07/03/2026
सोन नदी के पानी हिलोर मारे
प्रीत मनवा म हमरे जोर मारे
चंदन! चंदन! चंदन!
ओह चंदन! तुम भले ही किसी उपन्यास के पात्र हो, लेकिन तुम्हारी रचना कहीं-न-कहीं से प्रेरित होकर ही की गई है। इस दुनियावी वन में तुम्हारे जैसे न जाने कितने ही चंदन और भी तो हैं, जो एक सुख की तलाश में भटक रहे हैं। लेकिन...?
मैंने जब तुम्हारी कहानी पढ़ी, तो हँसना तो खैर क्या ही आएगा, मैं तो रो भी नहीं सकी। इतनी सुन्न हो गई। तुम्हारे जैसा जीवन जिसे मिले, उसके पास विक्षिप्त होने के अलावा और बचता भी भला क्या है? लेकिन तुम? कभी-कभी सोचती हूँ कि इस तरह के जीवन के लिए विधाता जिन नायकों को चुनता है, क्यों चुनता है? क्या प्रयोजन? किस अभिप्राय से? क्या सिर्फ दूसरों की कहानी पूरी करने के लिए? क्योंकि अपनी तो कोई कहानी नहीं होती।
गुंजा ने कहा था न! तुमसे "सिर्फ डेढ़ पूरी खाई, यही मरद बनते हो?" चंदन! तुम अपने जीवन में इतने हार गये, लेकिन अपने गमों से बचने के लिए तुमने शराब का सहारा नहीं लिया। जो मुझे गुंजा मिलती, तो मैं कहती "ऐसे मरद बनते हैं।" पर अब गुंजा भी कहाँ मिलेगी। जीवन से हारे हुए लोगों के लिए तुम प्रेरणा हो चंदन!
तुमने अपने खिलंदड़पन को त्याग कर भले ही चुप्पी साध ली हो, लेकिन मैंने, मैंने तुम्हारी मौन की भाषा सुन ली चंदन!
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जब कभी जी में ये इच्छा उठी कि हर वह सुख हम भी पा लें, जो दुनिया जग में सबको मिला है। बूढ़े बरगद, दीपासत्ती से हमने भी एक सुख माँग लिया। सुख क्या माँगा, जैसे बिपत ही माँग ली। तब हमने जाना कि, अपने लिए कभी सुख नहीं माँगना चाहिए। नहीं तो एक फूल देकर विधाता हजारों नागफनी भी दे देते हैं। ऐसे नागफनियों से भरी राह में चलना, चाहे जितना दूभर हो लेकिन चलना तो पड़ता है। काहे कि सबका अपना-अपना भाग होता है। मानुस! घर-दुआर बाँट सकता है, साज-सामान बाँट सकता है, माल-गोरू बाँट सकता है लेकिन भाग? भाग नहीं बाँट सकता।
भाग इतना जोरावर होता है कि, हम उसके आगे सिर्फ मूड़ी निहुरा सकते हैं। लड़ नहीं सकते, जीत नहीं सकते। जानते हैं क्यों? क्योंकि हमने अपने या अपनों के दुखों में जब-जब ईसर से सहायता माँगी, वो सुना ही नहीं। हमें लगा हमारी आवाज उस तक पहुँची ही नहीं, तो हम जरा और दम से उसको पुकारने लगे। उसने फिर भी नहीं सुना। हमने अपनी हथेलियां आपस में कस लीं, आँखें मींच लीं, जबड़े भींच लिये और पांव जमीन पर मजबूती से गाड़ दिये। और आवाज मुँह से नहीं, आत्मा से निकाली कि सायद इतना बल लगाकर बुलाने से ईसर सुन लेंगे, लेकिन नहीं सुनें। हम हार गये। अब इससे बढ़कर आखिर हम कर भी क्या सकते थे? सिवा एक जुगत के, कि अब हम ईसर के आगे अपना सर पटकें। एक नहीं, कई-कई बार पटकें। तब सायद उन तक हमारी आवाज पहुंचे। हमने वह भी कर लिया। और पता है? ईसर तब भी नहीं सुना। अब बताओ हमारे पास क्या चारा बचा? भाग की इस मार से बचने का? सिवा इसके, कि बाघ रूपी भाग के आगे हम किसी हिरन के बच्चे की तरह नतमस्तक हो आत्म समर्पण कर दें और मिमियाएं भी न! हमने वही किया।
