आर्ष विद्या समाजम - AVS Hindi

आर्ष विद्या समाजम - AVS Hindi Contact information, map and directions, contact form, opening hours, services, ratings, photos, videos and announcements from आर्ष विद्या समाजम - AVS Hindi, Social service, Balaramapuram.

19/05/2026

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**"मानस भजरे गुरुचरणं**
**दुस्तरभवसागरतरणं”**
**आज (19-05-2026) सद्गुरुदेव आचार्यश्री के. आर. मनोज जी महाराज का जन्मदिन है। सम्पूज्य आचार्यजी को हृदय की गहराइयों से जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं....!**
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आर्ष विद्या समाजम, शिवशक्ति योगविद्या केंद्र, मनीषा सांस्कारिक वेदी, विज्ञानभारती विद्या केंद्र सहित कई महान संस्थाओं के संस्थापक।

अति श्रेष्ठ तीन आर्ष गुरु परंपराओं से जुड़े अनूठे व्यक्तित्व हैं सद्गुरुदेव आचार्यश्री के. आर. मनोज जी महाराज। श्री शंकरगुरुदेव जी नामक अवधूत महासिद्ध की कृपा, दीक्षा और आध्यात्मिक मार्गदर्शन उन्हें बचपन से ही प्राप्त करने का अनूठा सौभाग्य मिला है। इसके साथ ही श्री निखिलेश्वरानंद परमहंस जी, महावतार बाबा जी की क्रियायोग परंपरा (परमहंस योगानंद जी) के भाग के रूप में सनातन धर्म की गूढ़ विद्याओं और क्रियायोग का अभ्यास करने का अवसर भी प्राप्त हुआ है। वे विभिन्न संस्थाओं के योगविद्या पाठ्यक्रमों से भी जुड़े रहे हैं।

आधुनिक युग की चुनौतियों और संभावनाओं को पहचानकर, पंचमहा कर्तव्यों को वैज्ञानिक और व्यवस्थित तरीके से निभाते हुए, श्री परमेश्वर और आर्ष गुरु परंपराओं द्वारा दिए गए “कृण्वंतो विश्वमार्यम” (मानव और जगत को श्रेष्ठ बनाना) के महान मिशन को पूरा करने के लिए 1999 जुलाई 8 को सद्गुरुदेव आचार्यश्री मनोज जी महाराज द्वारा स्थापित आध्यात्मिक-दार्शनिक-शैक्षणिक-सांस्कृतिक-पुनर्जागरण संस्था ही आर्ष विद्या समाजम (AVS) है।

AVS इस लक्ष्य को दो तरह से पूरा करने का उद्देश्य रखता है: भावात्मक और संरक्षणात्मक।

भावात्मक:-
वास्तविक सनातन धर्म और उस दिव्य विज्ञान के लाभों को - (अर्थात पूर्ण स्वास्थ्य, समग्र व्यक्तित्व विकास, मानव विकास, संपूर्ण जीवन विजय, श्रेष्ठ समाज निर्माण, सर्वदुखों का समूल निवारण आदि) दुनिया भर में पहुँचाना।

संरक्षणात्मक:-
आज समाज जिन छह प्रकार की आसुरी शक्तियों का सामना कर रहा है, उनसे लोगों को मुक्त कराना।
इन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए उन्होंने 'दशतल प्रवर्त्तन पद्धति' (दस चरणों की कार्ययोजना) नामक एक अनूठी संगठनात्मक योजना तैयार की है।

सरल शब्दों में कहें तो आर्ष विद्या समाज की गतिविधियाँ तीन स्तरों पर हैं:

1) Intervention, Recovery & Rehabilitation (आपातकालीन रक्षा योजना / Rescue Operation)
समाज में हर किसी को बचपन से ही कई तरह से प्रभावित करने वाले छह प्रकार के ब्रेन वॉशिंग के शिकार होकर अपने, अपने परिवार, समाज, राष्ट्र और दुनिया के खिलाफ जाने वालों को वापस लाने का यह एक आपातकालीन चिकित्सा उपाय (रेस्क्यू ऑपरेशन) है। 'सुदर्शनम डी-रेडिकलाइजेशन' मार्गदर्शन के माध्यम से आर्ष विद्या समाज इस कार्य को करता है।

