Dr. B R Ambedkar Library Ramsara - Fazilka Punjab

Dr. B R Ambedkar Library Ramsara - Fazilka Punjab Founder and Director :- Amarjeet Bodhi

कोचेरिल रामन नारायणन: लोकतंत्र की ऊँचाइयों तक पहुँचा एक साधारण बेटा!!! 27 अक्टूबर 1920 को केरल के पलक्कड़ ज़िले के एक सा...
02/03/2026

कोचेरिल रामन नारायणन: लोकतंत्र की ऊँचाइयों तक पहुँचा एक साधारण बेटा!!! 27 अक्टूबर 1920 को केरल के पलक्कड़ ज़िले के एक साधारण परिवार में जन्मे कोचेरिल रामन नारायणन भारतीय गणराज्य के पहले दलित राष्ट्रपति और एक विद्वान राजनयिक थे।
उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि शिक्षा, संघर्ष और सेवा से कोई भी व्यक्ति भारत के सर्वोच्च पद तक पहुँच सकता है।
उन्होंने University of Travancore से स्नातक की पढ़ाई की और फिर London School of Economics से राजनीति विज्ञान में डिग्री प्राप्त की, जहाँ उनके शिक्षक थे प्रसिद्ध विचारक Harold Laski।
नारायणन ने भारतीय विदेश सेवा (IFS) में कार्य किया और बर्मा, जापान, ब्रिटेन और अमेरिका में भारत के राजदूत रहे।
राजनीति में आने के बाद वे तीन बार लोकसभा सांसद, केंद्रीय मंत्री, और फिर भारत के उपराष्ट्रपति (1992–1997) बने।
25 जुलाई 1997 को वे भारत के 10वें राष्ट्रपति बने, और अपने कार्यकाल में उन्होंने संविधान की मर्यादा को सर्वोपरि रखा।
📌 संक्षिप्त आँकड़े और उपलब्धियाँ:
- जन्म: 27 अक्टूबर 1920, उझावूर, केरल
- निधन: 9 नवंबर 2005, नई दिल्ली
- शिक्षा: University of Travancore, London School of Economics
- राजनयिक सेवा: IFS अधिकारी, राजदूत – अमेरिका, जापान, UK, बर्मा
- राजनीतिक पद: लोकसभा सांसद, केंद्रीय मंत्री, उपराष्ट्रपति (1992–1997), राष्ट्रपति (1997–2002)
- विशेषता: भारत के पहले दलित राष्ट्रपति, संवैधानिक मर्यादा के रक्षक
- प्रसिद्ध कथन: “I am not a rubber stamp President.”
नारायणन जी ने दिखाया कि संविधान का सम्मान, सामाजिक न्याय और नैतिक नेतृत्व ही लोकतंत्र की असली पहचान है।
उनकी विरासत आज भी भारत के हर नागरिक को समानता और गरिमा की प्रेरणा देती है।

विश्व के सभी धर्मों के पास अपना-अपना धार्मिक साहित्य मौजूद है जिसके आधार पर प्रत्येक धर्म के तत्वज्ञान का परिचय मिलता है...
15/02/2026

विश्व के सभी धर्मों के पास अपना-अपना धार्मिक साहित्य मौजूद है जिसके आधार पर प्रत्येक धर्म के तत्वज्ञान का परिचय मिलता है। बौद्धधम्म के खज़ाने में भी देश-विदेश से अपना एक विशाल मात्रा में साहित्य मौजूद है परन्तु विश्व भर के अन्य धर्मों के साहित्य की तुलना में बौद्ध साहित्य में बहुत बड़ा अंतर देखने को मिलता है। जहां अन्य धर्मों के ग्रंथों का एक भी शब्द इधर से उधर करने की अनुमति नहीं है वहीं पर बौद्धधम्म का साहित्य आलोचन के कटहरे में बरसों से खड़ा किया जाता रहा है।

