उस जमाने में पुणे में फूलों-फलों, सब्जियों के सबसे बड़े आढ़तिए या व्यापारी थे। चर्च को भी फूलों-फलों, सब्जियों की सप्लाई करते ही थे। ब्रिटिश अफसरों और चर्च के लोगों से व्यापार के कारण संपर्क आया।
ज्योतिराव फुले का जन्म 11 अप्रैल 1827 का है, महज़ 6 साल की उम्र में मराठी स्कूल में ब्राह्मण व अन्य जातियों के बच्चों के साथ ही ज्योतिराव फुले भी पढ़ने जाते थे। मतलब ब्राह्मण और शूद्र साथ ही पढ़ते थे, यह तथ्य इसी एक बात से प्रमाणित है कि ज्योतिराव मराठी स्कूल में पढ़ते थे।
कालांतर में पिता ने उन्हें अपने संपर्क के कारण स्कॉटिश चर्च स्कूल में उस जमाने के एक पादरी और अंग्रेज अफसर की सलाह पर ही भेजना शुरु किया। यह तथ्य भी रिकॉर्ड पर है। 6 वर्ष उनकी पढ़ाई मिशन स्कूल में हुई। वहीं से सेकेंडरी शिक्षा उन्होंने हासिल की। 1841-1847 तक उनका अध्ययन चर्च मिशनरी स्कूल में एक पादरी के मार्गदर्शन में हुआ है।
इसके पहले 1840 में ज्योतिराव फुले का विवाह सावित्री फुले से हुआ, यह विवाह परंपरागत रीति-रिवाज से हुआ, तत्कालीन पद्धति के अनुसार ब्राह्णण आदि सभी इसमें शामिल हुए थे। यह तथ्य भी प्रामाणिक है।
चर्च के स्कूल से पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्हें सरकारी नौकरी मिल रही थी, लेकिन उन्होंने किसी कारण से उसे स्वीकार नहीं किया। उस जमाने में चर्च स्कूल में पढ़ना असाधारण उपलब्धि थी।
नौकरी करने की बजाए उन्होंने बिजनेस का रास्ता चुना। अपने परंपरागत व्यवसाय को आगे बढ़ाया। सब्जियों, फलों-फूलों की आपूर्ति का बेहतरीन प्रबंधन किया। इसके साथ ब्रिटिश विभागों को खाद्यान्न, गुड़ आदि की आपूर्ति भी उन्होंने बड़े पैमाने पर की।
इससे जो कमाई हुई, उससे उन्होंने एक बड़ी कंपनी गठित की, जिसका नाम था-पुणे कमर्शियल एंड कॉन्ट्रैक्टिंग कंपनी। उस जमाने में बहुत अल्प समय में यह कंपनी भारत की सबसे बड़ी और अमीर कंपनियों में शुमार हुई।
देश में जब 1857 की क्रांति घटित हुई और पेशवा आदि गणराज्य अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति का बिगुल फूंक चुके थे, तब ज्योतिराव फुले ने 1857 की क्रांति में कोई सहयोग किसी भी रूप में क्रांतिकारियों को दिया हो, इसका कोई प्रमाण नहीं है। सैद्धांतिक रूप से वह चर्च मिशन स्कूल के उस सीख के समर्थक थे कि भारत में अंग्रेजी राज दैवीय वरदान है।
कालांतर में चर्च प्रेरित अनेक लेखकों की पुस्तकों को पढ़कर उन्होंने भारत की तत्कालीन सामाजिक और धार्मिक परंपराओँ पर कटु आलेख लिखे। हालांकि उनके द्वारा लिखित किसी ग्रंथ में इस तथ्य का रंच मात्र भी उल्लेख नहीं है कि उनके साथ किसी ब्राह्मण ने किसी बारात उनके शामिल होने के सवाल पर कोई अपमानजनक बर्ताव किया था।
अंग्रेज अफसरों और चर्च के संपर्क से उन्हें ब्रिटिश राज में पुणे और आस-पास के सभी निर्माण कार्यों में सामग्री आपूर्ति का बड़ा काम मिल जाता था। यही नहीं तो आउटसोर्स पर लेबर, कौशल कर्मकार आदि की आपूर्ति भी उन्हीं के जरिए होती थी।