सामान्य ज्ञान, चर्चा के लिए तत्परता और सत्य को जानने पर उसे स्वीकार करने की बौद्धिक ईमानदारी - इन तीन शर्तों को मानने वाले किसी भी व्यक्ति को सही रास्ते पर लाने की वैचारिक शक्ति से युक्त डी-रेडिकलाइजेशन काउंसलिंग कार्यक्रम!!!
न केवल रेडिकलाइजेशन के शिकार हुए लोगों को, बल्कि इन आसुरी शक्तियों के मिशनरी प्रवक्ता बने लोगों को भी वापस लाकर सनातन धर्म का प्रचारक बनाने का गौरवशाली इतिहास आर्ष विद्या समाज के पास है।

राष्ट्रविरोधी मतांतरण सहित गलत विचारधाराओं से रास्ता भटक रहे हजारों लोगों को सन्मार्ग पर लाने वाले महात्मा सद्गुरुदेव आचार्यश्री मनोज जी महाराज हैं।
अज्ञानता, गलतफहमी और ब्रेन वॉशिंग के कारण राष्ट्रविरोधी विचारों से प्रभावित हुए 8,500 से अधिक युवक-युवतियों को आचार्य जी पहले ही वापस ला चुके हैं!! इसमें से करीब एक हजार लोगों को रेडिकलाइजेशन का सामना करने की क्षमता मिली है। वापस आए सौ से अधिक लोग अपने अनुभवों को सार्वजनिक रूप से साझा करने के लिए तैयार हैं। बीस से अधिक लोग सनातन धर्म के प्रचारक और प्रचारिकाओं के रूप में सेवा कर रहे हैं। 4 लोगों ने अपने अनुभवों का वर्णन करते हुए पुस्तकें लिखी हैं।

2) जागरूकता या प्रतिरोध (PREVENTION):
गलत विचारों की ओर बढ़ने से रोकना इस क्षेत्र का कार्य है। दर्शन, इतिहास और वर्तमान समय को रेखांकित करते हुए समाज को प्रभावित करने वाले भ्रम को दूर करने का यह कार्यक्रम है। सटीक जागरूकता के माध्यम से लाखों लोगों को सही मार्गदर्शन देकर रेडिकलाइजेशन को रोकना संभव हुआ है। विभिन्न संस्थाओं को डी-रेडिकलाइजेशन काउंसलिंग में प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है।

3) मूलभूत समस्या समाधान (स्थायी योजना):
समस्याओं का स्थायी समाधान खोजने (कारण का पता लगाकर मूल सहित समस्या का समाधान करने) के साथ-साथ 'लोकाः समस्ताः सुखिनो भवन्तु' के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए AVS ने चार प्रकार की अनूठी गतिविधियाँ तैयार की हैं!

1. **समग्र और वैज्ञानिक अनुष्ठान - अनुसंधान - प्रशिक्षण योजना:** पाठ्यक्रम (शिवशक्ति योगविद्या, आध्यात्मिक शास्त्रम, भारतीय संस्कृति, विद्यार्थी निपुणता वर्ग (SEP: स्टूडेंट्स एक्सीलेंस प्रोग्राम), सुदर्शनम, मृत्युंजयम, संगठनात्मक शास्त्र, व्यायामकी विज्ञान) कक्षाएं, शिविर आदि।

2. **धर्म प्रचारक पद्धति (संगठनात्मक योजना):** सनातन धर्म प्रचारकों की पहचान कर, उन्हें प्रशिक्षित कर विभिन्न स्थानों और विभिन्न क्षेत्रों में तैनात करना।

3. **संस्थाओं की योजना:** साधना शक्ति केंद्र, विज्ञानभारती अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन अनुसंधान प्रतिष्ठान, विज्ञानभारती विद्या केंद्र, विज्ञानभारती लर्निंग सेंटर्स।

4. **व्यापक और समग्र वास्तविक सेवा-सशक्तिकरण-संरक्षण गतिविधियाँ।**
सनातन धर्म को दुनिया भर में पहुँचाने के महान लक्ष्य के हिस्से के रूप में, आर्ष विद्या समाज ने केरल के तिरुवनंतपुरम, एर्नाकुलम, त्रिशूर जिलों के साथ-साथ चेन्नई, बैंगलोर, महाराष्ट्र और दिल्ली में केंद्र शुरू किए हैं।
2026 में भारत के अन्य राज्यों और विदेशों में भी अपनी गतिविधियों का विस्तार करना इसका लक्ष्य है।