इसका महत्वपूर्ण कारण यह है कि विश्व के अन्य धर्मों के ग्रंथ ईश्वर द्वारा रचित समझ कर पूजे जाते हैं परन्तु न तो बुद्ध ने स्वयं को एक गैर-दुनियावी पुरुष घोषित किया और न ही उनका कहा गया हर शब्द पत्थर की लकीर घोषित किया जाता है। यही कारण है कि बौद्ध साहित्य को कई परीक्षणों से गुज़रना पड़ता रहा है जिस वजह से बौद्ध साहित्य में समय-समय पर वृद्धि होती रही है।

बौद्ध धम्म का प्रहार तर्कहीन सिद्धांतों पर सबसे तीखा रहा है जिसका एक उदाहरण बौद्ध धम्म का मृत्यु के सिधांत के प्रति दृष्टिकोण है जो कि कर्मकांड के गोरखधंदे के विपरीत बिल्कुल पारदर्शी और सरल है।

बौद्ध यह कहते हुए ज़रा भी संकोच नहीं करते कि सारिपुत्र आदि प्रमुख श्रावक ही मृत्यु को प्राप्त नहीं हुए, बल्कि स्वयं बुद्ध भी मृत्युरूपी सत्य द्वारा कुचल दिए गए। इस दृष्टिकोण पर बहतरीन उदाहरण बाहरवीं शताब्दी के कल्याणी नामक भिक्षु का दिया जा सकता है जिन्होंने पालि में रचित अपनी कृति " तेलकटाहगाथा " में गाथा नं २० और २१ में बहुत स्पष्ट तौर पर मृत्यु की अनिवार्यता पर लिखा है :-

" जो सदा शुद्ध, मलरहित, श्रेष्ठा को प्राप्त सारिपुत्र प्रमुख मुनि तथा श्रावक थे, वे भी मृत्यु रूपी बड़वाग्नि के मुख में डूब गए और उसी तरह नष्ट हो गए जैसे वायु के झोंको से दीपक विनाश को प्राप्त हो जाते हैं।

खिले हुए कमल की भांति निर्मल, सुन्दर नेत्रवाले, बत्तीस लक्षणों से सुशोभित रूप शोभा वाले तथा समस्त आश्रवों का क्षय करने वाले, लोक के नाथ बुद्ध भी मृत्युरूपी मस्त महाहाथी द्वारा कुचल डाले गए..."

अन्य धर्मों में मृत्यु का सिद्धांत कर्मकांडी अथवा स्वर्ग-नर्क के लालच की विचारधार पर टिका है जो धर्म की दुकान चलाने का एक बीजमंत्र है परन्तु बौद्ध धम्म में मृत्यु का सिद्धांत निरंतर परिवर्तनशीलता और परस्पर निर्भरता पर खड़ा है।

बौद्ध धम्म में वैचारिक उड़ान कितनी ऊँची तथा गहरी है, इसका अनुमान इसमें निहित नैतिक विशेषताओं अथवा दुनिया भर में मौजूद बेहिसाब बौद्ध साहित्य से लगाया जा सकता है जो विश्व के अन्य किसी धर्म के संदर्भ में नज़र नही पड़ता...!!!

डा. अमृतपाल कौर.... 🌷🌈🌅💘🌷

इतिहासकार डी. एन. झा को पढ़ना क्यो जरूरी है? डी.एन. झा की नजर में  वर्तमान समय में इतिहासकारों और बुद्धिजीवियों का दायित्...
06/02/2026

इतिहासकार डी. एन. झा को पढ़ना क्यो जरूरी है?

डी.एन. झा की नजर में वर्तमान समय में इतिहासकारों और बुद्धिजीवियों का दायित्य-स्मृति दिवस ( 2 फ़रवरी) सादर नमन के साथ

