Institute of Rajasthan Education and All Development - IREAD

  • Home
  • India
  • Alwar
  • Institute of Rajasthan Education and All Development - IREAD

Institute of Rajasthan Education and All Development - IREAD Contact information, map and directions, contact form, opening hours, services, ratings, photos, videos and announcements from Institute of Rajasthan Education and All Development - IREAD, Front of Naveen Bus Stand, Rajgarh, Alwar.

IREAD is an educational non-governmental organization (NGO) that partners with local communities throughout the developing world to provide quality educational opportunities by establishing libraries, providing literacy instruction.

सुख, शान्ति एवं समृद्धि की मंगलमय कामनाओं के साथ आप सभी को चैत्र नवरात्रि और हिंदू नववर्ष विक्रम संवत् 2082 की हार्दिक म...
30/03/2025

सुख, शान्ति एवं समृद्धि की मंगलमय कामनाओं के साथ आप सभी को चैत्र नवरात्रि और हिंदू नववर्ष विक्रम संवत् 2082 की हार्दिक मंगल कामनाएं।

मां अम्बे आप सभी को उत्तम स्वास्थ्य, सुख ,समृद्धि ,वैभव और ख्याति प्रदान करें!

IREAD

01/01/2025
30/10/2024

आपको पंचदिवसीय दीप पर्व महोत्सव की अनंत हार्दिक शुभकामनाएं।

1 धनतेरस= समुद्र मंथन से आयुर्वेद अमृत कलश लिए प्रकट हुए चौदहवें रत्न भगवान् धनवंतरी आपको, आपके पूरे परिवार को उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु व उत्कृष्ट रोग-प्रतिरोधक क्षमता प्रदान करें।

2 रूप चतुर्दशी= आप को व आपके परिवार को अप्रतिम सौंदर्य व रूप यौवन प्रदान करें l

3 दीपावली= देवी लक्ष्मी आप पर इतनी प्रसन्न हो कि आप के घर को धन धान्य से परिपूर्ण कर आप के पास ही स्थाई वास करे।

4 गोवर्धन= आप के सम्पूर्ण खेत-खलिहान, यानी आय के स्त्रोत इतने फलें-फूलें कि आपकी अनन्त पीढ़ियों तक किसी भी वस्तु का अभाव न हो।

5 भैया दूज= भाई बहन में अटूट प्रेम दे,बहन कभी अपने आप को असहज महसूस न करे और बहन द्वारा भाई के माथे पर लगाया गया तिलक स्वर्णिम पुष्प की तरह हमेशा महकता रहे।

यह पांच दिवसीय दीप महोत्सव आप सभी को उत्तम स्वास्थ्य,सुख-समृद्धि, आत्मसंतोष, शांति, स्फूर्ति और ऊर्जा दायक हो ‌सभी का कल्याण हो ।
ऐसी अनंत मंगलकामनाये।।
🙏🙏🎁🍨🎁🙏🙏

16/11/2023

चलो एक कहानी सुनते हैं .......

हमारा शरीर- इस जिंदगी का वाहन!नारायण मूर्ति

मैं किसी आफिस काम के लिए फ्लाइट से बैंगलोर से मुम्बई जा रहा था। यह विमान का इकोनॉमी क्लास था। जैसे ही मैं प्लेन में चढ़ा, मैंने अपना हैंड बैग ओवरहेड केबिन में रख दिया और अपनी सीट पर बैठ गया।

जब अपनी सीट बेल्ट लगा रहा था, तो मैंने एक सज्जन को देखा, जिनकी आयु शायद साठ-सत्तर साल के आस पास रही होगी। वह खिड़की की सीट पर मेरे बगल में ही बैठे थे।

अगले दिन मुंबई में मेरा एक प्रेजेंटेशन था। इसलिए मैंने अपने कागजात निकाले और अंतिम तैयारी में उनको पढ़ने लगा।

लगभग 15-20 मिनट के बाद, जब मैं अपना काम कर चुका था, मैंने दस्तावेजों को वापस बैग में सुरक्षित रूप से रख दिया और खिड़की से बाहर देखने लगा।

मैंने बड़ी लापरवाही भरी निगाह से अपने बगल में बैठे इस व्यक्ति के चेहरे की ओर देखा।

अचानक मेरे दिमाग में आया कि इस आदमी को मैंने पहले कहीं देखा है। मैं याद करने की कोशिश में बार-बार उन्हें देख रहा था।

वह वृद्ध थे और उनकी आँखों के नीचे और माथे पर झुर्रियाँ थीं। उनके चश्में साधारण फ्रेम वाले थे।

उनका सूट एक साधारण गहरे भूरे रंग का था, जो बहुत प्रभावशाली नहीं लग रहा था।

मैंने अपनी निगाहें उनके जूतों पर दौड़ाई। वे फॉर्मल जूतों की एक बहुत ही साधारण जोड़ी थी। वह अपने मेल का जवाब देने और अपने दस्तावेजों को देखने में व्यस्त लग रहे थे।

अचानक, उनको देखते हुए मेरे दिमाग में एक विचार कौंधा और मैंने बातचीत शुरू करते हुए पूछा, "क्या आप श्री नारायण मूर्ति हैं?"

उन्होंने मेरी ओर देखा, और मुस्कुराकर उत्तर दिया, "हाँ, मैं हूँ।"

मैं चौंक पड़ा और कुछ समय के लिए अवाक रह गया! मुझे समझ ही नहीं आ रहा था कि उनसे आगे बातचीत कैसे जारी रखी जाए?

मैंने उन्हें फिर से देखा, लेकिन इस बार सबसे बड़े भारतीय अरबपति होने की दृष्टि से:- नारायण मूर्ति!