प्राप्त पुरस्कार:
हिंदू पार्लियामेंट की आध्यात्मिक सभा द्वारा दिया गया 2019 का **‘कर्मरत्न’** पुरस्कार, इटरनल हिंदू फाउंडेशन का 2023 का **‘महर्षि अरविंद सम्मान’** राष्ट्रीय पुरस्कार, चिन्मय मिशन के तत्वावधान में आयोजित ‘संस्कार’ आध्यात्मिक सम्मेलन में 2024 का **‘समूहश्री पुरस्कार’**, केरल क्षेत्र संरक्षण समिति का 2024 का **‘माधव जी पुरस्कार’**, 2024 का **‘स्वामी मृडानन्द स्मारक आध्यात्मिक पुरस्कार’**, 10वां **‘श्री चट्टम्पी स्वामी - श्री नारायण गुरु प्रथम संगम स्मृति पुरस्कार’**, महाराष्ट्र स्थित अक्षय हिंदू पुरस्कार आयोजन समिति का 2024 का **‘अक्षय हिंदू पुरस्कार’**, 2024 का **‘गुरुश्रेष्ठ पुरस्कार’**, 2025 का **‘श्री वेल्लक्काट्टू गोपालकुरुप कीर्ति पुरस्कार’**, डॉ. मंगलम स्वामीनाथन फाउंडेशन द्वारा दिया जाने वाला **‘श्री दत्तोपंत ठेंगड़ी सेवा सम्मान 2025’** राष्ट्रीय पुरस्कार, 'HRDS INDIA' द्वारा दिया गया **‘वीर सावरकर इंटरनेशनल इम्पैक्ट अवार्ड 2025’** अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार, सुकृतं भागवत यज्ञ समिति द्वारा दिया गया **‘सुकृतं भागवत पुरस्कार - 2025’**, केरल क्षेत्र संरक्षण समिति के अधीन ‘तळियादिच्चपुरत्तप्पन शाखा समिति’ द्वारा दिया गया 8वां **“तळियादिच्चपुरत्तप्पन पुरस्कार- 2026”** ये सभी उन्हें प्राप्त हुए हैं।
आचार्य के सराहनीय धर्म सेवा कार्यों को नवंबर 2023 में बैंकॉक में आयोजित 'वर्ल्ड हिंदू कांग्रेस' और उत्राडम तिरुनाळ इंस्टीट्यूट ऑफ कल्चर द्वारा 2023 में आयोजित 10वें उत्राडम तिरुनाळ स्मृति सम्मेलन में विशेष रूप से सम्मानित किया गया है।
आचार्य जी ने **'भारतप्रभावम'** नामक ग्रंथ की रचना की है।

अपने चारों ओर मंडराते खतरे से बेखबर सोए हुए हिंदू समाज की आत्मघाती उदासीनता से निराश हुए बिना, मान-अपमान या निंदा-स्तुति की परवाह किए बिना, प्रशंसा, सहानुभूति या मान्यता की इच्छा किए बिना, अपने प्राणों पर आने वाली गंभीर चुनौतियों को दरकिनार कर, सनातन धर्म विरोधियों के खिलाफ वीरता से लड़ रहे कर्मयोगी को हजारों-हजारों जन्मदिन की शुभकामनाएं!

आपके मिशन को पूरा करने के लिए हमारे प्राणों की अंतिम सांस तक समर्पित होकर यह शिष्य मंडली आपके साथ रहेगी, यह हम इस शुभ दिन पर प्रतिज्ञा करते हैं। कृपया इसे हमारी गुरुदक्षिणा के रूप में स्वीकार करें!

**"मन्नाथः श्रीकृपानाथो मद्गुरुः श्रीजगद्गुरुः।**
**मदात्मा सर्वभूतात्मा तस्मै श्रीगुरवे नमः॥"**

हमारे सद्गुरुदेव और आर्ष विद्या समाज के संस्थापक एवं मार्गदर्शक सद्गुरुदेव आचार्यश्री मनोज जी महाराज के चरण कमलों में सर्वस्व समर्पित करते हैं...!!!

