15/08/2017
आज विदा की वेला आई,
सरहद मुझे पुकारती|
आज विदा की वेला आई,
सरहद मुझे पुकारती|
भरत भारती का मैं बैटा
शेरों के संग पला बढ़ा हूँ,
माँ का मान बचाने को मैं
इन शिखरों पर सदा चढ़ा हूँ|
अरिदल चढ़ आया सीमा पर
विकल हुई माँ भारती,
अरिदल चढ़ आया सीमा पर
विकल हुई माँ भारती,
आज विदा की वेला आई
सरहद मुझे पुकारती| (2)
नन्दन-वन के शेरों को
एक गीदड़ ने धमकाया है,
घर में बैठे-बैठे उसने
अपना काल बुलाया है|
घर में बैठे-बैठे उसने
अपना काल बुलाया है|
उस कायर की करतूतों को
सारी दुनिया धिक्कारती (2)
आज विदा की वेला आई
सरहद मुझे पुकारती|
आज विदा की वेला आई
सरहद मुझे पुकारती|
उसके सीने की चोड़ाई
मेरी गोली नापेगी,
ऐसी दूंगा मोत, नरक में
उसकी रूह भी कांपेगी|
ऐसी दूंगा मोत, नरक में
उसकी रूह भी कांपेगी|
‘बन जाऊँगी काल’
‘बन जाऊँगी काल’
मेरी बंदूक की नाल दहाड़ती,
आज विदा की वेला आई
सरहद मुझे पुकारती|
आज विदा की वेला आई
सरहद मुझे पुकारती|
बनकर लावा अब फूटेगा
ठंडा बर्फ हिमालय का,
बनकर लावा अब फूटेगा
ठंडा बर्फ हिमालय का,
मेरा शोणित घोण करेगा
भारत माँ की जय-जय का| (2)
अरिमुंडो की माला के संग
भाव भरी हो आरती,
आज विदा की वेला आई
सरहद मुझे पुकारती| (2)
कश्मीर की क्यारी को अब
अपने खून से सिचुंगा,
कारगिल के रश्मि-रंथो को
अन्त समय तक खीचूँगा|
अब तो मुझको बनना ही है
कृष्ण सरीखा सारथी,
अब तो मुझको बनना ही है
कृष्ण सरीखा सारथी,
आज विदा की वेला आई
सरहद मुझे पुकारती| (2)
माँ के चरणों के वन्दन को
अपना शीश चढ़ा दूंगा,
माँ के चरणों के वन्दन को
अपना शीश चढ़ा दूंगा,
जननी का जो दूध रगों में
उसका कर्ज चूका दूंगा| (2)
चलती जो हर सांस,
इसी माता ने मुझे उधार दी, (2)
आज विदा की वेला आई
सरहद मुझे पुकारती|
आज विदा की वेला आई
सरहद मुझे पुकारती|
रवि शंकर सिंह आरा