11/04/2026
इंसानी ज़िन्दगी के लिए एक अव्यावहारिक किताब है क़ुरान।
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एक इंसान को सामान्य ज़िन्दगी जीने तक से भी रोकती है क़ुरान। एक इंसान सामान्य रूप से जीने के लिए जो कुछ भी करता है। यह उस सबकी मुमानियत करती है। रोज़ाना की ज़िन्दगी के जो अभिन्न अंग हैं। जिनके बिना जीने की कल्पना तक भी नहीं की जा सकती। यह उन सब पर सख़्त पाबंदी लगाती है। क़ुरान में हँसना, गाना, नाचना, संगीत, आपसी बातचीत, गुफ्तगू करना, कोई भी अच्छा काम करना, गुनगुनाना, किसी भी तरह का खेल खेलना, हंसी-मजाक करना, चुहल करना, गुदगुदाना, किसी भी तरह का मनोरंजन करना, मुस्कराना, प्यार करना, दोस्त बनाना, उछलना व कूदना सभी कुछ हराम है वर्जित है। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि क़ुरान इंसानों को मुर्दों की तरह से गूंगे-बहरे होकर, बिना हिले-डुले व रोते हुए ही जीने का फ़रमान देती है। क़ुरान को हँसते हुए इंसान अच्छे नहीं लगते। यह इंसानों को खुशहाल तरीके से जीते हुए देखना ही नहीं चाहती।
यह मेरा विश्व के सभी मुल्ला, मौलाना, मौलवी, क़ारी और उलेमाओं को चैलेंज है कि कोई भी मुझे क़ुरान की रोशनी में मेरी इन बातों का जवाब दे और मुझे ज़्यादा तो क्या सिर्फ़ और सिर्फ़ कोई ऐसा मुस्लिम पूरी दुनियाँ में बता दे। जो सिर्फ़ और सिर्फ़ क़ुरान के अहकाम के मुताबिक ही जी रहा हो। मेरा कहना है कि दुनियाँ में सभी के सभी मुस्लिम हराम की ज़िंदगी जी रहे हैं। यदि किसी को उज्र है तो यहाँ पर जवाब दे सकता है।
मेरा कहना है कि क़ुरान बहुत ही ज़्यादा महदूद किताब है। जिसमें यह कहीं भी नहीं लिखा है कि मुसलमान Electricity और बिजली और उसके Appliances का स्तैमाल करेंगे। इसके साथ ही पेट्रोलियम पदार्थों पेट्रोल, डीजल व रसोई गैस आदि का प्रयोग करेंगे। Electronics Gadgets जैसे TV, Computer, Laptop, Mobile Phone, Network, Social Media आदि का प्रयोग करेंगे। क्या क़ुरान में यह लिखा हुआ है? यदि नहीं! तो फिर यह स्वतः ही साबित हो जाता है कि विश्व के सभी मुसलमान हराम की ज़िंदगी ही जी रहे हैं। इसीलिए मैं कह रहा हूँ कि ज़िन्दगी के लिए इतनी ज़्यादा अपर्याप्त और Insufficient किताब है क़ुरान।
यदि सच कहा जाए तो क़ुरान इंसानों को एक प्रकार से जीने की ही मुमानियत करती है। जैसे कोई कह रहा है कि आपको आक्सीजन के बिना ही जीना होगा। क्या यह सम्भव हो सकता है? बिल्कुल भी नहीं। फिर तो समझ में आ ही जाना चाहिए कि कितनी अव्यावहारिक किताब है यह क़ुरान।
लोधी विनोद पटेल, आगरा।