66वें भारतीय इतिहास कांग्रेस (2006) को अध्यक्ष के रूप में संबोधित करते हुए डी. एन. झा ने इतिहासकारों-बुद्धिजीवियों- कहा कि “देश की वर्तमान स्थिति का तकाजा है कि हमारे बुद्धिजीवी और विद्वान उचित प्रतिक्रिया दें। हम विषय के रूप में इतिहास और देश तथा इसकी जनता के प्रति यदि उचित जिम्मेदारी नहीं निभाएंगे, यदि हम जहरीले सांप्रदायिक प्रचार का उचित जवाब नहीं देंगे और भारत के वस्तुगत और तथ्यात्मक इतिहास के चारों ओर बुने जा रहे मकड़जाल को साफ करके सच्चाई सामने नहीं लाएंगे, तो हम अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह नहीं करेंगे।” (हिंदू पहचान की खोज, भूमिका, पृ.1, पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस) अपने उपरोक्त वक्तव्य में डी. एन. झा एक इतिहासकार के रूप देश के सचेत बुद्धिजीवियों को संबोधित करते हुए उसकी तीन जवाब देहियों को चिन्हित कर रहे हैं, पहली जवाबदेही इतिहासकार होने के नाते वस्तुगत और तथ्यपरक इतिहास लेखन के प्रति है, लेकिन चूंकि एक इतिहासकार देश का सचेत नागरिक और बुद्धिजीवी भी होता है, इसलिए जवाबदेही देश और देश के जन के प्रति भी है।

डी. एन. झा ने जनबुद्धिजीवी का दायित्व निभाया-

डी. एन. झा के संपूर्ण लेखन के आधार पर यह कहा जा सकता है कि उन्होंने एक सचेत बुद्धिजीवी के रूप में देश और जन के प्रति अपनी जवाबदेही का पूरी तरह निर्वाह किया। यह जवाबदेही उन्होंने वस्तुपरक और तथ्यात्मक इतिहास लेखन करके और हिंदुत्ववादी शक्तियों द्वारा इतिहास को तोड़-मरोड़ कर इतिहास को हिंदू राष्ट्र निर्माण के टूल के रूप में इस्तेमाल करने की कोशिश का पुरजोर खंडन और विरोध करके पूरी की। उन्होंने साफ शब्दों में लिखा कि आज संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थों के लिए इतिहास को तोड़ा-मरोड़ा जा रहा है और उसका राजनीतिकरण किया जा रहा है। यह रूझान बदलनी होगी।

वर्तमान में इतिहास लेखन के बीच संघर्ष का मुख्य मुद्दा-

भारतीय इतिहास लेखन के संकट के वर्तमान स्वरूप को चिन्हित करते हुए उन्होंने कहा कि “भारत का इतिहास प्रगतिशील और दक्षिणपंथी प्रतिक्रियावादी पुरातनपंथी विचारों तथा विचारधाराओं, खासकर सांप्रदायिक प्रतिक्रियावादी विचारधारा के बीच युद्ध का मैदान बन गया है।” (वही) ऐसे समय में इतिहाकारों के दायित्व को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि “इसलिए वर्तमान परिस्थिति इतिहासकार सच्चा और वफादार प्रस्तुतीतकरण चाहती है ताकि विकृत एवं भुलावा देने वाले वक्तव्यों का खंडन किया जा सके।” ( वही) एक इतिहासकार के तौर पर डी. एन. झा ने खुद भी यही किया। उनके लिए इतिहास केवल भूतकाल का लेखा-जोखा नहीं था, वे इतिहास को वर्तमान में चल रहे संघर्षों से अलग करके नहीं देखते थे। इसी तथ्य को रेखांकित करते हुए उन्होंने लिखा कि “इतिहास न केवल भूतकाल है बल्कि वर्तमान भी है।” ( वही) इतिहास की अपनी इसी समझ के चलते उन्होंने वर्तमान में चल रहे, हर उस बहस में हिस्सा लिया, जिसका संबंध इतिहास की व्याख्या और प्रस्तुतीकरण से हो।

तथ्यों के आधार पर नहीं, हिंदुओं की आस्था के आधार पर बाबरी मस्जिद पर फैसला सुनाया गया- डी. एन. झा

सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला राम मंदिर के पक्ष में आने के बाद डी .एन झा ने बीबीसी से कहा था, “इसमें हिंदुओं की आस्था को अहमियत दी गई है और फ़ैसले का आधार दोषपूर्ण पुरातत्व विज्ञान को बनाया गया है।” यहां यह याद कर लेना जरूरी है कि प्रोफ़ेसर डी.एन. झा उन चार इतिहासकारों में से एक थे जिन्होंने ‘रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद: ए हिस्टॉरियन्स रिपोर्ट टू द नेशन’ रिपोर्ट सरकार को सौंपी थी।