उनके जूते, सूट, टाई और चश्मा- सब कुछ बहुत ही साधारण था। और मजेदार तथ्य यह था कि इस व्यक्ति की सम्पति 2.3 बिलियन डॉलर थी और उन्होंने इंफोसिस की सह-स्थापना की थी।

मेरी हमेशा से बहुत अमीर बनने की इच्छा थी ताकि मैं इस दुनिया की सारी विलासिता का उपभोग कर सकूँ और बिजनेस क्लास की यात्रा कर सकूँ। और मेरे बगल वाला यह आदमी, जो पूरी एयरलाइन खरीद सकता था, मेरे जैसे मध्यम वर्ग के लोगों के साथ इकोनॉमी क्लास में यात्रा कर रहा था।

मैं खुद को रोक नहीं पाया और पूछा, "आप इकोनॉमी क्लास में यात्रा कर रहे हैं न कि बिजनेस क्लास में?"

"क्या बिजनेस क्लास के लोग जल्दी पहुँच जाते हैं?" उन्होंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया।

खैर, यह एक विचित्र प्रतिक्रिया थी और बहुत मायने भी रखती थी। और फिर, मैंने अपना परिचय दिया और बातचीत आगे बढ़ाई, “नमस्कार सर, मैं एक कॉर्पोरेट ट्रेनर हूँ और मैं पूरे भारत में कई बहुराष्ट्रीय कंपनियों के साथ काम करता हूँ।"

उन्होंने अपना फोन दूर रखा और बहुत ध्यान से मेरी बात सुनने लगे। उस दो घंटे की यात्रा के दौरान हमने कई सवालों का आदान-प्रदान किया। हर सवाल के साथ बातचीत गहरी होती जा रही थी। और फिर एक ऐसा क्षण आया, जिसने इस उड़ान के अनुभव को और भी यादगार बना दिया।

मैंने सवाल किया, "श्रीमान, आप इस दुनिया में इतने सारे लोगों के आदर्श हैं। आप अपने जीवन में महान निर्णय लेने के लिए जाने जाते हैं। लेकिन, क्या आपको किसी बात का पछतावा है?"

यह सुनते ही उनका चेहरा कुछ उदास सा हो गया। उन्होंने कुछ देर सोचा और उत्तर दिया,
"कभी-कभी, मेरे घुटने में दर्द होता है। मुझे लगता है कि मुझे अपने शरीर का बेहतर ख्याल रखना चाहिए था। जब मैं जवान था, मैं काम में इतना व्यस्त था कि मुझे अपने शरीर का अपना ख्याल रखने का समय नहीं मिला और अब आज जब मुझे काम करना है, तो मैं नहीं कर सकता। मेरा शरीर इसकी अनुमति नहीं देता।"

"आप युवा, स्मार्ट और महत्वाकांक्षी हैं। मैंने जो गलती की है, उसे मत दोहराओ! अपने शरीर की उचित देखभाल करो और ठीक से आराम करो। यह एकमात्र शरीर ही है जो आपको ईश्वर की नेहमत के रूप में मिला है।"

उस दिन मैंने दो चीज़ें सीखीं, एक जो उन्होंने मुझे बताई और दूसरी जो उन्होंने मुझे दिखाई।

हम सभी भौतिक रूप से बेहतर करने की उम्मीद में अपना सारा जीवन व्यतीत कर देते हैं और इस आपाधापी में हमारा स्वास्थ्य उपेक्षित हो जाता है। हमारे शरीर की उपेक्षा करना मतलब हमारे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य दोनों को नुकसान पहुचना।

जीवन में कोई भी विलासिता हमारी मदद नहीं करती है ,जब हमारा शरीर पीड़ित होता है। वास्तव में, जब शरीर सहयोग करना बंद कर देता है, तो सब कुछ अपने आप रुक जाता है।

यह एकमात्र शरीर ही है जो हमें इस जीवन यात्रा के वाहन के रूप में मिला है। बेहतर होगा कि हम इसे हल्के में न लें।

बुद्ध ने कहा है, "हमारा शरीर अनमोल है। यह इश-यात्रा के लिए हमारा वाहन है। इसके साथ सावधानी से व्यवहार करें।"

यह वह दिन था, जब मुझे वह सबक मिला, जिसकी मुझे अपने जीवन में सबसे ज्यादा जरूरत थी।

नारायण मूर्ति बहुत महान और जमीन से जुड़े इंसान हैं! तभी तो वे निर्विवादित रूप से एक सफल इंसान हैं !

14/11/2023

*सच्चा दृष्टिकोण*

एक 6 वर्ष का लडका अपनी 4 वर्ष की छोटी बहन के साथ बाजार से जा रहा था।
अचानक से उसे लगा कि, उसकी बहन पीछे रह गयी है।

वह रुका, पीछे मुड़कर देखा तो जाना कि, उसकी बहन एक खिलौने के दुकान के सामने खडी कोई चीज निहार रही है।

लडका पीछे आता है और बहन से पूछता है, "कुछ चाहिये तुम्हें?" लडकी एक गुड़िया की तरफ उंगली उठाकर दिखाती है।

बच्चा उसका हाथ पकडता है, एक जिम्मेदार बडे भाई की तरह अपनी बहन को वह गुड़िया देता है। बहन बहुत खुश हो गयी ।

दुकानदार *यह सब देख रहा था, बच्चे का व्यवहार देखकर आश्चर्यचकित भी हुआ ....

अब वह बच्चा बहन के साथ काउंटर पर आया और दुकानदार से पूछा, "कितनी कीमत है इस गुड़िया की ?"

दुकानदार एक शांत और गहरा व्यक्ति था, उसने जीवन के कई उतार देखे थे, उन्होने बड़े प्यार और अपनत्व से बच्चे से पूछा,
"बताओ बेटे, आप क्या दे सकते हो ??"

