18/03/2026
रिसेप्शन पर बैठी लड़की ने सिर उठाया तो उसने देखा
"द्वार पर एक दुबला-पतला बूढ़ा आदमी खड़ा था। बाल पूरी तरह सफ़ेद, कमीज़ पर धुले हुए पुराने दाग, और हाथ में एक नीला प्लास्टिक फ़ोल्डर… जिसमें शायद उसका बायोडाटा था।"
"वह धीरे-धीरे अंदर आया, जैसे हर कदम किसी याद को दबाकर रखा गया हो।
लड़की ने चौंककर पूछा,
“जी आप?”
बूढ़े ने धीमे से कहा,
“न… नौकरी के लिए… आवेदन देना था।”
और यही क्षण पूरे ऑफिस में एक अनचाहा सन्नाटा छोड़ गया।
HR मैनेजर अभिषेक ने जब उस बूढ़े आदमी को देखा, तो उसे अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ।
"सामने करीब 68-70 साल का व्यक्ति,
जो शायद ठीक से चल भी नहीं पा रहा था,"
नौकरी के लिए आवेदन लेकर आया था।
अभिषेक ने नरमी से कहा,
“दादाजी, नौकरी? आप… आपको किस तरह का काम चाहिए?”
"बूढ़े आदमी ने फ़ोल्डर खोला, काँपते हाथों से बायोडाटा आगे बढ़ाते हुए बोला,"
“कोई भी… जो आप दे सकें। मैं सीख लूँगा।”
उसकी आवाज़ में एक ऐसी टूटन थी…
जैसे उसने कभी जीवन से उम्मीद ही नहीं की थी,
"बस ज़रूरत ने उसे आज इस दफ़्तर तक पहुंचाया था।"
अभिषेक ने बायोडाटा खोला…
और उस पर नज़र पड़ते ही उसका दिल जैसे भारी हो गया।
"बायोडाटा"
नाम: सुरेश प्रसाद
उम्र: 69 वर्ष
योग्यता: 12वीं पास
अनुभव:
32 साल सरकारी स्कूल में चपरासी
समय पर स्कूल खोलना
सफ़ाई, बच्चों की मदद, चाय-पानी
रिटायरमेंट: 7 साल पहले
लेकिन आख़िरी लाइन ने अभिषेक को अंदर तक हिला दिया
“पेंशन का पैसा धोखे से ले लिया गया, घर में कोई कमाने वाला नहीं, दो पोते स्कूल में हैं, बहू बीमार है… नौकरी न मिले तो शायद घर चलाना मुश्किल हो जाएगा।”
अभिषेक ने सिर उठाकर बूढ़े आदमी को देखा।
वह फ़ोल्डर कस कर पकड़े खड़ा था। उसकी आँखों में उम्मीद नहीं… सिर्फ़ बेबसी थी।
ऑफिस में फुसफुसाहट हो रही थी।
कुछ कर्मचारी कान में कान डालकर कहने लगे
“इतनी उम्र में नौकरी?”
“अब उम्र भर काम और क्या करना?”
“चैरिटी चल रही है क्या?”
लेकिन अभिषेक किसी और दुनिया में खो गया था।
उसे अपने पिता का चेहरा याद आ गया…
जो उम्र में लगभग इतने ही थे…
और diabetes व arthritis से जूझ रहे थे।
अगर कभी हालात ऐसे हो जाएँ कि उसके पापा को नौकरी ढूँढनी पड़े…
तो?
उसकी आँखें नमी से भर गईं।
अभिषेक ने नम्रता से कहा,
“दादाजी, बैठिए। मैं आपका छोटा सा इंटरव्यू लेता हूँ…”
बूढ़ा थोड़ा हिचका, जैसे उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि उसे सच में बैठने को कहा जा रहा है।
वह धीरे से कुर्सी पर बैठा और बोला,
“बेटा, इंटरव्यू की ज़रूरत नहीं… बस काम दे दो। मैं सुबह सबसे पहले आ जाया करूँगा। मेहनत करूँगा। किसी से झगड़ा नहीं करूँगा।”
“दादाजी, ऐसा नहीं कहते,” अभिषेक मुस्कुराया।
“आप बताइए, आपको नौकरी क्यों चाहिए?”
बस यह सवाल सुनते ही बूढ़ा आदमी तुड़प सा गया।
उसके होंठ काँपे, और गला भर आया।
कुछ सेकंड चुप रहकर उसने कहा…
“मेरी पत्नी तीन साल पहले चल बसी।
बड़ा बेटा… ट्रक चलाता था… सड़क हादसे में चला गया।
बहू अकेली रह गई… दो पोते हैं।
पेंशन का पैसा मेरे छोटे भाई ने हड़प लिया…
काग़ज़ पर धोखा करके।
अब केस चल रहा है… पर न्याय कहाँ इतनी जल्दी मिलता है?”