**ॐ श्री गुरुभ्यो नमः**
प्रेमनिधि गुरुदेव को हृदय से जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं..!
🙏💕🥰💞🙏

**आर्ष विद्या समाजम**

आज (10/05/2026) श्री युक्तेश्वर गिरि महाराज जी की पावन जयंती है। 🌹आर्ष विद्या समाजम के संस्थापक एवं निदेशक आचार्यश्री के...
10/05/2026

आज (10/05/2026) श्री युक्तेश्वर गिरि महाराज जी की पावन जयंती है। 🌹

आर्ष विद्या समाजम के संस्थापक एवं निदेशक आचार्यश्री के. आर. मनोज जी की तीन प्रमुख आर्ष गुरु परंपराओं में से एक, असंख्य योगीश्वर महापुरुषों की गौरवशाली परंपरा है, जो अगस्त्य महर्षि से प्रारम्भ होकर महावतार बाबाजी, लाहिड़ी महाशय जी, श्री युक्तेश्वर गिरि जी, परमहंस योगानंद जी तथा अनेक अन्य पूज्य महान सिद्ध महात्माओं से होकर प्रवाहित होती है।

ॐ गुं गुरुभ्यो नमः 🕉️🕉️🙏

Why Some Hindu Youth Are Converting to Islam | एक सच्ची कहानी और माता-पिता के लिए सीख 🇮🇳 हिंदी:इस वीडियो में डॉ. दिलीप अ...
03/05/2026

Why Some Hindu Youth Are Converting to Islam | एक सच्ची कहानी और माता-पिता के लिए सीख 🇮🇳 हिंदी:

इस वीडियो में डॉ. दिलीप अमीन वास्तविक घटनाओं और एक महत्वपूर्ण कहानी के माध्यम से बताते हैं कि कुछ युवा अपनी धार्मिक पहचान को क्यों बदल रहे हैं और माता-पिता के लिए इससे क्या सीख मिलती है।

👉 वीडियो देखें: https://youtu.be/ycSr_g2Pl98

यदि आप इस विषय को समझना चाहते हैं या आपके आसपास ऐसे अनुभव रहे हैं, तो यह वीडियो आपके लिए महत्वपूर्ण है।

🙏 कृपया देखने के बाद अपनी राय जरूर साझा करें

Vide the English version that has gone viral with *26K hits in 5 days with 1400 comments*.
https://www.youtube.com/watch?v=SOC_wczno3g

7 likes. "क्या आपने अपने बच्चे को तैयार किया है? | घर वापसी की सच्चाई"

आज 21/04/2026 : श्रीशंकर जयंती 🪔🪔🙏🙏स्वामियों का जन्मदिवस केरल में “तत्त्वज्ञान दिवस” के रूप में मनाया जाता है।अज्ञान, वि...
21/04/2026

आज 21/04/2026 : श्रीशंकर जयंती 🪔🪔🙏🙏

स्वामियों का जन्मदिवस केरल में “तत्त्वज्ञान दिवस” के रूप में मनाया जाता है।

अज्ञान, विचारों के प्रदूषण और विकृतियों के घोर अंधकार में डूबी भारतभूमि का ज्ञानसूर्य बनकर पुनरुद्धार करने वाले श्री शंकराचार्य स्वामी जी का आज जन्मदिवस है। सनातन धर्म के तत्त्वदर्शनों एवं विभिन्न साधना-परंपराओं के आचार्य और व्याख्याता श्री शंकर ने केवल 32 वर्षों के अल्प जीवन में ही समस्त विश्व के “श्री शंकराचार्य” — जगद्गुरु के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त की।

संशुद्ध जीवन जीने वाले शिवगुरु एवं आर्याम्बा की निरंतर प्रार्थनाओं का दिव्य फल स्वयं श्री परमेश्वर का वरदान—श्री शंकर के रूप में प्रकट हुआ।

स्वामी जी का जीवनकाल सामान्यतः CE 788 से 820 के बीच माना जाता है। भारत के अनेक स्थानों पर श्री शंकर जयंती 6 अप्रैल को मनाई जाती है, जबकि केरल में मेष मास के आर्द्र नक्षत्र के दिन इसका आयोजन होता है। केरल ने विश्व को जो सर्वोच्च प्रतिभा और परम आचार्य प्रदान किए, वे थे जगद्गुरु श्री शंकराचार्य।

