19/04/2026
सेवाग्राम की अमर कथा: महात्मा और मानवता की परीक्षा
इतिहास के पन्नों में राजनीतिक आंदोलनों का शोर तो बहुत है, लेकिन सेवाग्राम आश्रम की एक छोटी सी कुटी में मानवता की जो मौन क्रांति हुई, वह आज भी हमें प्रेम का वास्तविक अर्थ सिखाती है। यह कहानी है परचुरे शास्त्री और महात्मा गांधी के अटूट आत्मीय संबंधों की।
करुणा की अग्निपरीक्षा
संस्कृत के प्रकांड विद्वान परचुरे शास्त्री ने कुष्ठ रोग से पीड़ित थे उन्हें उनके परिजनों और समाज के लोगों ने कुष्ठ रोगी होने के कारण तिरस्कृत कर दिया था। परचुरे शास्त्रों ने ऐसी स्थिति में गांधीजी को एक पत्र लिखा, जब बापू ने यह पत्र प्रार्थना सभा में पढ़ा तो सेवाग्राम में सन्नाटा पसर गया। उस दौर में कुष्ठ रोग केवल एक बीमारी नहीं, बल्कि एक सामाजिक अभिशाप था।लोग कुष्ठ रोगी से दूर भागते थे।
प्रार्थना सभा की चुप्पी को तोड़ते हुए गांधीजी ने कहा कि अगर एक कुष्ठ रोगी के अपार कष्ट में आपके ह्रदय में करुणा नहीं तो फिर मैं इतना ही कहूंगा कि सेवाग्राम में मेरे बगल से जो कुटी है उसमें परचुरे शास्त्री रहेंगे और मैं स्वयं उनकी सेवा करूंगा। कुष्ठ रोग कोई अपवित्रता या संक्रामकता नहीं, बल्कि हमारे करुणा-भाव की परीक्षा है।
कुछ दिनों बाद परचुरे शास्त्री सेवाग्राम पहुँचे।
गांधीजी ने स्वयं उनकी सेवा शुरू की। शास्त्रीजी की सेवा करना, उनके घाव धोना, पट्टियाँ बाँधना, अपने हाथ से नहलाना, उन्हें अपने हाथ से भोजन कराना गांधीजी का नित्यकर्म बन गया। यह दृश्य देखने वालों की आँखें नम हो जातीं थीं कि भारत का राष्ट्रपिता स्वयं एक रोगी के पैर धो रहा है ,तोलिए से शरीर पोंछ रहा है।
कर्तव्य से ऊपर सेवा
जून 1945 में शिमला वार्ता के दौरान जब वायसराय लॉर्ड वेवेल ने वार्ता 7 दिनों के लिए स्थगित की, तो नारायण भाई देसाई शिमला की वादियों में घूमने की योजना बना रहे थे। लेकिन गांधीजी ने सबको चौंकाते हुए वापस सेवाग्राम चलने का आदेश दिया। नारायण भाई देसाई ने कहा कि बापू दो दिन ट्रेन से पहुंचने में और दो दिन ट्रेन से वापसी में लगेंगे। तीन दिन के लिए सेवाग्राम जाकर क्या करेंगे? गांधीजी ने कहा कि तीन दिन मुझे परचुरे शास्त्री की सेवा के लिए मिल जाएंगे।
शिमला से लंबी ट्रेन यात्रा कर गांधीजी वापस सेवाग्राम पहुँचे। वहाँ परचुरे शास्त्री अत्यंत दुर्बल अवस्था में थे। गांधीजी ने उनके सिर पर हाथ रखा, मुस्कुराए, और बोले “शास्त्रीजी, मैं लौट आया हूँ। अब मेरा मन शांत है।”
गांधीजी ने तीन दिन राजनीतिक चिंतन को विराम दिया और फिर से वही पुरानी दिनचर्या शुरू कर दी। सुबह-शाम परचुरे शास्त्री की सेवा, उनके घावों की सफाई करने लगे।
भगवान ने स्वयं मेरे घावों को छुआ है
शास्त्रीजी की हालत गंभीर थी, गांधीजी के आने से उनका चेहरा संतोष से चमक रहा था। उनके मुख से इतना ही निकला “बापू, लगता है कि भगवान ने स्वयं मेरे घावों को छुआ है।”
5 सितंबर 1945 को परचुरे शास्त्री का सेवाग्राम में निधन हो गया। आज भी सेवाग्राम आश्रम की “परचुरे कुटी” में जीवित है,जहाँ हर ईंट करुणा, समानता और मानवता की गवाही देती है। गांधीजी ने उनके निधन पर कहा कि “परचुरे शास्त्री ने हमें सिखाया कि प्रेम हर घाव का सबसे बड़ा उपचार है।
गांधीजी के जीवन से हमें यही सीख मिलती है कि महानता ऊँचे पदों में नहीं, बल्कि झुककर किसी के घाव पोंछने में निहित है। चिकित्सा केवल दवाओं से नहीं, बल्कि उस स्पर्श से होती है जिसमें 'अपनत्व' घुला हो।
Gandhi Darshan - गांधी दर्शन
19 अप्रैल 2026