बच्चा अपनी जेब से वो सारी सीपें बाहर निकालकर दुकानदार को देता है जो उसने थोड़ी देर पहले बहन के साथ समुंदर किनारे से चुन चुन कर बीनी थी !!!

दुकानदार वो सब लेकर यूँ गिनता है जैसे कोई पैसे गिन रहा हो।

सीपें गिनकर वो बच्चे की तरफ देखने लगा तो बच्चा बोला,"सर कुछ कम हैं क्या ??"
दुकानदार :-" नहीं - नहीं, *ये तो इस गुड़िया की कीमत से भी ज्यादा है, ज्यादा मैं वापस देता हूँ " यह कहकर उसने 4 सीपें रख ली और बाकी की बच्चे को वापिस दे दी।

बच्चा बड़ी खुशी से वो सीपें जेब मे रखकर बहन को साथ लेकर चला गया।

यह सब उस दुकान का कामगार देख रहा था, उसने आश्चर्य से मालिक से पूछा, " मालिक ! इतनी महंगी गुड़िया आपने केवल 4 सीपों के बदले मे दे दी ?"

दुकानदार एक स्मित संतुष्टि वाला हास्य करते हुये बोला,

"हमारे लिये ये केवल सीप है पर उस 6 साल के बच्चे के लिये अतिशय मूल्यवान है और अब इस उम्र में वो नहीं जानता, कि पैसे क्या होते हैं ?

पर जब वह बडा होगा ना...

और जब उसे याद आयेगा कि उसने सीपों के बदले बहन को गुड़िया खरीदकर दी थी, तब उसे मेरी याद जरुर आयेगी, और फिर वह सोचेगा कि,,,,,,
"यह विश्व अच्छे मनुष्यों से भी भरा हुआ है।"

यही बात उसके अंदर सकारात्मक दृष्टिकोण बढानेे में मदद करेगी और वो भी एक अच्छा इंन्सान बनने के लिये प्रेरित होगा....

19/10/2023

मिलजुल कर काम करें:_ "छोटी बहू"
(छत्तीसगढ़ी लोककथा)

बहुत पहले एक किसान के परिवार में किसान के दो बेटे थे।बड़े बेटे की बहू ज्यादा काम नहीं करती थी।घर में रहती थी।
कुछ साल बाद छोटे बेटे की शादी हुई और बहू घर आयी।छोटी बहू सबके साथ खेत में काम करने जाती थी।
एक साल बाद सबने सोचा अब बारी बारी से एक एक साल दोनों बहु खेत में काम करने जाएंगी। अब छोटी बहू घर में रहेगी,बड़ी बहु हमारे साथ खेत में काम करने जाएगी ।उसे यह अच्छा तो नहीं लगा ।पर सबकी बात माननी पड़ी।
बड़ी बहू इतने साल घर में आराम से रहती थी ।सबके जाने के बाद ज्यादा काम नहीं करती थी।कामचलाऊ काम करके आराम करती।दिनभर में बाहर जो भी खाने पीने की चीजें बिकने आतीं ले लेकर खाती रहती थी।शाम को बहुत थक गई ऐसा दिखाती और जैसे तैसे खाना बनाकर रख देती।क्योंकि उसका पेट तो भर रहता था।
लेकिन अब जब खेत में जाकर काम करती तो उसे खेत में मेहनत करना पसंद नहींआ रहा था।
इधर जब छोटी बहू घर में रहने लगी तो उसने सब तरफ को घुमघुम के देखा ।
एक कमरे में धान का भूसा भरा था। उसने देखा कि भूसे में बहुत से चावल के टुकड़े(कनकी)थे।वो भूसा को सूप में पछिनके (फटककर)कनकी निकाल लायी।
बाहर दही बेचने वाला आया तो धान के बदले उसने दही ले ली ,दही वाले ने कहा बड़ी बहू तो दूध, घी भी लेती थी( क्योंकि वह लेकर खुद खा पी लेती थी)। छोटी बहू ने अभी जरूरत नहीं है करके उसे जाने को कहा।इसी प्रकार दिन भर सब्जी वाले ,मिठाईवाले आदि आते रहे।सब आवाज देकर यही कहते कि बड़ी बहू तो रोज हमसे सामान लेती थी। अब छोटी बहु को पता चला कि दीदी तो समान लेती थी लेकिन उनके आने से पहले ही खा पीकर खत्म कर देती थी।उन सबके लिए जैसा तैसा खाना बनाकर तबियत ठीक न होने का बहाना बनाकर सो जाती थी।
छोटी बहू ने उनसे आवश्यकतानुसार सामान ले लिया। शाम को कनकी में दही डालकर*कैथला*(छत्तीसगढ़ का कनकी और दही से बना खिचड़ी जैसा व्यंजन) बनाया। जब सब आये तो प्रेम से परोसकर खिलाया।सब खुश हो गए। उसके ससुर तो कहने लगे कितने साल बाद मैं कैथला खा रहा हूँ।तुम्हारी सास बनाती थी।
छोटी बहू मुस्कुराती रही ।दिनभर हुई कोई भी बात किसी को नहीं बताई।बड़ी बहू के बारे में किसी से कुछ नहीं कहा।
दूसरे दिन उसने नाश्ते में कनकी को पीसकर रोटी बनाया।
यह रोज सबके जाने के बाद कुछ न कुछ काम करती रहती थी।घर को धीरे -धीरे लिप पोतकर चमका दिया।
कोठियों मैं धान भरा था।उसने साल भर के लिए जरूरत के हिसाब से धान रखकर बाकी को सबकी सलाह से बिकवा कर पैसा जमा करवा लिया। वो उस पैसे से घर के लिए जरूरी सामान ले लेते थे।
छोटी बहू रोज थोड़े थोड़े भूसे से कनकी निकालकर नए नए व्यंजन बनाती थी।सालों के भूसा एकत्र था।सब बड़े चाव से खाते और प्रशंसा करते।
बड़ी बहू को अच्छा तो नहीं लगता था ,लेकिन वह कुछ भी कह नहीं पाती थी।
अड़ोसी पड़ोसी भी छोटी बहु की तारीफ करते। अब वो बातें करते की बड़ी बहू दिनभर यहां वहां घूमते रहती थी। तरह तरह की चीजें ले लेकर खाती और आराम करती थी।
इस प्रकार धीरे धीरे छोटी बहू ने घर की व्यवस्था सही कर दी।
अपने ससुर जी के लिए धान के बेचने से मिले पैसे से एक दुकान खुलवा दिया।उनकी उम्र भी खेत में मेहनत करने की नहीं थी। एक दुधारू गाय ले ली।
एक साल बीत गया अब बड़ी बहु के घर में रहने की बारी आयी ।वह बहुत खुश थी।लेकिन सबने उसे खेत में ही काम करने को कहा और छोटी बहू को घर संभालने को।बड़ी बहू अब तक अपनी ग़लती का अहसास हो गया था । वह सबसे माफी माँगने लगी।सबने उसे माफ कर दिया और दोनों बहुऐं मिलजुल कर घर और खेत का काम करने लगी।
छोटू बहु ने अपनी मेहनत और सूझबूझ से घर को स्वर्ग बना दिया।
(हमारी नानी ये कहानी सुनाती थी ,कैथला बनाने की विधि बताती थी।हम सब बार बार उनसे ये कहानी सुनते थे )

