02/01/2019
Jay guru dev
☀ प्रभु प्रेमी संघ 🌏
02 जनवरी, 2019 (बुधवार)
पूज्य सद्गुरुदेव आशिषवचनम्
।। श्री: कृपा ।।
🌿 पूज्य "सदगुरुदेव" जी ने कहा - जिस प्रकार सूर्य के प्रकाश में सघन-तिमिर कहीं भी दृष्टिगोचर नहीं होता, उसी प्रकार सत्संग-स्वाध्याय द्वारा उपार्जित ज्ञान प्रकाश भ्रम-भय, संशय और अज्ञान-जनित अंधकार का निर्मूलन कर जीवन सिद्धि में सहायक है। अतः जीवन में सत्संग और स्वाध्याय अबाध रहे ..! सत्संग-स्वाध्याय, श्रवण-मनन अनुकरण के विषय हैं। सत्संग से प्राप्त सद्विचारों का व्यवहारिक रूपांतरण परमावश्यक है। उत्कृष्ट एवं प्रौढ़ विचारों को अधिकाधिक समय तक हमारे मस्तिष्क में स्थान मिलता रहे ऐसा प्रबंध यदि कर लिया जाए तो कुछ ही दिनों में अपनी इच्छा, अभिलाषा और प्रवृति उसी दिशा में ढल जाएगी और बाह्य जीवन में वह सात्विक परिवर्तन स्पष्ट दृष्टिगोचर होने लगेगा। विचारों की शक्ति महान है, उससे हमारा जीवन तो बदलेगा ही, विश्व का परिदृश्य भी बदल सकता है। मनुष्य के आंतरिक उत्थान, आंतरिक उत्कर्ष, आत्मिक विकास के लिए क्या करना चाहिए? और कैसे करना चाहिए? इसके समाधान के लिए चार चीजें महत्वपूर्ण हैं। इन्हीं चार चीजों के आधार पर हमारी आत्मिक उन्नति टिकी हुई है। और, वे चार आधार हैं - साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा। ये चारों ऐसे हैं जिनमें से एक को भी आत्मोत्कर्ष के लिए छोड़ा नहीं जा सकता। इनमें से एक भी ऐसा नहीं है जिसके बिना हमारे जीवन का उत्थान हो सके। चारों आपस में अविच्छिन्न रूप से जुड़े हुए हैं, जिस तरीके के कई तरह की चौकड़ियाँ आपस में जुड़ी हुई हैं, जैसे - बीज, जमीन, खाद और पानी। चारों जब तक नहीं मिलेंगे, कृषि हो ही नहीं सकती। उसका बढ़ना संभव नहीं है। व्यापार के लिए मात्र पूँजी ही पर्याप्त नहीं है। पूँजी के साथ-साथ अनुभव, वस्तुओं की माँग, और ग्राहक ये चारों आवश्यक हैं। इन चारों को जब आप ढूँढ़ लेंगे तो आपका व्यापार चलेगा और उसमें सफलता भी मिलेगी। मकान बनाना हो तो उसके लिए ईंट, सीमेंट, लोहा और लकड़ी इन चारों वस्तुओं की आवश्यकता पड़ती है। चारों में से एक भी वस्तु यदि कम पड़ेगी तो मकान नहीं बन सकती। इसी तरह सफलता प्राप्त करने के लिए मनुष्य का कौशल आवश्यक है, साधन आवश्यक है, सहयोग आवश्यक है और अवसर आवश्यक है। इन चारों में से एक भी कम पड़ेगी तो समझदार आदमी भी सफलता नहीं प्राप्त कर सकेगा। जीवन-निर्वाह के लिए भोजन, विश्राम, मल-विसर्जन और श्रम-उपार्जन की आवश्यकता होती है। ये चारों क्रियाएँ होती रहेगी तभी हम जिंदा रहेंगे। ठीक इसी प्रकार से आत्मिक जीवन का विकास करने के लिए अथवा आत्मोत्कर्ष के लिए साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा का होना परम आवश्यक है, अन्यथा व्यक्ति-निर्माण का उद्देश्य पूरा नहीं हो सकेगा ...।
