11/02/2026
कालनेमि आज भी ज़िंदा है बस हमें पहचानने की जरूरत है।
इस विषय पर अपना तर्क प्रस्तुत करें। वर्तमान में यह विषय बहुत प्रसांगिक विषय है।
रामायण में एक पात्र आता है—कालनेमि। वह साधु का भेष धरकर हनुमान जी को भ्रमित करने आया था। केसरिया वस्त्र, जप-तप, मीठे वचन… सब कुछ था, पर भीतर छल और स्वार्थ भरा था। हनुमान जी ने पहचान लिया कि साधु का वेश पहन लेने से कोई साधु नहीं बन जाता, विचार बदलने पड़ते हैं।
इसी तरह रावण भी माता सीता का हरण करने साधु बनकर ही आया था। बाहरी रूप धर्म का था, लेकिन मन में अहंकार, सत्ता और वासना थी। इसलिए वह रावण ही रहा—भेष बदल गया, विचार नहीं।
आज का भारत भी कुछ ऐसा ही दृश्य देख रहा है। हिंदू होने का दावा, धर्म की भाषा, मंदिर-घंटे और नारों की गूंज—सब कुछ दिखाई देता है। लेकिन उसी के साथ हिंदू समाज को जातियों में बाँटने, एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा करने और भेदभाव को कानून और नीतियों के ज़रिये मजबूत करने के प्रयोग भी चल रहे हैं।
अगर सत्ता सच में हिंदू विचारधारा से चलती, तो वह समरसता, समानता और एकता को मजबूत करती—न कि समाज को छोटे-छोटे खांचों में तोड़ती।
हिंदू धर्म की आत्मा “वसुधैव कुटुम्बकम्” है, न कि “तुम ऊँचे, हम नीचे”।
हिंदू होना कपड़ों, नारों या सत्ता से नहीं तय होता—विचार, आचरण और न्याय से तय होता है।
इतिहास गवाह है—
भेष बदलने वाले बहुत आए,पर हम फिर भी दिग भ्रमित नहीं हुए
कालनेमि और रावण अंततः पहचाने गए।
अब सवाल यह है—
हम पहचानेंगे या फिर भ्रमित ही रहेंगे ?
कालनेमि आज_भी जिंदा है
व्यक्ति का भेष नहीं विचार देखो
हिंदू एकता के लिए जातिवाद_बंद करो
जबकि धर्म हमें न्याय शांति करूणा दया सिखाता है
हम सभी को रामायण से सबक लेना चाहिए।
सत्ता या संस्कार,त्याग , संतोष या भोग,