Dr B K Lodhi

Dr B K Lodhi Ex-Deputy Secretary, NCDNT Govt. of India. Ex-Senior Fellow-ICSSR

मा० सांसद (हमीरपुर) श्री अजेन्द्र सिंह लोधी के साथ उनके दिल्ली आवास पर शिष्टाचार भेंट । 16/03/2026
18/03/2026

मा० सांसद (हमीरपुर) श्री अजेन्द्र सिंह लोधी के साथ उनके दिल्ली आवास पर शिष्टाचार भेंट । 16/03/2026

18/03/2026
17/03/2026

माननीय सांसद श्री अजेंद्र लोधी के साथ उनके नई दिल्ली आवास पर

25/01/2026

बुंदेलखंड के विस्मृत क्रांतिवीर
अमर सिंह महतों एवं गनेश महतों
(1842–1858 : जनघोषित सत्ता बनाम औपनिवेशिक दासता)
बुंदेलखंड का इतिहास केवल राजमहलों और ताजपोश राजाओं का इतिहास नहीं है। यह इतिहास जनघोषित नायकों, स्वाभिमानी किसानों, और लोकतांत्रिक नेतृत्व का भी इतिहास है।
इसी परंपरा के महान प्रतिनिधि थे — अमर सिंह महतों और उनके पुत्र गनेश महतों।
1. कमजोर रियासतों का युग और जन-राजा की अवधारणा
उन्नीसवीं सदी के मध्य में बुंदेलखंड की स्थिति अत्यंत विडंबनापूर्ण थी।
उस दौर में दो–चार गाँवों के भी अनेक कमजोर राजा हुआ करते थे, जिन्हें अंग्रेजी सत्ता का संरक्षण प्राप्त था।
इसके विपरीत,
बुंदेलखंड के विस्मृत क्रांतिवीर
अमर सिंह महतों एवं गनेश महतों
(1842–1858 : जनघोषित सत्ता बनाम औपनिवेशिक दासता)
बुंदेलखंड का इतिहास केवल राजमहलों और ताजपोश राजाओं का इतिहास नहीं है। यह इतिहास जनघोषित नायकों, स्वाभिमानी किसानों, और लोकतांत्रिक नेतृत्व का भी इतिहास है।
इसी परंपरा के महान प्रतिनिधि थे — अमर सिंह महतों और उनके पुत्र गनेश महतों।
1. कमजोर रियासतों का युग और जन-राजा की अवधारणा
उन्नीसवीं सदी के मध्य में बुंदेलखंड की स्थिति अत्यंत विडंबनापूर्ण थी।
उस दौर में दो–चार गाँवों के भी अनेक कमजोर राजा हुआ करते थे, जिन्हें अंग्रेजी सत्ता का संरक्षण प्राप्त था। पड़ोसी रियासत जिगनी के अंतर्गत केवल छह गांव थे।
इसके विपरीत,
महतों परिवार के अधीन 12 गाँवों का लगान जमा होता था।

परंतु यह सत्ता किसी सनद या ताज से नहीं, प्रजा की स्वीकृति से प्राप्त थी।

यह एक असाधारण तथ्य है कि —
प्रजा ने स्वयं अमर सिंह महतों को राजा घोषित किया,
लेकिन उन्होंने कभी राजा की उपाधि स्वीकार नहीं की।
2. सत्ता का अस्वीकार, जनसम्मान की स्वीकृति
अमर सिंह महतों का मानना था:
“समस्त जन मेरे भैयाबंद हैं, राजा बनकर मैं अपनों से श्रेष्ठ होने का भाव नहीं रख सकता।”
इसी कारण —
उन्होंने ब्राह्मणों से राजतिलक नहीं कराया,

और न ही कंपनी सरकार की ‘राजा की सनद’ स्वीकार की।
उनके लिए राज्य नहीं, जनविश्वास ही पर्याप्त था।
यही कारण है कि उनका संतोष लोकप्रियता में था, सत्ता में नहीं।
3. 1842 से 1857–58 तक सतत विद्रोह
अमर सिंह महतों ने —
1842 के बुंदेला विद्रोह से लेकर