🌿 पूज्य "आचार्यश्री" जी ने कहा - मन की मलिनता को धोने के लिए स्वाध्याय अति आवश्यक है। श्रेष्ठ विचार अपने भीतर धारण करने के लिए हमें श्रेष्ठ पुरुषों का सत्संग करना चाहिए। स्वाध्याय को आध्यात्मिक विकास के लिए अत्यधिक आवश्यक माना गया है। स्वाध्याय का महत्त्व भजन से किसी भी प्रकार से कम नहीं है। भजन का उद्देश्य भी यही है कि हमारे विचारों का परिष्कार हो और हम श्रेष्ठ व्यक्तित्व की ओर आगे-आगे बढ़े। स्वाध्याय से हम महापुरुषों को अपना मित्र बना सकते हैं और जब भी आवश्यकता पड़ती है, तब उनसे खुले मन से किसी भी जिज्ञासा का समाधान कर सकते हैं। जिस प्रकार शरीर को स्वच्छ रखने के लिए स्नान करना आवश्यक है, कपड़े धोना आवश्यक है, उसी प्रकार से स्वाध्याय के द्वारा अथवा श्रेष्ठ विचारों के द्वारा अपने मन के ऊपर पड़ने वाले कषाय−कल्मषों को धोना आवश्यक है। स्वाध्याय से हमें प्रेरणा मिलती है, दिशाएँ मिलती हैं और मार्गदर्शन मिलता है। श्रेष्ठ सत्पुरुष हमारे सान्निध्य में आते हैं और हमें सद् मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं अथवा मार्गदर्शन करते हैं। ये सभी आवश्यकताएँ स्वाध्याय से पूरी होती हैं। इसलिए स्वाध्याय का साधना और भजन के बराबर ही मूल्य और महत्त्व समझना चाहिए। मानव जीवन एक अलभ्य अवसर एवं सुर-दुर्लभ अवसर है, इसको तुच्छ बातों में नष्ट न करके ऐसा सदुपयोग करना चाहिए जिससे जीवन लक्ष्य की प्राप्ति हो सके। ताकि आनन्द, उल्लास और संतोष के साथ जीया जाये। यदि यह निष्कर्ष सच्चे मन से निकले तो निस्संदेह उसकी पूर्ति होना, व्यवस्था बनना कुछ भी कठिन नहीं है। साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा इन चार भागों में अध्यात्म विभक्त है। चारों को मिलाकर ही आत्म-कल्याण की कोई सर्वांगपूर्ण व्यवस्था बन सकती है। इसके लिए आवश्यकता इस बात की है कि हम विश्वास पूर्वक इस आदर्श पर निष्ठा रखें कि अन्य आवश्यक कार्यों की तरह आत्म-कल्याण का कार्यक्रम भी उपेक्षणीय नहीं वरन अन्य साधारण कार्यों की अपेक्षा अधिक महत्त्वपूर्ण है और महत्त्वपूर्ण कार्यों के लिए सोच-विचार करते रहना पड़ता है, उन्हें समय देना पड़ता है और श्रम करना पड़ता है। यह तीनों ही साधन जब तक आत्म-कल्याण योजना में नहीं लगेंगे, तब तक उसकी पूर्ति किसी भी प्रकार से संभव नहीं होगी। हमें अपने मस्तिष्क में आत्म-कल्याण की आवश्यकता और योजना को अधिकाधिक महत्व देते रहना होगा और उसके लिए समय मिलते ही गहराई से सोच-विचार करना होगा। दिन में ऐसा बहुत सा समय होता है जब शरीर आराम कर रहा होता है और मन खाली रहता है। अतः ऐसा जितना भी समय मिले उसे आत्म-कल्याण संबंधी समस्याओं को समझने और सुलझाने में लगाए रहना चाहिए है ...।
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