आखिर हमारा दोष क्या था? बस इतना, कि हमने भी प्रेम चाह लिया था। अब भला हमें क्या मालूम था, कि प्रेम हमारे लिए पांडु की तरह सापित है। नहीं तो हम ऐसी भूल कभी न करते। भला हम क्या जानें कि जो प्रेम सबके जीवन में बिखरा-बिखरा घूम रहा है, उस प्रेम की एक बूँद जो हमें मिल जाएगी तो, कपार पर आसमान ही गिर पड़ेगा, धरती ही फट जाएगी। एक प्रेम ही तो चाहा था, कुबेर का खजाना थोड़ी माँग लिये थे, इंदर का सिंघासन थोड़ी छीन लिए थे। जिस प्रेम को सारे जग ने पाया, उसे बस! हमने नहीं। जिस प्रेम पर जोर सारे जग का है, एक बस! हमारा नहीं। जिस प्रेम ने सारी दुनिया को अपनाया, बस! हमें नहीं
अब दिन आते हैं जाते हैं, साल आते हैं जाते हैं। हम न उन्हें जीते हैं, न याद रखते हैं। कि गुजरे समय ने हमें क्या दिया? क्या लिया? उमिर गुजर रही है, कैसे गुजर रही है? कैसे भी गुजरे, हमें फरक नहीं पड़ता। हमारे लिए मरना और जीना अब एक समान है। अब सिर्फ जरूरतें रह गई हैं, सौक मर गये हैं। रिस्ते रह गये हैं, मन मर गया है। मकान रह गया है, घर मर गया है। साँस रह गई है और शरीर... वह भी तो मर सा गया है।
पाने को तो हम अभी भी क्या-कुछ नहीं पा सकते? लेकिन, अब वो मन नहीं रहा। मन! हाँ! हमारा मन कहीं बिला गया है। जामुन की परती में बौराता हुआ मन, सोना में डोंगी चलाता हुआ मन, भौजाई से चुहल करता हुआ मन, फगुआ में अबरख उड़ाता हुआ मन, गाँव में जोगीरा गाता हुआ मन अब कभी नहीं मिलेगा, कहीं नहीं मिलेगा। हम फूस की पलानी में चुप बैठ अपने अतीत और भबिस के वीभत्स चित्र देखते रहते हैं, उनसे लड़ते, संघर्ष करते रहते हैं। हमारा तो जनम ही संघर्ष के लिए हुआ है। हमारे शांत चेहरे में छुपा एक बिकराल ज्वार है। किसको दिखायें? किसको पतियाएं? हमारा है कौन? कभी-कभी सोचते हैं, तो पाते हैं कि वह चंदन कोई और था, किसी और जनम का।
हमारे कानों में जोर-जोर से आवाजें गूँजती हैं। भौजी की, भइया के आदेश की और काका की "चंदन भूजा या रस मिलेगा क्या?" और जब आँखें खोलता हूँ, तो जैसे किसी जंगली मंदिर के वीराने में एक मूरत चुपचाप पड़ी रहती है, खुद को अपने घर में वैसे ही पाता हूँ।
हमारा क्या है? हम इस काया में जोत दिये गये हैं भाग की जी हजूरी करने के लिए, कर रहे हैं। जिस दिन ये हल उतरेगा, हम चले जायेंगे। तब तक के लिए हम खंड के निखहरे बँसखट में पड़े अपने घर के भाँय-भाँय का सोर सुन रहे हैं। अँजोर तिवारी के घर आकर भी हमारी जिनगी में कोई अँजोर न हुआ।
सच ही तो है - "चिठिया हो तो हर कोई बाँचे, भाग न बाँचे कोय, करमवा बैरी हो गये हमार।"
~डॉली परिहार 🙏🌻
#सृजन_फिर_से