1857–58 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम तक

अंग्रेजी दासता के विरुद्ध लगातार संघर्ष किया।

चरखारी जैसे अंग्रेज-परस्त राज्य के विरुद्ध उनका विरोध केवल राजनीतिक नहीं, नैतिक और वैचारिक था।
4. चरखारी विजय: जनक्रांति का अद्वितीय उदाहरण
चरखारी का किला बुंदेलखंड का अभेद्य दुर्ग माना जाता था।
नवाबों और बड़े राजाओं तक को वहां पराजय मिली थी।
लेकिन —
गनेश महतों, मात्र 19 वर्ष की आयु में,

अपने भैयाबंदी वाले गाँवों को संगठित कर,

तात्या टोपे को प्रेरित कर,

चरखारी के किले को जनशक्ति के बल पर जीत लिया।
यह कोई राजकीय युद्ध नहीं था —
यह जन-आह्वान से जन्मी जनक्रांति थी।
5. स्वतंत्र समर की कीमत
इस स्वतंत्र संघर्ष की भारी कीमत चुकानी पड़ी —
महतों परिवार की समस्त चल-अचल संपत्ति नष्ट हो गई,

गोहांड की हवेली ध्वस्त कर दी गई,

अमर सिंह महतों को कारावास और यातनाएँ सहनी पड़ीं।
किन्तु —
सम्मान, स्वाभिमान और लोक-स्मृति अक्षुण्ण रही।
आज भी महतों परिवार बुंदेलखंड में आदर और गौरव का प्रतीक है।
6. अंतिम बलिदान
अमर सिंह महतों —
रानी लक्ष्मीबाई और तात्या टोपे के सहयोगी रहे,

युद्ध में गंभीर रूप से घायल हुए,

और अंततः 31 दिसम्बर 1858 को

अंग्रेजी दासता के विरुद्ध विद्रोह करते हुए शहीद हो गए।

निष्कर्ष (सभा के लिए संदेश)
अमर सिंह महतों और गनेश महतों —
ताज से नहीं, जनसमर्थन से महान थे,

सत्ता से नहीं, स्वाभिमान से शासक थे,

और इतिहास में दर्ज नहीं होकर भी

लोक-स्मृति में अमर हैं।

उनका जीवन हमें सिखाता है कि
राजा बनने के लिए सिंहासन नहीं,
जनविश्वास चाहिए।
शत्-शत् नमन
बुंदेलखंड के इन विस्मृत, परंतु अमर, क्रांतिवीरों को।
महतों परिवार के अधीन 12 गाँवों का लगान जमा होता था।
उन्होंने अपने स्वामित्व में केवल एक हज़ार बीघा जमीन ही रखी शेष का पूर्ण स्वामित्व, नाम मात्र के लगान पर प्रजा को दिया।
परंतु यह सत्ता किसी सनद या ताज से नहीं, प्रजा की स्वीकृति से प्राप्त थी।

यह एक असाधारण तथ्य है कि —
प्रजा ने स्वयं अमर सिंह महतों को राजा घोषित किया,
लेकिन उन्होंने कभी राजा की उपाधि स्वीकार नहीं की।
2. सत्ता का अस्वीकार, जनसम्मान की स्वीकृति
अमर सिंह महतों का मानना था:
“समस्त जन मेरे भैयाबंदी हैं, राजा बनकर मैं अपनों से श्रेष्ठ होने का भाव नहीं रख सकता।”
इसी कारण —
उन्होंने ब्राह्मणों से राजतिलक नहीं कराया,

और न ही कंपनी सरकार की ‘राजा की सनद’ स्वीकार की।

उनके लिए राज्य नहीं, जनविश्वास ही पर्याप्त था।
यही कारण है कि उनका संतोष लोकप्रियता में था, सत्ता में नहीं।
3. 1842 से 1857–58 तक सतत विद्रोह
अमर सिंह महतों ने —
1842 के बुंदेला विद्रोह से लेकर

1857–58 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम तक

अंग्रेजी दासता के विरुद्ध लगातार संघर्ष किया।

चरखारी जैसे अंग्रेज-परस्त राज्य के विरुद्ध उनका विरोध केवल राजनीतिक नहीं, नैतिक और वैचारिक था।
4. चरखारी विजय: जनक्रांति का अद्वितीय उदाहरण
चरखारी का किला बुंदेलखंड का अभेद्य दुर्ग माना जाता था।
नवाबों और बड़े राजाओं तक को वहां पराजय मिली थी।
लेकिन —
गनेश महतों, मात्र 19 वर्ष की आयु में,