बौद्ध और जैन मतों तथा उनके दार्शनिक प्रभावों के निरंतर आक्रमण से स्वयं की रक्षा करने में असमर्थ होकर निराश हो चुके सज्जनों के संरक्षण तथा सनातन धर्म के पुनर्स्थापन हेतु श्री शंकर का अवतरण मानो मृतसंजीवनी के समान हुआ। दार्शनिक एवं धार्मिक तुलनात्मक चर्चाओं के माध्यम से उन्होंने सनातन धर्म के गौरव को पुनः प्रतिष्ठित किया तथा अद्वैत वेदान्त को युक्तिसंगत एवं सुदृढ़ व्याख्या प्रदान की। संवादों के दौरान श्री शंकर द्वारा उद्धृत पूर्वपक्ष के श्लोकों के माध्यम से ही कालांतर में लुप्तप्राय हो चुकी अनेक दार्शनिक परंपराओं के विचार आज भी संरक्षित रह सके हैं—जैसे कि लोकायत। दर्शन, तत्त्वचिंतन और धर्म के क्षेत्र में श्री शंकर द्वारा प्रस्तुत विचारों पर उस समय से लेकर आज तक गहन अध्ययन एवं चर्चाएँ—समर्थन और विरोध, दोनों रूपों में—निरंतर होती आ रही हैं। ब्रह्मसूत्र, भगवद्गीता और उपनिषदों पर उनके भाष्यों से प्रारंभ हुए संवाद आज तक निरंतर जारी हैं; अद्वैत चिंतन परंपरा को सार्वलौकिक स्वीकृति और मान्यता दिलाने में स्वामी जी की सफलता निर्विवाद है।

अत्यंत सूक्ष्म बुद्धि से ही ग्रहण किए जा सकने वाले दार्शनिक विमर्श सामान्य जन के आध्यात्मिक उन्नयन के लिए पर्याप्त नहीं हैं—इस तथ्य को समझते हुए, श्री शंकर ने अनेक दिव्य स्तोत्रों की रचना के साथ-साथ परमशिव, आदिशक्ति, गणपति, स्कन्द, विष्णु एवं सूर्य की उपासना हेतु षण्मत परंपरा की स्थापना की। इसके साथ ही, उन्होंने दशनामी परंपरा के माध्यम से संन्यास को व्यवस्थित रूप प्रदान किया तथा सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए कांची कामकोटि पीठ सहित चार प्रमुख मठों की स्थापना की—उत्तर में बदरी का ज्योतिर्मठ, पश्चिम में गुजरात का द्वारका पीठ, दक्षिण में श्रृंगेरी का शारदा पीठ और पूर्व में पुरी का गोवर्धन मठ। इन मठों के लिए उन्होंने अपने चार प्रमुख शिष्यों को आचार्य पद पर स्थापित किया और इस प्रकार राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करने में भी श्री शंकराचार्य का महान योगदान रहा।

भाष्यों के अतिरिक्त उन्होंने दिव्य स्तोत्रों सहित तीन सौ से अधिक स्वतंत्र ग्रंथों की रचना की। समस्त भारतवर्ष का भ्रमण कर विद्वानों एवं चिंतकों को सत्य का बोध कराने वाली उनकी शंकर दिग्विजय ने उन्हें सर्वज्ञपीठ पर प्रतिष्ठित किया और विश्व ने उन्हें “जगद्गुरु” के रूप में स्वीकार किया।

हमारे जीवन का परम लक्ष्य क्या है? सांसारिक और पारलौकिक उपलब्धियों से परे शाश्वत सफलता कैसे प्राप्त की जाए? सनातन धर्म पर आधारित जीवन कैसे जिया जाए?—ऐसे जीवनोन्मुख गहन प्रश्नों और विचारों को जन-जन तक पहुँचाने में उस ज्ञानावतार कर्मयोगी को सफलता प्राप्त हुई।

सदाशिव समारम्भाम्
शंकराचार्य मध्यमाम्
अस्मदाचार्य पर्यन्ताम्
वन्दे गुरुपरम्पराम् ॥

श्री शंकर जयंती के पावन अवसर पर उस परमगुरु के पावन चरणकमलों में आर्ष विद्या समाज शत-कोटि प्रणाम अर्पित करता है। 🙏

नमामि भागवतपाद शंकरम लोकशंकरम

सादर,
आर्ष विद्या समाजम 🚩

आज (21/04/2026): संपूज्य गुरुदेव श्री निखिलेश्वरानंद परमहंस जी का जन्मदिवस 🙏🪷🕉️🪷🙏21 अप्रैल 1933 को राजस्थान के जोधपुर के...
21/04/2026

आज (21/04/2026): संपूज्य गुरुदेव श्री निखिलेश्वरानंद परमहंस जी का जन्मदिवस 🙏🪷🕉️🪷🙏

21 अप्रैल 1933 को राजस्थान के जोधपुर के एक गाँव में पारंपरिक ब्राह्मण परिवार में पंडित मुल्तान चंद श्रीमाली जी एवं रूपा देवी के सुपुत्र के रूप में जन्मे नारायण दत्त श्रीमाली जी ही आगे चलकर आधुनिक युग के ऋषिश्रेष्ठ, परम पूज्य स्वामी निखिलेश्वरानंद परमहंस बने।
श्रीमाली जी बीसवीं सदी के महान ऋषि थे।