आभार "एक मित्र द्वारा प्रेषित"

04/10/2023

क्या हमे चालीसा पढते समय पता भी होता है कि हम हनुमानजी से क्या कह रहे हैं या क्या मांग रहे हैं?

आओ आज जानते हैं। क्योंकि आनंद और फल शायद तभी मिलेगा जब हमें इसका मतलब भी पता हो।

तो लीजिए पेश है श्री हनुमान चालीसा अर्थ सहित!!

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
श्री गुरु चरण सरोज रज, निज मन मुकुरु सुधारि।
बरनऊँ रघुवर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि।
📯《अर्थ》→ गुरु महाराज के चरण.कमलों की धूलि से अपने मन रुपी दर्पण को पवित्र करके श्री रघुवीर के निर्मल यश का वर्णन करता हूँ, जो चारों फल धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को देने वाला हे।★
•••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरो पवन कुमार।
बल बुद्धि विद्या देहु मोहिं, हरहु कलेश विकार।★
📯《अर्थ》→ हे पवन कुमार! मैं आपको सुमिरन.करता हूँ। आप तो जानते ही हैं, कि मेरा शरीर और बुद्धि निर्बल है। मुझे शारीरिक बल, सदबुद्धि एवं ज्ञान दीजिए और मेरे दुःखों व दोषों का नाश कर दीजिए।★
•••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
जय हनुमान ज्ञान गुण सागर, जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥1॥★
📯《अर्थ 》→ श्री हनुमान जी! आपकी जय हो। आपका ज्ञान और गुण अथाह है। हे कपीश्वर! आपकी जय हो! तीनों लोकों,स्वर्ग लोक, भूलोक और पाताल लोक में आपकी कीर्ति है।★
•••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
राम दूत अतुलित बलधामा, अंजनी पुत्र पवन सुत नामा॥2॥★
📯《अर्थ》→ हे पवनसुत अंजनी नंदन! आपके समान दूसरा बलवान नही है।★
•••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
महावीर विक्रम बजरंगी, कुमति निवार सुमति के संगी॥3॥★
📯《अर्थ》→ हे महावीर बजरंग बली! आप विशेष पराक्रम वाले है। आप खराब बुद्धि को दूर करते है, और अच्छी बुद्धि वालो के साथी, सहायक है।★
•••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
कंचन बरन बिराज सुबेसा, कानन कुण्डल कुंचित केसा॥4॥★
📯《अर्थ》→ आप सुनहले रंग, सुन्दर वस्त्रों, कानों में कुण्डल और घुंघराले बालों से सुशोभित हैं।★
•••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
हाथ ब्रज और ध्वजा विराजे, काँधे मूँज जनेऊ साजै॥5॥★
📯《अर्थ》→ आपके हाथ मे बज्र और ध्वजा है और कन्धे पर मूंज के जनेऊ की शोभा है।★
•••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
शंकर सुवन केसरी नंदन, तेज प्रताप महा जग वंदन॥6॥★
📯《अर्थ 》→ हे शंकर के अवतार! हे केसरी नंदन! आपके पराक्रम और महान यश की संसार भर मे वन्दना होती है।★
•••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
विद्यावान गुणी अति चातुर, राम काज करिबे को आतुर॥7॥★
📯《अर्थ 》→ आप प्रकान्ड विद्या निधान है, गुणवान और अत्यन्त कार्य कुशल होकर श्री राम काज करने के लिए आतुर रहते है।★
•••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया, राम लखन सीता मन बसिया॥8॥★
📯《अर्थ 》→ आप श्री राम चरित सुनने मे आनन्द रस लेते है। श्री राम, सीता और लखन आपके हृदय मे बसे रहते है।★
•••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
सूक्ष्म रुप धरि सियहिं दिखावा, बिकट रुप धरि लंक जरावा॥9॥★
📯《अर्थ》→ आपने अपना बहुत छोटा रुप धारण करके सीता जी को दिखलाया और भयंकर रूप करके.लंका को जलाया।★
•••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
भीम रुप धरि असुर संहारे, रामचन्द्र के काज संवारे॥10॥★
📯《अर्थ 》→ आपने विकराल रुप धारण करके.राक्षसों को मारा और श्री रामचन्द्र जी के उदेश्यों को सफल कराया।★
•••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
लाय सजीवन लखन जियाये, श्री रघुवीर हरषि उर लाये॥11॥★
📯《अर्थ 》→ आपने संजीवनी बुटी लाकर लक्ष्मणजी को जिलाया जिससे श्री रघुवीर ने हर्षित होकर आपको हृदय से लगा लिया।★
•••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
रघुपति कीन्हीं बहुत बड़ाई, तुम मम प्रिय भरत सम भाई॥12॥★
📯《अर्थ 》→ श्री रामचन्द्र ने आपकी बहुत प्रशंसा की और कहा की तुम मेरे भरत जैसे प्यारे भाई हो।★