अपने भैयाबंदी वाले गाँवों को संगठित कर,

तात्या टोपे को प्रेरित कर,

चरखारी के किले को जनशक्ति के बल पर जीत लिया।

यह कोई राजकीय युद्ध नहीं था —
यह जन-आह्वान से जन्मी जनक्रांति थी।
5. स्वतंत्र समर की कीमत
इस स्वतंत्र संघर्ष की भारी कीमत चुकानी पड़ी —
महतों परिवार की समस्त चल-अचल संपत्ति नष्ट हो गई,

गोहांड की हवेली ध्वस्त कर दी गई,

अमर सिंह महतों को कारावास और यातनाएँ सहनी पड़ीं।

किन्तु —
सम्मान, स्वाभिमान और लोक-स्मृति अक्षुण्ण रही।
आज भी महतों परिवार बुंदेलखंड में आदर और गौरव का प्रतीक है।
6. अंतिम बलिदान
अमर सिंह महतों —
रानी लक्ष्मीबाई और तात्या टोपे के सहयोगी रहे,

युद्ध में गंभीर रूप से घायल हुए,

और अंततः 31 दिसम्बर 1858 को

अंग्रेजी दासता के विरुद्ध विद्रोह करते हुए शहीद हो गए।
निष्कर्ष (सभा के लिए संदेश)
अमर सिंह महतों और गनेश महतों —
ताज से नहीं, जनसमर्थन से महान थे,

सत्ता से नहीं, स्वाभिमान से शासक थे,

और इतिहास में दर्ज नहीं होकर भी

लोक-स्मृति में अमर हैं।

उनका जीवन हमें सिखाता है कि
राजा बनने के लिए सिंहासन नहीं,
जनविश्वास चाहिए।
शत्-शत् नमन
बुंदेलखंड के इन विस्मृत, परंतु अमर, क्रांतिवीरों को।