यद्यपि उन्हें अल्पायु में ही भगवती देवी से विवाह करना पड़ा, तथापि श्रीमाली जी का मन ज्ञान-विज्ञान की साधना में ही निरंतर प्रवृत्त रहा। वे उन महाविद्याओं की प्राप्ति हेतु समर्पित रहे, जो सामान्य जन के लिए दुर्लभ थीं।

क्या हमारे भारतीय शास्त्रों में वर्णित सभी बातें सत्य हैं? इन्हें प्रामाणिक रूप से कहाँ से सीखा जा सकता है? ऐसे ही प्रश्नों और विचारों में निमग्न होकर, सत्य की खोज के लिए उन्होंने गृह त्याग कर दिया। इसके पश्चात उन्होंने संन्यास ग्रहण किया और अनेक गुरुओं की खोज में भटकते रहे। उनमें से कई मिथ्या और आडंबरपूर्ण भी निकले। कुछ आचार्य ऐसे भी थे, जिन्होंने उन्हें अत्यंत कठोर कष्ट दिए और कठोर अनुशासन के माध्यम से परीक्षा ली। असंख्य कठोर कष्टों और यातनाओं के पश्चात उन्हें योग्य गुरुओं का सान्निध्य प्राप्त हुआ और वे सच्चे ज्ञान को अर्जित कर सके। ऋषिमंडल के सिद्धाश्रम के परमाचार्य, परम पूज्य सद्गुरु स्वामी सच्चिदानंद परमहंस के शिष्य बनने के उपरांत उन्होंने समस्त ज्ञान-विज्ञान में पारंगतता प्राप्त की। बीस वर्षों की कठोर तपश्चर्या के बाद सिद्धि प्राप्त कर, गुरु श्री सच्चिदानंद परमहंस की विशेष आज्ञा से वे पुनः गृहस्थाश्रम का पालन करने हेतु अपने घर लौट आए। गृह लौटने के पश्चात उन्होंने हिंदी अध्यापक के रूप में भी कार्य किया। भगवती देवी और श्रीमाली जी के यहाँ तीन पुत्रों का जन्म हुआ—नंदकिशोर श्रीमाली, कैलाशचंद्र श्रीमाली तथा अरविंद श्रीमाली।

लुप्तप्राय भारतीय ज्ञान-विज्ञान को पुनर्जीवित कर तथा विद्यमान ज्ञान को अनुसंधान और तपस्या के माध्यम से पूर्ण शास्त्र के रूप में प्रस्तुत करने वाले, श्रीमाली जी बीसवीं सदी के महान ऋषि थे। भारतीय सांस्कृतिक और वैज्ञानिकी परंपरा, सनातन धर्म की शिक्षाओं तथा गूढ़ ज्ञान की विभिन्न धाराओं को प्रकाशित और प्रखर बनाने वाला उनका व्यक्तित्व अत्यंत विलक्षण था। क्रियायोग के रूप में प्रसिद्ध क्रिया कुंडलिनी योग, भारतीय सम्मोहन विज्ञान, मंत्र-तंत्र-यंत्र विद्या, हस्तरेखा शास्त्र, ज्योतिष, अंक ज्योतिष, प्राण विद्या, पारद विज्ञान, स्वर्ण तंत्र, आयुर्वेद तथा सूर्य विज्ञान जैसी गूढ़ ज्ञान-विज्ञान की विधाओं को जनसुलभ बनाने हेतु श्रीमाली जी ने निरंतर प्रयास किया। 1981 में उन्होंने “मंत्र-तंत्र-यंत्र विज्ञान” नामक पत्रिका का शुभारंभ किया। साथ ही, उन्होंने “सिद्धाश्रम साधक परिवार” नामक संगठन की भी स्थापना की। वे उन दिव्य विद्याओं को, जो भ्रांतियों और अज्ञानता के कारण सामान्य जन के लिए दुर्लभ और अप्राप्य मानी जाती थीं, विधिवत रूप से जनसामान्य तक पहुँचाने के लिए सदैव तत्पर रहे।