वह हँसने की कोशिश करता है पर आवाज़ फट जाती है
“बहू बीमार रहती है। पोते स्कूल जाते हैं…
मैं उनके लिए फीस न भर पाऊँ तो मुझे नींद नहीं आती।”
उसका हाथ सीना पकड़ लेता है,
“बेटा, घर में अनाज तक नहीं बचा।
कुछ दिन पहले पड़ोस से उधार माँगा…
तो शर्म से जमीन में गड़ गया।”
वह काँपती आवाज़ में आख़िरी बात कहता है
“इसलिए नौकरी चाहिए… किसी भी तरह की।”
अभिषेक की आँखें भर आईं।
लेकिन उसने अपने चेहरे पर भाव नहीं आने दिए।
उसने पूछा,
“दादाजी, चलने-फिरने में दिक्कत है?”
“थोड़ी… पर कर लूँगा बेटा।
बस आप मुझे बोझ मत समझना।”
यह सुनते ही अभिषेक ने गहरी साँस ली।
अभिषेक ने उस बूढ़े को पानी देकर कहा,
“आप पाँच मिनट बैठिए… मैं लौटता हूँ।”
और वह सीधे मालिक मीरा मेहता के केबिन में गया।
मीरा ने जब पूरी बात सुनी…
उनकी आँखें भी भर आईं।
“अभिषेक, ऐसे लोग हमारे सिस्टम में खो जाते हैं।
हमें कुछ करना चाहिए।”
“मैम, बात सिर्फ़ नौकरी की नहीं है…
इज़्ज़त की है।
उन्हें दया नहीं… काम चाहिए।”
मीरा बोलीं,
“ठीक है। उन्हें ऑफिस असिस्टेंट की नौकरी दे देते हैं
हल्के काम की।
और हर महीने के साथ हम एक छोटी सी extra मदद भी जोड़ देंगे,
लेकिन उन्हें लगे कि यह उनके मेहनताने का हिस्सा है…
खैरात नहीं।”
अभिषेक के चेहरे पर राहत उतर आई।
जब दोनों वापस लॉबी में आए, बूढ़ा अपनी फ़ाइल पकड़े, उम्मीद टूटने वाले चेहरे के साथ खड़ा था।
शायद वह सोच रहा था—
‘कहीं मना न कर दें।’
मीरा ने मुस्कुराकर कहा,
“श्री सुरेश प्रसाद?”
बूढ़ा घबराकर खड़ा हो गया।
“आपकी नियुक्ति कर दी गई है।”
वह स्तब्ध रह गया।
दो सेकंड तक तो उसे विश्वास ही नहीं हुआ।
“स…सच?”
उसकी आँखों में आंसू छलक आए।
“हाँ। कल से काम शुरू।
बस थोड़ा ऑफिस में दस्तावेज़ भरने होंगे।”
बूढ़ा आदमी फ़ोल्डर छाती से लगा लेता है और रो पड़ता है।
रोना भी ऐसा…
जैसे बरसों बाद किसी ने उसकी थकी हुई ज़िंदगी को सहलाया हो।
उसने कांपते हाथों से अभिषेक और मीरा के पैर छूने की कोशिश की,
पर उन्होंने तुरंत रोक लिया।
“दादाजी ये क्या कर रहे हैं!?”