डी. एन. झा ने लिख लिखा है कि छक कर शराब पीते थे- हिंदू देवी और देवता

अपनी इस रिपोर्ट में उन्होंने उस मान्यता को ख़ारिज किया था जिसमें कहा जाता है कि बाबरी मस्जिद के नीचे एक हिंदू मंदिर था। जब राज्यसभा में 2017 में हिंदू देवी-देवताओं के शराब पीने न पीने के प्रश्न गरमा-गरम बहस हुई, तो उसमें हस्तक्षेप करते हुए डी. एन. झा ने 29 जुलाई 2017 के ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में लेख लिखकर बताया कि हिंदू देवी-देवता छक कर शराब पीते थे। उन्होंने लिखा “सोम वैदिक देवा-देवताओं का एक पसंदीदा पेय था। इसे इन्द्र, अग्नि, वरूण, मारुत और आदि देवताओं को प्रसन्न करने के लिए अधिकांश यज्ञों में चढ़ाया जाता था।… वैदिक उद्धरणों में उसका (इंद्र) वर्णन एक बहुत बड़े पियक्कड़ और शराबी के रूप में किया गया है। उसके बारे में कहा गया है कि दैत्य व्रीत्रा की हत्या करने से पहले वह तीन तालाबों का सोम पी गया था।… वैदिक रचनाओं की तरह महाकाव्यों में इस बात के प्रमाण मिलते हैं कि हिंदू धर्म में जिन्हें ईश्वर का स्थान प्राप्त है वे लोग शराब का सेवन करते थे। उदाहरण के लिए महाभारत में संजय वर्णन करते हैं कि कृष्ण (भगवान विष्णु के एक अवतार) और अर्जुन द्रौपदी और सत्यभामा (कृष्ण की पत्नी और भूदेवी की एक अवतार) बास्सिया शराब से मदमस्त हैं। महाभारत के एक परिशिष्ट हरिवंश में वर्णन किया गया है कि विष्णु के एक अवतार बलराम “कदंब मदिरा के भरपूर पान से उत्तेजित” होकर अपने पत्नी के साथ नृत्य कर रहे हैं। रामायण के एक प्रसंग में वर्णन मिलता है कि विष्णु के अवतार राम सीता को आलिंगनबद्ध करके उन्हें शुद्ध मैरेय शराब पिला रहे हैं। (द इंडियन एक्सप्रेस, 29 जुलाई 2017)

गाय और राम हिंदुत्व की राजनीति के वाहक रहे हैं। हिंदुत्वादियों ने हिंदुओं के मनो-मस्तिष्क में यह बैठाने की कोशिश की प्राचीन काल से गाय पवित्र रही है और गोमांस-भक्षण की शुरुआत इस्लाम के आने के बाद होती है। इस प्रस्तुतीकरण में भी तथ्यों को दरकिनार कर प्राचीन भारत में गाय पवित्र जानवर थी, इसका मिथक गढ़ा गया और इस मिथक इस्तेमाल मुसलमानों को बदनाम करने तथा सांप्रदायिक राजनीतिक ध्रुवीकरण के लिए किया गया और अभी भी किया जा रहा है। गाय की पवित्रता के इस मिथक को प्रमाणिक साक्ष्यों के आधार खारिज करने के लिए और गाय से जुड़े इतिहास के वस्तुगत प्रस्तुतीकरण के लिए डी. एन. झा ने 2002 में ‘द मिथ ऑफ़ होली काउ’ शीर्षक किताब लिखी।