इस बीच उन्होंने अपने पत्नी सावित्री बाई को भी अंग्रेजी शिक्षा में पारंगत किया और कराया। केशव शिवराम भवालकर नामक एक ब्राह्मण मित्र को उन्होंने सावित्रीबा का अध्यापक बनने के लिए राजी किया। भवालकर ने ही सावित्रीबाई फुले को पढ़ना-लिखना सिखाया।
इसी पढ़ाई की बदौलत सावित्री बाई ने अन्य लड़कियों के अध्यापन के लिए खुद को तैयार किया। भवालकर आदि सुयोग्य ब्राह्मण अध्यापकों के मार्गदर्शन में ही लड़कियों के लिए एक स्कूल की योजना को ज्योतिबा फुले और सावित्री फुले ने कार्य रूप साकार किया।। यह बात 1848 की है।
इसी समय कुछ संदिग्ध स्रोतों के जरिए अक्सर उल्लेख किया गया है कि उन्हें एक ब्राह्मण मित्र के विवाह समारोह में उनकी शूद्र जाति के कारण अपमानित किया गया। लेखक ने इस मुद्दे पर गहन शोध किया है। किंतु इस संदर्भ में 28 नवंबर 1890 को पुणे में अपनी मृत्यु के समय तक महात्मा फुले ने एक भी स्थान पर लिखित रूप से इस घटना का जिक्र नहीं किया।
उनके संपूर्ण साहित्य में, जिसमें गुलामगिरी, तृतीय रत्न, पवाडा, सत्सार, सत्यधर्म, इशारा आदि अनेक प्रमुख है, किसी में भी उनके साथ घटी घटना का उन्होंने कोई उल्लेख नहीं किया है।
भारतीय साहित्य परंपरा में ज्योतिराव फुले ही प्रथम लेखक थे जिन्होंने ब्राह्मण और गैर-ब्राह्मण का प्रथम शाब्दिक संकेत अपने साहित्य में किया है। क्यों किया होगा, इसे समझना कुछ कठिन नहीं है।
उनकी कंपनी का वास्तविक विकास ही 1857 की क्रांति के बाद हुआ। जैसे जैसे उनका स्वर उनके लेखन में सनातन हिंदू धर्म और ब्राह्मणों के विरुद्ध अनावश्यक रूप से तीखा होने लगा, उनका बिजनेस ब्रिटिश कृपा से तेजी से बढ़ने लगा।
यहां यह उल्लेख किया जाना आवश्यक है कि उनके अनेक सहपाठी मित्र मराठी ब्राह्मण थे जिनका साथ आजीवन बना रहा। इनमें सदाशिव बल्लाल गोवंडे ने उन्हें और उनकी पत्नी को उस समय आसरा दिया जबकि उनके पिताजी से उनके तीखे मतभेद हो गए थे। गोविंद राव ने ही ज्योतिराव फुले को घर से निकाल दिया था।
जिस लड़कियों के पहले स्कूल की बात आती है, वह खुल ही नहीं पाता यदि सदाशिव बल्लाल ने खुलकर आसरा और आर्थिक सहायता न दी होती।
अऩ्य प्रमुख उनके दोस्त थे मोरो विट्ठल वालवेकर। माली सहित अन्य जाति, समाज में बाल विवाह रोकने, विधवा पुनर्विवाह के मुद्दे पर वालवेकर ने फुले के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम किया।
सखाराम यशवंत परांजपे ने उस समय ज्योतिबा फुले की रक्षा की जबकि उनका अपना समाज ही उनके विरुध बगावत पर उतारू था।
तथ्यों के अनुसार, स्वयं माली समाज के जल स्रोतों से महार आदि अनेक जातियों को जल लेने या वहां पर जल पीने की मनाही थी। ज्योतिराव के पिता गोविंद राव महारों को अपने कुएं से जल नहीं लेने देते थे।