अनेक देशों की सहभागिता वाले वर्ल्ड एस्ट्रोलॉजी कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष के रूप में श्रीमाली जी ने प्रतिष्ठित भूमिका निभाई। उन्हें 1987 में “तंत्र शिरोमणि” तथा 1988 में “मंत्र शिरोमणि” जैसी विशिष्ट उपाधियों से सम्मानित किया गया। 1982 में भारत के तत्कालीन उपराष्ट्रपति डॉ. बी. डी. जत्ती द्वारा उन्हें “महामहोपाध्याय” की उपाधि प्रदान कर सम्मानित किया गया। इसके उपरांत, 1989 में भारत के उपराष्ट्रपति डॉ. शंकर दयाल शर्मा ने उन्हें “समाज शिरोमणि” पुरस्कार से सम्मानित किया। 1991 में उनके उत्कृष्ट सामाजिक एवं आध्यात्मिक कार्यों के लिए नेपाल के प्रधानमंत्री भट्टाराई द्वारा भी उन्हें सम्मानित किया गया।

Meditation, Power of Ta**ra, Practical Hypnotism , Practical Palmistry,
Essence of Sakthipat, Ten Mahavidyas, Gopaniya Durlabh Mantrom Ke Rahsya, Himalaya Ke Yogiyom Ki Siddhian, Shishyopanishad, Durlabhopanishad जैसे अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथों सहित श्रीमाली जी ने हिंदी और अंग्रेज़ी में विपुल साहित्य की रचना की है।

हमारे शास्त्रों में केवल संकेत रूप में विद्यमान परा एवं अपरा विद्याओं के संवर्धन में अद्वितीय स्थान रखने वाले पूज्य गुरुदेव श्रीमाली जी के शिष्य ही आर्ष विद्या समाज के संस्थापक एवं निदेशक आचार्य श्री मनोज जी हैं, जिन्हें उनसे शक्तिपात दीक्षा भी प्राप्त हुई है।

3 जुलाई 1998 को महासमाधि को प्राप्त हमारे परमगुरु, संपूज्य गुरुदेव श्रीमाली जी, अर्थात् स्वामी निखिलेश्वरानंद परमहंस जी के पावन श्रीचरणों में शत-शत कोटि प्रणाम। 🙏🪷🙏🪷🙏

सादर,
आर्ष विद्या समाजम 🚩

01/04/2026

आर्ष विद्या समाजम् तमिलनाडु केंद्र का उद्घाटन (30/03/2026)

आर्ष विद्या समाजम का तमिलनाडु कार्यकेंद्र साकार हुआ!   चेन्नै :आर्ष विद्या समाजम् के नए कार्य केंद्र का उद्घाटन तमिलनाडु...
31/03/2026

आर्ष विद्या समाजम का तमिलनाडु कार्यकेंद्र साकार हुआ!

चेन्नै :

आर्ष विद्या समाजम् के नए कार्य केंद्र का उद्घाटन तमिलनाडु के तिरुवल्लूर में दिनांक 30/03/2023 (सोमवार) को प्रातः 11:30 बजे, धर्मरक्षण समिति के स्टेट जनरल सेक्रेटरी एवं ट्रस्टी श्री पी. गणपति जी ने भद्रदीप प्रज्वलित कर उद्घाटन किया। मुख्य भाषण भी उन्होंने ही दिया। आर्ष विद्या समाजम् के निदेशक आचार्य श्री मनोज जी महाराज की अध्यक्षता में आयोजित कार्यक्रम में, धर्मरक्षण समिति के ट्रस्टी एवं ट्रेनिंग इंचार्ज श्री पांडियन जी, धर्मरक्षण समिति के ट्रस्टी श्री के. प्रभाकरन जी, श्रीमती श्रीदेवी अम्मा (शंकर ग्रुप की चेयरपर्सन), श्रीमती अंजना सतीश जी (शंकर ग्रुप – निदेशक, एच.आर.), श्री सुंदरम जी (बी.जे.पी., तिरुवल्लूर पूर्व जिला अध्यक्ष), श्री लक्ष्मी नारायण जी, श्री विश्वनाथन जी, श्री रामकृष्ण अय्यंगार जी, श्रीमती शशिकला जी, श्री नंदकुमार जी तथा श्री सनिल जी ने शुभकामनाएं अर्पित करते हुए अपने विचार व्यक्त किए। श्रीदेवी शंकर की ईश्वर प्रार्थना से प्रारंभ हुए कार्यक्रम में, विशाली शेट्टी ने स्वागत भाषण दिया तथा स्मिता भट्ट ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया।

