04/10/2024
अप्रैल की ब्रीज में बर्लिन की ओर,
एक साहसी नेता, छोड़ कर विचारों का चोर।
फासिज्म की छाया में, वो खोजता था प्रकाश,
भारत की आज़ादी के लिए, था तैयार हर आस।
बोस, वो दूरदर्शी, उत्साह से भरा,
नाज़ी की जंजीरों में, एक चिंगारी मिला।
दस हजार सैनिक, बंदी पर गर्वित,
उसने जगाई उनकी आत्मा, दी नई स्फूर्ति।
हिटलर की नज़रों में, वो महसूस करता था बल,
एक नेता की शक्ति, अनुशासन का जल।
आभूषणों का उपहार, एक पल अद्भुत,
युद्ध के इस संग्राम में, वो हुआ प्रगट।
पर जैसे-जैसे बीते दिन, बिन वतन की रज,
वो फंस गया निराशा में, हो गया उदास।
वो देखता रहा संघर्ष के ज्वार-भाटे,
घर की याद में, वो बेताब हो जाता।
पूर्व की लहरें उठीं, जापान की ताकत आई,
हर विजय के साथ, उसकी आत्मा ने गाई।
एक साहसी राह पर, एक पनडुब्बी में सवार,
खतरनाक यात्रा पर, निकला वो बेख़ौफ़ यार।
टोक्यो की तट पर, उसने किया आगाज़,
टोइजो का आश्वासन, साथ में था एक राज।
अस्थायी सरकार की घोषणा, गर्व से की,
युद्ध की पुकार, उसकी धड़कन में थी।
आज़ाद हिंद फौज, स्वतंत्रता की सेना,
सभी धर्मों के लोग, एक साथ हुए वो रत्ना।
"दिल्ली की ओर चलो!" गूंजे थे गगन में,
स्वतंत्रता की इस लड़ाई में, भव्य था मन में।
पर विद्रोह के सपने, मौन हो गए,
ब्रिटिश का आतंक, ढीला ना हुआ, वो रोते रहे।
फिर भी बोस खड़े रहे, निराशा का सामना किया,
स्वतंत्रता के लिए, उनका जोश बढ़ा।
मानसून की बारिश ने, सपने धो डाले,
पर उनकी इच्छाशक्ति, कभी ना झुकी, ना काबू में आई।
"अंतिम आदमी तक, हम लड़ेंगे!" उनकी आवाज़,
स्वतंत्रता की इस चाह में, मिली सबको राज।
पर किस्मत की लहरें, और साए बढ़ गए,
जब सहयोगी फेल हुए, वो और मजबूत हो गए।
'45 की बसंत में, अंत समीप आया,
नए साथी की तलाश में, वो आगे बढ़ा।
और फिर, एक विमान, भाग्य का खेल,
महानता की कथा, बनी एक निराशा का मेल।
टाइहोकू के आसमान में, खो गया वो दीवाना,
पर हमारे दिलों में, वो हमेशा रहेगा ज़िंदा।
टोक्यो की राख से, उसकी आत्मा उड़ी,
नेताजी, योद्धा, हम तुझे नमन करें।
साहस का प्रतीक, बलिदान का स्वर,
हर धड़कन में बसे, वो जीतेगा अब और।
तो याद करें हम, इतिहास में जो लिखा,
बोस की विरासत, अमर flame का चिराग।
स्वतंत्रता के गीत में, हम गाएंगे जिंदाबाद,
भारत के दिल में, उसकी आत्मा है सदा।