03/09/2025
भारी बारिश में मैं अभी घर लौटा हूँ कदम भीग चुके हैं, पर मन को मना रहा हूँ कि फाइनली, फाइनली… प्रताप बर्मन को न्याय मिल गया।
रेलवे, राज्य सरकार, कलेक्टर और ठेकेदार सभी ने मिलकर लगभग 31 लाख रुपये थमा रहे हैं। पत्नी को नौकरी का आश्वासन दिया गया है—भले ही सरकारी न हो। बेटे की पढ़ाई की जिम्मेदारी उठाने का वादा भी हो चुका है, पर सवाल यही है — क्या यह न्याय है ?
और न्याय नहीं है भीड़ भी हमे मानना ही पड़ेगा।
आज एक और सच्चाई हमारे सामने आई है हमारी राजनीतिक हैसियत की
अगर कोई अगड़ी जाति से है तो मुआवज़ा 50 लाख।
और अगर कोई अनुसूचित जाति से है तो मुश्किल से 5 लाख!
वो भी तब, जब समाज का युवा सड़क पर उतरकर अपनी जान, अपना समय, अपना भविष्य दांव पर लगाता है।
कितनी विडंबना है कि
हमें न्याय भी सड़क पर उतरकर, नारे लगाकर, तेज धूप में खुद को तपा कर, और भरी बारिश में भींगा कर मिलता है।
और जिन्होंने सत्ता में बैठकर हमारी सुरक्षा का वादा किया था, वोटों के लिए हमारे दरवाज़े पर झुके थे, वही समाज में किसी की लाश गिरते वक्त चुप क्यों हो जाते हैं?
यह घटना सिर्फ प्रताप बर्मन की नहीं है, यह हमारी स्थिति का आईना है।
हम बार-बार समझते हैं कि संविधान हमें बराबरी देता है, मगर जमीन पर खड़ा होकर देखिए हमारी जान, हमारा खून, और हमारा श्रम अब भी सस्ता है।
हमारे आँसू अब भी राजनीतिक सौदों में तौले जाते हैं।
आज सवाल सत्ता से नहीं, खुद से है—
हम कितनी बार सड़क पर उतरेंगे?
कितनी बार बारिश और धूप में डंडे झेलेंगे?
और कब तक हमारी चीख़ें सत्ता के कानों तक पहुँचने के लिए भीड़ की ज़रूरत महसूस करेंगी?
प्रताप बर्मन को मुआवज़ा मिला, लेकिन क्या समाज को न्याय मिला?
या फिर यह वही पुराना खेल है—
“राशि बाँट दो, आवाज़ दबा दो, और जाति के हिसाब से कीमत तय कर दो।” सवाल बहुत है, लेकिन जवाब.....