तिरुवल्लूर जिले के उथुकोट्टई तालुक, कन्निगैपैर पी.ओ. में स्थित कृष्णपुरम कंडिगई के नए केंद्र में प्रातः 11:30 बजे से 12:30 बजे तक उद्घाटन समारोह आयोजित किया गया। सांस्कृतिक, सामाजिक एवं राजनीतिक क्षेत्रों के अनेक प्रमुख व्यक्तियों ने इसमें सहभागिता की।

सनातन धर्म के पंचमहाकर्तव्यों के निर्वाह के माध्यम से “विश्व को श्रेष्ठ बनाना” इस लक्ष्य की सिद्धि हेतु, आर्षविद्या समाजम् द्वारा दिन-रात सक्रिय रूप से आयोजित विभिन्न शैक्षणिक, सेवा, सशक्तिकरण और संरक्षण कार्य तमिलनाडु केंद्र के नेतृत्व में आयोजित किए जाएंगे।

एक मंगलमय समाचार!आर्ष विद्या समाज का तमिलनाडु कार्यकेंद्र अब साकार होने वाला है।पेरियपालयम, तिरुवल्लूर जिले में स्थित इस...
29/03/2026

एक मंगलमय समाचार!

आर्ष विद्या समाज का तमिलनाडु कार्यकेंद्र अब साकार होने वाला है।

पेरियपालयम, तिरुवल्लूर जिले में स्थित इस केंद्र का उद्घाटन *30 मार्च 2026* (सोमवार) को *प्रातः 11:30 बजे* आयोजित किया जाएगा।

इस शुभ अवसर पर राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों के अनेक प्रतिष्ठित व्यक्तित्व उपस्थित रहेंगे।

आप सभी का हार्दिक स्वागत है।
🙏🌷🕉️🌷🙏

स्नेह और आदर सहित,
आर्ष विद्या समाज

अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें:
9074676026
7356613488
7558926603

राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए वीर बलिदान देकर युवाओं को सदैव प्रेरणा देने वाले शहीद भगत सिंह, शहीद सुखदेव और शहीद शिवराम ...
23/03/2026

राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए वीर बलिदान देकर युवाओं को सदैव प्रेरणा देने वाले शहीद भगत सिंह, शहीद सुखदेव और शहीद शिवराम राजगुरु के बलिदान को स्मरण करने का राष्ट्रीय दिवस 'वीर बलिदान दिवस’ है। 23 मार्च 1931 को लाहौर जेल में इन तीनों को एक ही दिन ब्रिटिश सरकार ने फाँसी दी थी।

ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला देने वाले इन साहसी क्रांतिकारी भारत पुत्रों को भावभीनी श्रद्धांजलि एवं सादर प्रणाम।
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आर्ष विद्या समाजम्

मार्च 17 : श्री गौतम महर्षि अनुस्मरण दिवससप्तऋषियों में प्रमुख स्थान रखने वाले गौतम महर्षि वैदिक काल के महानतम ऋषियों मे...
17/03/2026

मार्च 17 : श्री गौतम महर्षि अनुस्मरण दिवस

सप्तऋषियों में प्रमुख स्थान रखने वाले गौतम महर्षि वैदिक काल के महानतम ऋषियों में से एक माने जाते हैं। वे अंगिरस वंश की गौरवशाली परंपरा में एक श्रेष्ठ योगी के रूप में विख्यात हैं। उन्होंने धर्मशास्त्र, वेदाध्ययन और तर्कशास्त्र के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिए।

षड्दर्शनों में से न्यायसूत्र के उपजाता, प्रवर्तक और प्रयोक्ता के रूप में भी श्री गौतम महर्षि प्रसिद्ध हैं। आर्ष भारत की गैर-नास्तिक तर्कपरंपरा का स्वरूप इस दर्शन में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। सही ज्ञान कैसे प्राप्त किया जाए, यह सिखाने वाला भारतीय तर्कशास्त्र (Indian Logic) ही न्याय दर्शन है। सत्य ज्ञान कैसे प्राप्त हो, सही और गलत में कैसे भेद किया जाए—इन विषयों पर विचार करने वाला ज्ञानशास्त्र (Epistemology) तथा प्रमाण दर्शन भी महर्षि गौतम द्वारा रचित न्यायसूत्र है।

न्यायसूत्र में प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द—इन चार प्रमाणों का प्रतिपादन किया गया है।

ज्ञानचक्षु खोलने हेतु शास्त्र का प्रकाश देने वाले श्री गौतम महर्षि के पादपद्मों में कोटि-कोटि प्रणाम।
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