•••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
सहस बदन तुम्हरो जस गावैं, अस कहि श्री पति कंठ लगावैं॥13॥★
📯《अर्थ 》→ श्री राम ने आपको यह कहकर हृदय से.लगा लिया की तुम्हारा यश हजार मुख से सराहनीय है।★
•••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा, नारद,सारद सहित अहीसा॥14॥★
📯《अर्थ》→श्री सनक, श्री सनातन, श्री सनन्दन, श्री सनत्कुमार आदि मुनि ब्रह्मा आदि देवता नारद जी, सरस्वती जी, शेषनाग जी सब आपका गुण गान करते है।★
•••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते, कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते॥15॥★
📯《अर्थ 》→ यमराज,कुबेर आदि सब दिशाओं के रक्षक, कवि विद्वान, पंडित या कोई भी आपके यश का पूर्णतः वर्णन नहीं कर सकते।★
•••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
तुम उपकार सुग्रीवहि कीन्हा, राम मिलाय राजपद दीन्हा॥16॥★
📯《अर्थ 》→ आपनें सुग्रीव जी को श्रीराम से मिलाकर उपकार किया, जिसके कारण वे राजा बने।★
•••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
तुम्हरो मंत्र विभीषण माना, लंकेस्वर भए सब जग जाना ॥17॥★
📯《अर्थ 》→ आपके उपदेश का विभिषण जी ने पालन किया जिससे वे लंका के राजा बने, इसको सब संसार जानता है।★
•••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
जुग सहस्त्र जोजन पर भानू, लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥18॥★
📯《अर्थ 》→ जो सूर्य इतने योजन दूरी पर है की उस पर पहुँचने के लिए हजार युग लगे। दो हजार योजन की दूरी पर स्थित सूर्य को आपने एक मीठा फल समझ कर निगल लिया।★
•••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहि, जलधि लांघि गये अचरज नाहीं॥19॥★
📯《अर्थ 》→ आपने श्री रामचन्द्र जी की अंगूठी मुँह मे रखकर समुद्र को लांघ लिया, इसमें कोई आश्चर्य नही है।★
•••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
दुर्गम काज जगत के जेते, सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥20॥★
📯《अर्थ 》→ संसार मे जितने भी कठिन से कठिन काम हो, वो आपकी कृपा से सहज हो जाते है।★
•••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
राम दुआरे तुम रखवारे, होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥21॥★
📯《अर्थ 》→ श्री रामचन्द्र जी के द्वार के आप.रखवाले है, जिसमे आपकी आज्ञा बिना किसी को प्रवेश नही मिलता अर्थात आपकी प्रसन्नता के बिना राम कृपा दुर्लभ है।★
•••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
सब सुख लहै तुम्हारी सरना, तुम रक्षक काहू.को डरना॥22॥★
📯《अर्थ 》→ जो भी आपकी शरण मे आते है, उस सभी को आन्नद प्राप्त होता है, और जब आप रक्षक. है, तो फिर किसी का डर नही रहता।★
•••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
आपन तेज सम्हारो आपै, तीनों लोक हाँक ते काँपै॥23॥★
📯《अर्थ. 》→ आपके सिवाय आपके वेग को कोई नही रोक सकता, आपकी गर्जना से तीनों लोक काँप जाते है।★
•••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
भूत पिशाच निकट नहिं आवै, महावीर जब नाम सुनावै॥24॥★
📯《अर्थ 》→ जहाँ महावीर हनुमान जी का नाम सुनाया जाता है, वहाँ भूत, पिशाच पास भी नही फटक सकते।★
•••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
नासै रोग हरै सब पीरा, जपत निरंतर हनुमत बीरा॥25॥★
📯《अर्थ 》→ वीर हनुमान जी! आपका निरंतर जप करने से सब रोग चले जाते है,और सब पीड़ा मिट जाती है।★
•••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
संकट तें हनुमान छुड़ावै, मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥26॥★
📯《अर्थ 》→ हे हनुमान जी! विचार करने मे, कर्म करने मे और बोलने मे, जिनका ध्यान आपमे रहता है, उनको सब संकटो से आप छुड़ाते है।★
•••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
सब पर राम तपस्वी राजा, तिनके काज सकल तुम साजा॥ 27॥★
📯《अर्थ 》→ तपस्वी राजा श्री रामचन्द्र जी सबसे श्रेष्ठ है, उनके सब कार्यो को आपने सहज मे कर दिया।★
•••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
और मनोरथ जो कोइ लावै, सोई अमित जीवन फल पावै॥28॥★
