15/06/2026
किसी बेईमान की आँखों में
न खटकूँ तो काहे का मैं
मित्रों को गाढ़े में याद न आऊँ
तो काहे का मैं
कोई मोहब्बत से देखे और मैं उसके
सीने में सीधे न उतर जाऊँ
तो काहे का मैं
अगर यह सब कविता मैं तुम्हें
सिर्फ़ सुनाने के लिए सुनाऊँ
तो फिर काहे का मैं।
-- केशव तिवारी
सुनील कु. यादव