25/01/2026

भारत की विमुक्त–घुमंतू जातियाँ (DNTs) और यूरोप के रोमा (Gypsies):
(भाषा, विस्थापन और राज्य-दमन का तुलनात्मक ऐतिहासिक–सांस्कृतिक अध्ययन)
डॉ. बी. के. लोधी, Ex- Senior fellow-ICSSR
सारांश (Abstract)
यह शोध आलेख भारत की घुमंतू जातियों (Nomadic Tribes) तथा यूरोप के रोमा (Gypsies) समुदायों के बीच ऐतिहासिक, भाषिक और सांस्कृतिक समानताओं का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करता है। लेख का तर्क है कि इन दोनों समुदायों की समानताएँ केवल पेशागत या जीवन-पद्धति तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे साझा उत्पत्ति, विस्थापन, राज्य-दमन और सांस्कृतिक प्रतिरोध की ऐतिहासिक प्रक्रिया से जुड़ी हैं। “काजा/काजे” और “Gadjo” जैसे शब्द, “बारा (12)–तेरह (13)” का सांस्कृतिक दर्शन, तथा Romani और भारतीय घुमंतू बोलियों में भाषिक निरंतरता इस साझा स्मृति के सशक्त प्रमाण हैं। यह अध्ययन DNTs और Roma को आधुनिक राष्ट्र-राज्य की स्थिरता-केंद्रित संरचना के वैकल्पिक सामाजिक मॉडल के रूप में समझने का आग्रह करता है।
1. भूमिका (Introduction)
आधुनिक राष्ट्र-राज्य स्थिर जनसंख्या, भूमि-आधारित नागरिकता और कर-नियंत्रण की अवधारणा पर आधारित है। इस ढाँचे में घुमंतू, अर्ध-घुमंतू और परिपथी समुदायों को ऐतिहासिक रूप से “असामान्य”, “अव्यवस्थित” अथवा “संदिग्ध” माना गया। भारत की घुमंतू जातियाँ और यूरोप की रोमा आबादी इसी संरचनात्मक असहिष्णुता की शिकार रही हैं।
यह लेख तर्क देता है कि इन दोनों समुदायों के अनुभव एक साझा वैश्विक इतिहास का प्रतिनिधित्व करते हैं—जहाँ गतिशीलता स्वयं अपराध बना दी गई।
2. ऐतिहासिक उत्पत्ति और विस्थापन (Historical Origin and Migration)
भाषावैज्ञानिक और नृवंशशास्त्रीय अध्ययनों से यह स्थापित हो चुका है कि यूरोप के रोमा समुदायों की जड़ें उत्तर-पश्चिम भारत में स्थित हैं (Fraser, 1992; Hancock, 2002)। Romani भाषा का मूल Indo-Aryan है, जिसमें संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश के स्पष्ट अवशेष मिलते हैं।
इसी भूगोल—पंजाब, राजस्थान, सिंध और उससे आगे अफ़ग़ानिस्तान—में भारत की अनेक घुमंतू जातियाँ (नट, सांसी, भांतू, भाट, बावरिया, बंजारा, कंजर आदि) ऐतिहासिक रूप से विद्यमान रही हैं। यह समानता संयोग नहीं, बल्कि एक दीर्घ विस्थापन-श्रृंखला का परिणाम है, जिसमें एक शाखा यूरोप की ओर गई (Roma) और दूसरी भारत में ही रह गई (NTs)।
3. औपनिवेशिक और राज्य दमन (Colonial and State Control)
3.1 भारत : Criminal Tribes Act, 1871
ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन ने Criminal Tribes Act, 1871 के माध्यम से अनेक स्थिरवासी और घुमंतू समुदायों को जन्म से अपराधी घोषित किया। यह कानून व्यक्ति के कृत्य पर नहीं, बल्कि समुदाय की जीवन-पद्धति पर आधारित था (Radhakrishna, 2001)। आपराधिक जनजाति घोषित की गयी स्थिरवासी जातियाँ (Sedentary Denotified Tribes) अतीत में अनियमित युद्ध करने वाले लोग थे या वे समुदाय थे जिन्हें आक्रांताओं या राजनीतिक परिवर्तनों के कारण अपने मूल घरों से बेदखल कर दिया गया था (अनन्तसयनाम अयंगर, 1949-50)। गनेश एन देवी के अनुसार “विमुक्त जनजातियों की कहानी औपनिवेशिक शासन के प्रारंभिक वर्षों तक जाती है। उस समय जो कोई भी ब्रिटिश औपनिवेशिक विस्तार का विरोध करता था, उसे संभावित अपराधी माना जाता था। विशेषकर, यदि किसी ने हथियारों के माध्यम से सरकार का विरोध किया, तो अपराधी घोषित किया जाना तय था।” ये सभी स्थिरवासी जनजातियाँ थीं जो जल, जंगल और जमीन की मालिक थीं। जैसे- उत्तर भारत के लोधा, गूजर, पासी, खंगार, खटिक, मल्लाह और और दक्षिण भारत के Palaiyakkarar/Maravar/Kallar पर्वर्तक योद्धाओं (जैसे Puli Thevar, Veerapandiya Kattabomman आदि) ने ईस्ट इंडिया कंपनी के विस्तार के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष किए थे।