📯《अर्थ 》→ जिस पर आपकी कृपा हो, वह कोई भी अभिलाषा करे तो उसे ऐसा फल मिलता है जिसकी जीवन मे कोई सीमा नही होती।★
•••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
चारों जुग परताप तुम्हारा, है परसिद्ध जगत उजियारा॥29॥★
📯《अर्थ 》→ चारो युगों सतयुग, त्रेता, द्वापर तथा कलियुग मे आपका यश फैला हुआ है, जगत मे आपकी कीर्ति सर्वत्र प्रकाशमान है।★
•••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
साधु सन्त के तुम रखवारे, असुर निकंदन राम दुलारे॥30॥★
📯《अर्थ 》→ हे श्री राम के दुलारे ! आप.सज्जनों की रक्षा करते है और दुष्टों का नाश करते है।★
•••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता, अस बर दीन जानकी माता॥३१॥★
📯《अर्थ 》→ आपको माता श्री जानकी से ऐसा वरदान मिला हुआ है, जिससे आप किसी को भी आठों सिद्धियां और नौ निधियां दे सकते है।★
1.) अणिमा → जिससे साधक किसी को दिखाई नही पड़ता और कठिन से कठिन पदार्थ मे प्रवेश कर.जाता है।★
2.) महिमा → जिसमे योगी अपने को बहुत बड़ा बना देता है।★
3.) गरिमा → जिससे साधक अपने को चाहे जितना भारी बना लेता है।★
4.) लघिमा → जिससे जितना चाहे उतना हल्का बन जाता है।★
5.) प्राप्ति → जिससे इच्छित पदार्थ की प्राप्ति होती है।★
6.) प्राकाम्य → जिससे इच्छा करने पर वह पृथ्वी मे समा सकता है, आकाश मे उड़ सकता है।★
7.) ईशित्व → जिससे सब पर शासन का सामर्थय हो जाता है।★
8.)वशित्व → जिससे दूसरो को वश मे किया जाता है।★
•••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
राम रसायन तुम्हरे पासा, सदा रहो रघुपति के दासा॥32॥★
📯《अर्थ 》→ आप निरंतर श्री रघुनाथ जी की शरण मे रहते है, जिससे आपके पास बुढ़ापा और असाध्य रोगों के नाश के लिए राम नाम औषधि है।★
•••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
तुम्हरे भजन राम को पावै, जनम जनम के दुख बिसरावै॥33॥★
📯《अर्थ 》→ आपका भजन करने से श्री राम.जी प्राप्त होते है, और जन्म जन्मांतर के दुःख दूर होते है।★
•••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
अन्त काल रघुबर पुर जाई, जहाँ जन्म हरि भक्त कहाई॥34॥★
📯《अर्थ 》→ अंत समय श्री रघुनाथ जी के धाम को जाते है और यदि फिर भी जन्म लेंगे तो भक्ति करेंगे और श्री राम भक्त कहलायेंगे।★
•••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
और देवता चित न धरई, हनुमत सेई सर्व सुख करई॥35॥★
📯《अर्थ 》→ हे हनुमान जी! आपकी सेवा करने से सब प्रकार के सुख मिलते है, फिर अन्य किसी देवता की आवश्यकता नही रहती।★
•••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
संकट कटै मिटै सब पीरा, जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥36॥★
📯《अर्थ 》→ हे वीर हनुमान जी! जो आपका सुमिरन करता रहता है, उसके सब संकट कट जाते है और सब पीड़ा मिट जाती है।★
•••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
जय जय जय हनुमान गोसाईं, कृपा करहु गुरु देव की नाई॥37॥★
📯《अर्थ 》→ हे स्वामी हनुमान जी! आपकी जय हो, जय हो, जय हो! आप मुझपर कृपालु श्री गुरु जी के समान कृपा कीजिए।★
•••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
जो सत बार पाठ कर कोई, छुटहि बँदि महा सुख होई॥38॥★
📯《अर्थ 》→ जो कोई इस हनुमान चालीसा का सौ बार पाठ करेगा वह सब बन्धनों से छुट जायेगा और उसे परमानन्द मिलेगा।★
•••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा, होय सिद्धि साखी गौरीसा॥39॥★
📯《अर्थ 》→ भगवान शंकर ने यह हनुमान चालीसा लिखवाया, इसलिए वे साक्षी है कि जो इसे पढ़ेगा उसे निश्चय ही सफलता प्राप्त होगी।★
•••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
तुलसीदास सदा हरि चेरा, कीजै नाथ हृदय मँह डेरा॥40॥★
📯《अर्थ 》→ हे नाथ हनुमान जी! तुलसीदास सदा ही श्री राम का दास है।इसलिए आप उसके हृदय मे निवास कीजिए।★
•••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रुप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥★
📯《अर्थ 》→ हे संकट मोचन पवन कुमार! आप आनन्द मंगलो के स्वरुप है। हे देवराज! आप श्री राम, सीता जी और लक्ष्मण सहित मेरे हृदय मे निवास कीजिए।★