अभिषेक ने कहा।
बूढ़ा बोला
“बेटा… तुमने आज मेरे घर में उम्मीद जगा दी।
मेरे पोते की फीस भर जाएगी…
बहू को दवा मिल जाएगी।”
अभिषेक ने उसकी पीठ थपथपाई,
“अब आप हमारे ऑफिस के दादाजी हैं।
अब किसी चीज़ की चिंता मत करना।”
अगले दिन बूढ़ा आदमी साफ़ कुर्ता पहनकर आया।
उसने अपनी दाढ़ी भी थोड़ी सी कटवाई थी।
ऑफिस में सबके लिए उसने पानी रखा,
डाक पहुँचाई,
गमलों में पानी दिया…
और हर काम ऐसे करता जैसे उसकी पूरी दुनिया वही हो।
लोगों ने देखा जब वह फाइलें संभालता, तो उसके हाथ काँपते थे,
पर उसकी आँखों में मेहनत की चमक जगमगाती थी।
कई बार वह अपने छोटे पोते की टॉफी का खाली रैपर निकालकर जेब में रखता,
फिर उसे देख मुस्कुराता।
शायद उसे याद आता होगा
अब इस रैपर को दोबारा भरने के पैसे मिलेंगे।
एक महीना पूरे होने पर पहले महीने की तनख्वाह मिली
8,000 रुपये।
मीरा ने उसमें 3,000 की ‘बोनस इंक्रीमेंट’ जोड़ दी।
बूढ़े ने तनख्वाह का लिफाफा हाथ में लेकर कहा…
“बेटा, इतने पैसे कभी देखे नहीं…
मैंने तो सोचा था किसी दुकान में झाड़ू लगाकर 2–3 हजार मिलेंगे…
लेकिन आज…”
उसकी आँखें फिर भर आईं।
अभिषेक ने मुस्कुराते हुए कहा,
“दादाजी, पैसे अब कम नहीं रहे…
आप कमा रहे हैं।
और आपने ये हर रुपए अपने हक़ से पाए हैं।”
दो महीने बाद…
एक सुबह बूढ़ा आदमी ऑफिस नहीं आया।
फोन करने पर बहू की टूटी आवाज़ आई
“भैया… बाबूजी की तबीयत रात से खराब थी।
अभी हम अस्पताल में हैं…”
सब घबरा गए।
अभिषेक और मीरा अस्पताल पहुँचे तो देखा
बूढ़ा आदमी बेड पर लेटा था।
ऑक्सीजन लगा था।
लेकिन जैसे ही उसने अभिषेक को देखा…
वह मुस्कुराया।
“बेटा… ऑफिस नहीं जा पाया… सॉरी…”
अभिषेक की आँखें भर आईं,
“दादाजी, ऐसी बात मत कीजिए।”
बूढ़ा धीरे बोला,
“आज… मेरे पोते की फीस भरनी थी…
तुम… भर देना, बेटा।”
अभिषेक ने उसका हाथ पकड़ा,
“दादाजी, वह काम मैं कर चुका हूँ… आपके नाम पर।”
बूढ़े की आँखों से आँसू बह निकले।
उसने धीरे से कहा,
“भगवान तुम्हें… खुश रखे…
तुमने मुझे… एक इंसान होने का सम्मान दिया।”
और अगले ही पल…
उसके हाथ की पकड़ ढीली हो गई।
और दादा जी इस दुनिया से बिदा हो गए।
ऑफिस में उस दिन कोई काम नहीं हुआ।
सभी ने दो मिनट का मौन रखा।
मीरा ने घोषणा की
“श्री सुरेश प्रसाद हमारे कर्मचारी नहीं… परिवार का हिस्सा थे।
उनके पोतों की शिक्षा का पूरा खर्च हमारी कंपनी उठाएगी।”
अभिषेक ने बूढ़े का फ़ोल्डर उठाया
जिसमें वही पुराना, काँपते हाथों से लिखा बायोडाटा रखा था।
उस बायोडाटा के साथ एक चिट्ठी भी थी,
शायद उसने बहुत पहले लिखी होगी
“अगर मुझे नौकरी मिल जाए,
तो मेरे पोते का भविष्य चमक जाएगा।
अगर न मिले…
तो शायद वह पढ़ाई छोड़ देगा।
मेरी एक ही इच्छा है—
वह मुझसे बेहतर इंसान बने।”
अभिषेक की आँखें भर आईं।
वह फुसफुसाया,
“दादाजी, आपका पोता ज़रूर कुछ बड़ा बनेगा…
हम सब आपकी आख़िरी इच्छा पूरी करेंगे।”
और सच में
अगले साल कंपनी ने दादाजी के नाम पर एक छात्रवृत्ति शुरू की
“सुरेश प्रसाद स्मृति छात्रवृत्ति”
जिससे ग़रीब बच्चों की फीस भरी जाने लगी।
:- कई लोग बायोडाटा में अपनी काबिलियत लिखते हैं…
पर उस बूढ़े ने…
अपनी मजबूरी, अपना दर्द, और अपनी टूटती उम्मीदें लिखकर… एक पूरी दुनिया को इंसानियत सिखा दी।
कभी-कभी नौकरी…
सिर्फ़ पेट पालने का तरीका नहीं होती
वह किसी घर की रोशनी,
किसी पोते की पढ़ाई,
किसी बूढ़े बाप की इज़्ज़त भी होती है!(NA)!
और वह बूढ़ा आदमी…
अपनी आख़िरी सांस तक इज़्ज़त से जिया।