ब्रिटिश घुमंतू जनजातियों / समुदायों को समझ नहीं पाते थे। इसलिए घुमंतू समुदाय औपनिवेशिक शासकों की नजरों में संदेहास्पद बन गये। और उन्हें आपराधिक जनजाति अधिनियम के दायरे में लाया गया। (देवी, 2013)।
3.2 यूरोप : Anti-Gypsy Laws
यूरोप में रोमा समुदायों के विरुद्ध Vagrancy Laws, Gypsy Acts, Forced Settlement और Expulsion Policies लागू की गईं (Fraser, 1992)।
दोनों संदर्भों में राज्य का मूल भय गतिशीलता (mobility) था—ऐसी जनसंख्या जिसे स्थायी रूप से नियंत्रित नहीं किया जा सकता।
4. जीवन-पद्धति और अर्थव्यवस्था
घुमंतू DNTs और Roma दोनों की अर्थव्यवस्था आत्मनिर्भर रही—लोककला, पशुपालन, व्यापार, संगीत और धातु-कार्य पर आधारित। भूमि-विहीनता को आधुनिक राज्य ने पिछड़ेपन के रूप में देखा, जबकि वस्तुतः यह एक वैकल्पिक आर्थिक मॉडल था। Nomadism अविकास नहीं, बल्कि राज्य-केंद्रित विकास की अवधारणा से भिन्न सभ्यता है।
5. भाषाई स्मृति और पहचान
Romani भाषा और भारतीय घुमंतू बोलियों में उल्लेखनीय समानताएँ मिलती हैं—pani (पानी), manush (मनुष्य), jag (आग) आदि।
इसी क्रम में “Gadjo” (रोमा में स्थिरवासी गैर-रोमा) और “काजा/काजे” (भारतीय घुमंतू समाज में स्थिर समाज) शब्द केवल भाषिक नहीं, बल्कि सत्ता और भूमि-आधारित जीवन की आलोचना हैं। भाषा यहाँ इतिहास की जीवित स्मृति बन जाती है।
6. “बारा (12)” बनाम “तेरह (13)” : सामाजिक दर्शन
उत्तर भारत की अनेक घुमंतू जातियाँ स्वयं को “बारा वाले” मानती हैं, जबकि स्थिर समाज को “तेरह/काजा” कहा जाता है।
बारा समाज पूर्णता, स्वायत्तता, स्वच्छंदता, बंधनमुक्त और आंतरिक सामाजिक संतुलन और सजातीय (Homogeneous) का प्रतीक है, जबकि तेरह समाज राज्य, कर और कानून की बाध्यकारी संरचना का विजातीय (Heterogeneous) समूह है। यह विभाजन वस्तुतः घुमंतू सभ्यता और राज्य-नियंत्रित सभ्यता के बीच ऐतिहासिक संघर्ष का सांस्कृतिक रूपक है।
7. सामाजिक कलंक और प्रतिनिधित्व (Stigma and Representation)
घुमंतू DNTs और Roma दोनों को जन्मजात अपराधी, असभ्य और अविश्वसनीय के रूप में चित्रित किया गया। यह कलंक प्रशासनिक सीमाओं से आगे बढ़कर शिक्षा, रोजगार और नागरिक अधिकारों तक उनकी पहुँच को बाधित करता रहा (Devy et al., 2018)।
8. प्रतिरोध, कथा और पुनर्प्राप्ति (Resistance and Recovery)
मौखिक इतिहास, गीत, कथा, मिथक और आत्मकथात्मक लेखन—ये सभी राज्य-लिखित इतिहास के विरुद्ध प्रतिरोध के उपकरण हैं।
Nomadism की कथा कहना स्वयं एक राजनीतिक कर्म बन जाता है, जो विस्मृति के विरुद्ध स्मृति की पुनर्प्राप्ति करता है।
9. तुलनात्मक निष्कर्ष (Comparative Conclusion)
भारत की घुमंतू और यूरोप के Roma भौगोलिक रूप से अलग होते हुए भी एक ही ऐतिहासिक अन्याय की अभिव्यक्ति हैं। उनका मूल “अपराध” यह था कि वे स्थिर नहीं थे।
“काजा–Gadjo” और “बारा–तेरह” जैसे सांस्कृतिक प्रतीक आधुनिक राज्य और घुमंतू सभ्यता के बीच गहरी ऐतिहासिक दरार को उजागर करते हैं। यह अध्ययन घुमंतू (DNTs) और Roma को मानव सभ्यता की वैकल्पिक, गतिशील और आत्मनिर्भर परंपरा के रूप में पुनःस्थापित करने का आग्रह करता है।
संदर्भ (References)
Devy, G. N., Davis, G. V., & Chakravarty, K. K. (Eds.). (2013). Narrating nomadism: Tales of recovery and resistance. Routledge.
Fraser, A. (1992). The Gypsies. Blackwell.
Hancock, I. (2002). We are the Romani people. University of Hertfordshire Press.
Lodhi, B. K. (2024). Socio-Historical Study of Denotified Tribes of India. Manak Publications New Delhi.
Radhakrishna, M. (2001). Dishonoured by history: “Criminal Tribes” and British colonial policy. Orient Longman.
Rao, B. N. (1945). The depressed classes. Government of India Press.

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