🌹सीता राम दुत हनुमान जी को समर्पित 🙏

#कॉपीपेस्ट

04/10/2023

क्या खूब लिखा है

संकल्प का प्रभाव

न जाने क्यों, वह भगवान के नाममात्र से ही भड़क उठता था। यहाँ तक कि किसी आस्तिक से बात करना भी वह गुनाह समझता था। एक बार उसके गाँव में एक बड़े महात्मा प्रवचन देने के लिये आए। पूरा गाँव उनका प्रवचन सुनने के लिए उमड़ पड़ा। कई दिनों तक महात्मा जी का प्रवचन चलता रहा। मगर उसने उधर जाना तक उचित न समझा।

एक दिन वह संध्या के समय अपने खेत से लौट रहा था, सभी प्रवचन दे रहे महात्मा जी का स्वर उसके कानों से टकराया, “ अगर तुम जीवन में सफल होना चाहते हो तो मन में कुछ न कुछ दृढ़ संकल्प कर लो और पूर्ण निष्ठा से उसे पूरा करने में लगे रहो। एक न एक दिन तुम्हें उसका सुफल जरूर मिलेगा।

न चाहते हुए भी आखिर यह बात उसके कानों टकरा ही गयी। उसने इस बात को भूल जाना चाहा, लेकिन जब रात में सोया तो रह- रहकर महात्मा जी के कहे शब्द उसके दिमाग में गूँजने लगे। लाख कोशिश करके भी वह उनसे अपना पीछा नहीं छुड़ा पाया। आखिर थक-हारकर उसने इस कथन की सत्यता को परखने का निश्चय किया। लेकिन वह क्या दृढ़ संकल्प करें? उसने ऐसी बात सोचनी चाही जिससे कभी भी कोई प्रतिफल न मिलने वाला हो। उसका मंतव्य सिर्फ इतना था कि किसी भी तरह महात्मा जी का कथन असत्य सिद्ध हो जाए।

काफी सोच विचार में उलझे रहने के बाद उसका ध्यान अपने घर के सामने रहे वाले कुम्हार पर गया। उसने संकल्प किया वह प्रतिदिन कुम्हार का मुँह देखे बिना भोजन नहीं करेगा। अपनी इस सोच पर वह मन ही मन खूब हँसा, क्योंकि वह जानता था कि इसका किसी तरह कोई भी सुफल नहीं मिल सकता है। अगले ही दिन से उसने अपने संकल्प पर अमल करना शुरू कर दिया। अब वह अंधेर में ही उठकर अपने घर के बाहर चबूतरे पर बैठ जाता जब कुम्हार उठकर बाहर आता जाता तो वह उसका मुँह देख लेता, फिर अपने काम में लग जाता। कभी-कभी ऐसे भी अवसर आते, जब कुम्हार बाहर चला जाता तो उसके एक दो दिन तक उपवास करना पड़ता। लेकिन न तो वह इससे विचलित हुआ और नहीं उसने अपने संकल्प की भनक कुम्हार अथवा अपने किसी परिवार जन को लगने दी।

धीरे धीरे छह महीने बीत गए। किंतु उसे कुछ भी लाभ न हुआ। फिर भी अपने संकल्प पर अटल एवं अडिग रहा। उस पर तो नास्तिकता का भूत सवार था। कुछ भी करके वह महात्मा जी की बात झूठी साबित करना चाहता था। एक दिन उसकी नींद देर से खुली। तब तक कुम्हार मिट्टी लेने के लिए गाँव के बाहर खदान में चला गया था। जब उसे इसका पता चला तो वह भी घूमते-घूमते उधर जा निकला ताकि कुम्हार का मुँह देख ले।

उसने थोड़ी खड़े होकर कुम्हार को देखा। वह मिट्टी खोदने में तल्लीन था। अतः वह चुपचाप वापस चल पड़ा उधर मिट्टी खोदते-खोदते कुम्हार के सामने सोने की चार ईंटें निकल आयीं। उसने गरदन उठाकर चारों तरफ देखा कि कोई उसे देख तो नहीं रहा है। तभी उसकी नजर कुछ दूर तेज कदमों से जाते उस पर पड़ी। उसने अपनी घबराहट पर नियंत्रण किया और उसे पुकारा अरे भाई शिवराम किधर से आ रहे हो और कहाँ जा रहे हो? और कहा जा रहे हो? वह किधर से आया था, पूछकर कुम्हार तसल्ली कर लेना चाहता था।

उसने रुककर जवाब दिया, “ बस इधर ही आया था। जो देखना था सो देख लिया। अब वापस घर जा रहा हूँ।” उसके कहने का तो मतलब था कि उसने कुम्हार का मुँह देख लिया था। लेकिन कुम्हार घबरा गया। उसे पक्का विश्वास था कि उसने सोना देख लिया है। कहीं उसने रियासत के राजा से शिकायत कर दी तो हाथ आयी लक्ष्मी निकल जायेगा। उसने तुरंत कुछ निर्णय किया और उससे बोला “अरे भाई शिवराम देख लिया है तो तुम भी आधा ले जाओ। लेकिन राजा से शिकायत न करना”

उसने सोचा कि कुम्हार मजाक कर रहा है। वह मना करते हुए चल पड़ा। अब तो कुम्हार एकदम घबरा गया। उसने दौड़कर उसे पकड़ लिया और हाथ जोड़ते हुए बोला, भाई तुम्हें आधा ले जाने में क्या हर्ज है?” अब तो वह थोड़ा चकराया। कुम्हार उसे अपने साथ खदान में ले गया। वहाँ सोने की ईंटें पड़ी देखकर वह सारा माजरा समझ गया उसने चुपचाप चार में दो ईंटें उठा ली। ईंटें उठाते समय महात्मा जी के वाक्य की महिमा समझ में आ रही थी। वहां से लौट कर उसने वह सारा सोना गाँव वालों के हित में लगा दिया। इसी के साथ उसने शेष जीवन कठोर तप एवं भगवद्भक्ति में लगान का निश्चय किया। संकल्प के इसी प्रभाव के कारण अब उसे लो नास्तिक नहीं परम आस्तिक, महान तपस्वी महात्मा शिवराम के नाम से जानने लगे थे।

03/09/2023

एक मित्र ने बहुत खूब लिखा है।

बुढापे की लाठी बेटा बेटी ही नहीं "बहू" भी होती है।

बेटा बुढ़ापे की लाठी होता है। इसलिये ही लोग अपने जीवन मे एक "बेटे" की कामना ज़रूर रखते हैं ताकि बुढ़ापा अच्छे से कटे।

जमाना बदला, बेटियों की संवेदनशीलता से बेटियों पर एतबार बढ़ता गया और कुछ प्रतिशत दामादों की सहिष्णुता से बेटियां भी बुढ़ापे का सहारा बनने लगीं।