1868 में जब अपना खुद का कुआं ज्योतिबा फुले ने महारों के लिए खोला तो उन्हें अपने जाति-समाज में बड़े गुस्से का सामना करना पड़ा। उस समय में सखाराम यशवंत परांजपे, सदाशिव बल्लाल गोवंडे, विनायक बापूजी भंडारकर, मोरोपंत विट्ठल आदि ने सामाजिक और विधिक रूप से ज्योतिराव फुले को पूरा सहारा दिया।
यह सब तथ्यात्मक चीजें रिकॉर्ड पर हैं। हालांकि यह भी सत्य है कि ज्योतिबा फुले पर अंग्रेज पादरियों, अफसरों का पूरा असर रहता ही था। कुछ स्रोतों में इस तथ्य का संकेत है कि जो अंग्रेज अध्यापक, पादरी उन्हें लिखकर देते थे, उसे वह मराठी में अनुवाद कर अपने नाम से ही आगे बढ़ा देते थे।
आर्य आक्रमण के सिद्धांत को चर्च के संकेत पर ज्योतिबा फूले ने न सिर्फ माना, बल्कि उसमें पादरियों की मंशा से ही ऐसी बहुत सी बातें जोड़ दीं मानो कि आर्य केवल ब्राह्मण ही थे।
वस्तुतः उस दौर के महाराष्ट्र में चार वर्णों का उल्लेख नहीं ही मिलता है। समाज ब्राह्मण और शूद्र दो वर्णों में ही दिखाई देता है। मराठा कुनबी, यादव, भोंसले, पालकर, निंबालकर आदि अनेक समूह क्षत्रिय वर्ण से उत्पन्न तो बताए गए थे, किंतु उनकी भी गणना गैर ब्राह्मण शूद्र रूप में ही अंग्रेजी दस्तावेजों में मिलती है। खिलजी के समय मलिक काफूर की दक्कन विजय ने क्षत्रिय और वैश्य वर्ण को समाप्त ही कर दिया। फुले के समय वैश्य के नाम पर केवल मारवाड़ी और कुछ वणिक समूह को ही वैश्य की मान्यता थी, जो राजस्थान और गुजरात से संबंध रखते थे।
यही कारण है कि ज्योतिराव फुले ने मराठी समाज को भी ब्राह्मण और गैर-ब्राह्मण शूद्र दो ही स्वरूपों में विभक्त किया है। ऐसा उन्होंने इसलिए ही किया था कि उस समय संपूर्ण दक्कन जिसमें महाराष्ट्र था, उसमें से अचानक खुद को क्षत्रिय और वैश्य बताने की हैसियत रखने वाले समूह विदेशी म्लेच्छ आधिपत्य के कारण समाप्त हो चुके थे।
जो भी है, यह कहना नितांत असत्य और भ्रमपूर्ण है कि ज्योतिबा फुले के साथ किसी ब्राह्मण ने कोई भेदभाव किया था, अथवा उनका किसी ब्राह्मण दोस्त की बारात में कोई अपमान किया गया था। ऐसी किसी घटना का कोई जिक्र अपने लगभग 10 से अधिक पुस्तकों में कहीं पर भी ज्योतिराव फुले ने नहीं किया है। यह तथ्य शोध के द्वारा सत्य पाया गया है।
ज्योतिराव खुद पढ़े-लिखे थे, उनकी मृत्यु के बाद उनके किसी श्रद्धांजलि कार्यक्रम में भी यह बात किसी ने नहीं कही।
सवाल है कि फिर यह फर्जी कहानी किसने गढ़ी, और किसने लिखी? उत्तर है कि यह झूठी बात उनकी मृत्यु के करीब 35 साल बाद उस समय अचानक प्रकट की गई जबकि भारत में छूत-अछूत के सिद्धांत को अंग्रेज सरकार संगठित रूप देकर देश को बांटने में जुट गई थी।
पंधरीनाथ सीताराम पाटिल द्वारा लिखित महात्मा जोतीराव फुले यांचे चरित्र' नामक जीवनी, पुस्तक फुले की मृत्यु के 37 साल बाद पहली बार 1927 में प्रकाशित हुई थी। इसी पुस्तक में इस झूठी कहानी का जिक्र पहली बार मिलता है। ज्योतिराव फुले के द्वारा लिखित किसी पुस्तक में इस बात का जिक्र नहीं है कि उन्हें किसी ब्राह्मण मित्र की बारात में किसी ब्राह्मण ने इस बात के लिए भगा दिया था कि वह शूद्र जाति से हैं।