03/10/2020
भाग -2
#गंगा_तू_ही_तू_है
हे गंगे मांँ तू कानपुर में पहुँचकर मैला ढोने वाली मालगाड़ी बन जाती है। तुझे सरकार ने यहाँ फिर से माँ बनाने के लिए अब तक हजारों करोड़ खर्च किया है, लेकिन तू मैले का बोझ ज्यादा ही झेल रही है। लाखों-करोंडो तेरी सफाई पर खर्च हो रहे है, लेकिन कोविड-19 से कोई सीख लेने को तैयार नही है। कोविड-19 में लॉकडाउन के दौरान तेरे स्वास्थ्य का सुधार स्वयं दिखने लगा था, कोई समझदार राजा होता तो अपने लॉकडाउन के इस परिणाम से सीख लेकर तेरे नाम पर लाखों-करोडों खर्च रोककर तुझमे गंदे नाले मिलने पर रोक लगाता; लेकिन वह नही हुआ। अब और ज्यादा गंदे नाले उद्योगपति डाल रहे है। ऐसा लगता है की भारत मे ंतेरी पवित्रता का राज नही है। तुझ में प्रदूषण करने वाले उद्योगपतियों का राज्य है।
तू कब कानपुर में निर्मल होगी! आशा बची नही है। अब ऐसा लगता है कि तुझे नमामि बनाकर निर्मलता के नाम पर लाखों-करोंडो खर्च होते रहेंगे। लेकिन प्रदूषण बढ़ता ही जायेगा। जब तक तेरी अविरलता पर विचार नहीं किया जायेगा, तब तक तेरा निर्मल बनना संभव नहीं है। आज तुझे राष्ट्रीय नदी घोषित करने वाली भारत सरकार में ‘‘ अजगर करे न चाकरी, पंक्षी करे न बैर ‘‘ जिन्हें कुछ नहीं करना होता उन्हें हडबढ़ी होती है।
हे गंगे अब आप चलते - चलते इलाहाबाद पहुँच गयी । आप अपनी पवित्रता की शक्ति से, अपनी गठरी उठाकर जहाँ चाहती है, वहाँ पहुँच जाती है। यहाँ तुझे हर्षित करने के लिए हर वर्ष माघ मैला कुंभ और 144 वर्षो में महाकुंभ तेरे किनारे होता है। कहा जाता है कि, भारतीय लोक तुझे सम्मानित करने के लिए तेरे किनारे इक्ट्ठा होता है। लेकिन वो अपने पाप धाने के लालच के कारण तेरे किनारे आता है, यह तू भी जानती है। पर फिर भी तू उनका स्वागत ही करती है। तूने भगीरथ से यह बात कही थी कि
‘‘मैं इस कारण भी पृथ्वी पर नहीं जाऊँगी कि लोग मुझमें अपने पाप धोयेंगे। फिर उस पाप को धोने मैं कहां जाऊंगी?‘‘
भगीरथ- ‘‘ माता! जिन्होंने लोक-परलोक, धन-सम्पत्ति और स्त्री-पुत्र की कामना से मुक्ति ले ली है , जो संसार से ऊपर होकर अपने आप में शांत हैं, जो ब्रह्मनिष्ठ और लोकों को पवित्र करने वाले परोपकार सज्जन हैं..... वे आपके द्वारा ग्रहण किये गए पाप को अपने अंग स्पर्श व श्रम निष्ठा से नष्ट कर देंगे।‘‘
ऐसे ही स्वामी सानंद व स्वामी शिवानंद है।
सम्भवतः इसीलिए गंगा रक्षा सिद्धांतो ने ऐसे परोपकारी सज्जनों को ही गंगा स्नान का हक दिया। गंगा नहाने का मतलब ही है-सम्पूर्णता। जीवन में सम्पूर्णता का भाव जगाये बगैर गंगा स्नान का कोई मतलब नहीं। न ही उन्हें गंगा स्नान का कोई अधिकर है, जो अपूर्ण है... लक्ष्य से भी और विचार से भी। इसीलिए किसी अच्छे काम के सम्पन्न होने पर हमारे समाज ने कहा - हम तो गंगा नहा लिये।
अब इलाहाबाद में तेरी रेत निकालकर तुझ में जहर घोलते है। यह जहर केवल तुझे बीमार करता ऐसा नही है, यह जहर डालने वालों को भी बीमार करता है। ज्यादातर यह जहर कानपुर से गंगा जी और दिल्ली से यमुना जी लेकर आती है । इलाहाबाद में दोनों का जहर एक-दूसरे से मिल जाता है। यहाँ से चलकर आप फतेहपुर होते हुए काशी में पहुँच जाती है। काशी में असी और वरुणा दोनों अपना जहर तेरी देह में डालते है।
आज भी कुछ लोग प्रतिदिन तेरे तटों की सफाई करते है जैसे कि केथी में गुरुदास गोस्वामी दो घंटे सफाई करते है। यह कार्य ये वर्षो से कर रहे है। जब गंगा थोडी और आगे बड़ी तो, गोमती का बेहाल होकर तुझ में आकर मिल गई है। गाजीपुर-बकसर के बीच करमनासा आकर मिल गई। करमनासा के बारे में कहते है कि इसका जल छूने से पुण्य का नाश हो जाता है। बकसर में विश्वामित्र ने जब दूसरी सृष्टि रची तब इन्द्र स्थापित हुए। करमनासा के दूसरी पार बौद्ध धर्म था। बिहार में गंगा तट पर बकसर एकेला तीर्थ है। वैसे तो बनारस और मगध दोनों एक जैसे है। गंगा के दूसरी पार मगहर है। आमी नदी के किनारे ये सभी गंगा ही है। मगहर कबीर के साथ जुड़ा है और बिहार बौद्ध के साथ जुड़ा इसलिए गंगा स्नान का पुण्य दोनों जगहों पर कुछ न कुछ गंगा में जुड़ने वाली दूसरी नदियों के साथ गलत धारणायें जोड़ ली गई है।
गंगा जी नरभसा पहुँचकर, पंडो के मोक्ष तथा सिचाई का जल व उद्योगों के प्रदूषण से मुक्ति पा जाती है। वाराणसी से भागलपुर तक गंगा का ढाल बहुत विनम्र है। एक कोस अर्थात् तीन किलोमीटर में केवल 10 इंच का ढाल है। जब राजा भगीरथ के पुरखों की आत्मा को मोक्ष हेतु यहाँ-जहाँ यह शब्द प्रचलित हुआ, वहाँ-वहाँ मोक्ष का बाजार पहुँचा, तो बोधगया से बौद्ध धर्म उखड़ गया।
हे गंगे, ‘तू ही तू है‘ अब तेरे किनारे बहुत कुछ बना, पला, आगे बड़ा, साथ के साथ उस सबको तूने टिकाकर रखा है। आशा है कि आगे भी टिकाकर रखेगी। उन्हें चलने वालों को तू उखड कर नष्ट करती है। इसीलिए तुझमें ब्रह्म-विष्णु-महेश का वास माना जाता है। तू ही तू है, तू ही तू है, तू ही तू है। यह बात केवल पौराणिक ही नही, वैज्ञानिक और आध्यात्मिक सत्य भी हुई है। तेरे किनारे आनंद की बूंद बनने वाले ब्रह्म के रास्ते पकड़ते है। तेरे आनंद की बूंद को सहेजने वाले विष्णु बनकर पालक बनते है। तेरे क्रोध का शिकार बनने वाले शंकर-संहारक बन जाते है।
प्रकाशनार्थ - जलपुरुष राजेन्द्र सिंह