रही बात बेटों की तो बेटा घर में बहू लाता है या यूं कहें कि बेटे की वजह से घर में बहू आती है। साधारणतया बहू के आ जाने के बाद बेटा लगभग अपनी सारी जिम्मेदारी अपनी पत्नी के कंधे पर डाल देता है। सामान्य व्यवस्था के कारण घर की बहू शुरू शुरू में अपने सास ससुर की जिम्मेदारी ओढ़ लेती और धीरे धीरे यही जिम्मेदारी उस बहू के सास ससुर के बुढ़ापे की लाठी बन जाती है।

अगर ईमानदारी से परखेंगे तो हर आदर्श परिवार में बहू ही होती है वो जिसके सहारे बूढ़े सास ससुर अपना जीवन अच्छे से व्यतीत करते हैं।

कौन कब और कैसी चाय पीता है, कैसा भोजन करता है, भोजन की मात्रा कितनी होगी, कब क्या खाना बनाना है, सुबह, शाम में नाश्ता में क्या देना, रात को हर हालत में 9 बजे से पहले खाना खिलाना है। घर की आदर्श बहू या बहुएं हैं जिसको अपने सास-ससुर की पूरी दिनचर्या कंठस्थ होती है।

अगर सास ससुर बीमार पड़ जाए तो जिम्मेदार बहू पूरे मन से और लापरवाह बहू बेमन से ही सही, सास ससुर की देखभाल करती तो है। अगर एक दिन के लिये बहू बीमार पड़ जाए या फिर कही चली जाय तो बेचारे सास ससुर को ऐसा लगता है जैसा उनकी लाठी ही किसी ने छीन ली हो। वे चाय नाश्ता से लेकर खाना के लिये छटपटा जाते हैं। कोई और पूछने वाला उनके पास होता भी है तो भी वो संतुष्ट न हो पाते।

कहने को तो बेटा हर समय का सहारा और बुढ़ापे की लाठी होता है लेकिन बेटे के पास अकसर समय नही होता है और अगर बेटे को समय हो भी तो वो ऐसे समय कुछ कर न पायेगा क्योंकि बहू की वजह से उसे ये मालूम ही नही है कि माँ बाबूजी को सुबह से रात तक खाने और दवाई में क्या क्या देना है और उनके लिए क्या क्या करना है।

काबिल और जिम्मेदार बेटा मां बाबू जी से चंद सवाल पूछ अपनी ज़िम्मेदारी पूर्ण मान लेता है। जैसे माँ-बाबूजी को खाना दिया, चाय पिये वो, नाश्ता किये वो, दवा खाए वो और जिम्मेदारी पूर्ण। बहुत से काबिल आज्ञाकारी सेवाभावी बेटे भी कभी ये जानने की कोशिश नही करते कि वे क्या खाते हैं, कैसी चाय पीते हैं कब दवा खाते हैं ?

ये लगभग सभी घरों की कहानी है। ऐसी बहुएं देखी गईं है जिसने अपनी सास की बीमारी में तन मन से सेवा कर उनको नया जीवन दिया है। ऐसे कई उदाहरण आप अपने आस पास प्रतिदिन देखते सुनते हैं।

दुखद पक्ष ये है की कभी अगर बहू दुनिया से चली जाए तो बेटा फिर एक बहू ले आता है, क्योंकि वो अपने माँ बाप की सेवा नही कर पाता। उसे खुद उस बहू नाम की लाठी की ज़रूरत पड़ती है।

इसलिये बुढ़ापे की असली लाठी बेटा, बेटी के बराबर ही बहू को भी मानिए। संस्कारी बहू के त्याग और सेवा को पहचानिए और बेटे के व्याह के साथ ही बहू को अपना मान कर घर की बुनियाद मजबूत कीजिए, बेटे को समझाइए और खुद भी समझिए की बहू कितनी महत्वपूर्ण है।

26/08/2023

कल से नया फेसबुक नियम (उर्फ... नया नाम मेटा) शुरू हो रहा है। जहां वे आपकी तस्वीरों का उपयोग कर सकते हैं। मत भूलो कि अंतिम तिथि आज है!!!

"मैं फेसबुक या फेसबुक से जुड़ी किसी भी इकाई को अपने अतीत और भविष्य के चित्रों, सूचनाओं, संदेशों या प्रकाशनों का उपयोग करने की अनुमति नहीं देता हूं।"

इस बयान के साथ, मैं फेसबुक को सूचित करता हूं कि इस प्रोफ़ाइल और/या इसकी सामग्री के आधार पर आपको मेरे खिलाफ खुलासा, प्रतिलिपि, वितरण या कोई अन्य कार्रवाई करना सख्त वर्जित है।
ऐसा करना मेरी निजता का उल्लंघन माना जायेगा। जो की निजता का उल्लंघन करने के कानून के दायरे में आता है। जिसके आधार पर कानून द्वारा दंडित किया जा सकता है।

दोस्तों यदि आप चाहें तो आप इस संस्करण को कॉपी और पेस्ट कर सकते हैं। यदि आप कम से कम एक बार कोई बयान प्रकाशित नहीं करते हैं, तो यह चुपचाप आपकी तस्वीरों के उपयोग की अनुमति देगा। साथ ही आपकी प्रोफ़ाइल और स्थिति अपडेट में मौजूद जानकारी भी साझा ना करें।
यह सिस्टम को बायपास कर देगा....
जो कुछ नहीं करता, वह जाहिरा तौर पर सहमत होता है। अतः आप अपनी निजता के लिए सतर्क हो कर अपनी राय दर्ज करवाएं।

Address

Front Of Naveen Bus Stand, Rajgarh
Alwar
301408

Opening Hours

Tuesday 11am - 4pm
Wednesday 11am - 4pm
Thursday 11am - 4pm
Saturday 11am - 4pm
Sunday 11am - 4pm

Telephone

+919784007671

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Institute of Rajasthan Education and All Development - IREAD posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Contact The Organization

Send a message to Institute of Rajasthan Education and All Development - IREAD:

Share