गौ मांस खाने ने खाने के सवाल पर डी. एन. झा की राय

2004 में इसका हिंदी संस्करण ‘पवित्र गाय का मिथक’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ। उन्होंने इस किताब की प्रस्तावना में ही लिखा कि “भारतीय गाय की ‘पवित्रता’ के बारे में विद्वानों के बीच पिछले सौ सालों से अधिक समय से बहस चल रही है। उनमें कुछ तो इस विचार से चिपटे रहे कि ऐसे परम पावन पशु को प्राचीन भारतीय और वैदिक लोग खाते नहीं होंगे। उन्होंने यह भी किया कि गोमांस-भक्षण का संबंध इस्लाम के आगमन से जोड़ दिया और उसे मुस्लिम समुदाय की पहचान के रूप में देखा। लेकिन प्रस्तुत रचना (पवित्र गाय का मिथक) में यह दिखलाने के प्रयास किया गया है कि गाय की ‘पवित्रता’ एक भ्रम है और उसका मांस प्राचीन भारतीय सामिषहार पद्धति और आहार परंपरा का एक अंग था।… यह पुस्तक (पवित्र गाय का मिथक) लिखने मुख्य प्रयोजन स्पष्ट रूप से यह दिखला देना है कि गोमांसहार भारत को इस्लाम की ‘विनाशकारी विरासत’ नहीं थी और गोमांस का परहेज ‘हिंदू’ पहचान की निशानी नहीं हो सकता, चाहे हिंदुत्व के अज्ञानी झंडाबरदार कुछ भी कहें, जिन्होंने इस्लाम के अनुयायियों को पराया मानने की झूठी भावना भड़काने की भरपूर कोशिश की।” (पवित्र गाय का मिथक, प्रस्ताना, पृ.10)

उन्होंने स्पष्ट शब्दों में लिखा कि “गाय के प्रति श्रद्धा को सांप्रदायिक पहचान का रूप दे दिया गया है और रूढिवादी तथा कट्टरपंथी शक्तियां यह समझने के लिए तैयार नहीं हैं कि वैदिक तथा परवर्ती ब्राह्मणीय और अब्राह्मणीय परंपरा में गाय का स्थान विशेष पवित्र नहीं था और अन्य प्राणियों के मांस के साथ गोमांस प्राचीन भारत में बहुधा प्रिय आहार का अंग हुआ करता था।” (पवित्र गाय का मिथक, पृ.17)। उन्होंने यह भी लिखा कि “उन्हें, (हिंदुओं को) इस बात का अहसास नहीं है कि वैदिक पूर्वज भी विदेशी थे, जो गाय तथा अन्य जानवरों का मांस खाते थे।” (वही, पृ.17) उन्होंने साक्ष्यों के साथ लिखा कि “सबसे महत्वपूर्ण सार्वजनिक वैदिक यज्ञ अश्वमेध में, जिसका प्रथम उल्लेख ऋग्वेद में हुआ है और जिसका विवेचन ब्राह्मणों में किया गया है, 600 से अधिक पशु बलि (बनैले सुअर सहित) और पक्षी बलि दिए जाते थे और पूर्णाहुति में 21 बंध्या गायों का बध किया जाता था। (वही, पृ.23) डी. एन. झा ने यह बताया है कि न केवल साहित्यिक स्रोत प्राचीन काल में मांसाहार के लिए गायों के बध की पुष्टि करते है, पुरातात्विक साक्ष्य भी इसकी पुष्टि करते हैं।

इस संदर्भ में उन्होंने लिखा कि “अब तक उत्खनित चित्रित धूसर मृदभांड़ ठिकानों में जो अस्थिगत अवशेष मिले हैं उनमें गाय-बैलों की हड्डियां सबसे ज्यादा आम हैं और इससे यही अचूक निष्कर्ष निकलता है कि गो-पालन आहार के लिए भी किया जाता था और अन्य प्रयोजनों से भी। इस प्रकार, गोमांस भक्षण की पुष्टि उत्तर भारत में, विशेषतया उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब तथा राजस्थान के दूर-दूर तक बिखरे बहुत सारे वैदिक और वेदोत्तर ठिकानों से होती है। लेकिन जलाए या काटे जाने के निशान वाले प्राणियों की हड्डियों की गिनती करने की अपेक्षा यहां इतना कह देना पर्याप्त होगा कि एक महत्वपूर्ण आहार के में गो-मांस के वैदिक उल्लेख पुरातात्विक साक्ष्यों से बहुत ठीक मेल खाते हैं।” ( वही, पृ.30)।

प्राचीन हिंदू भारत के स्वर्ण युग की कल्पना डी. एन . झा की नजर में फर्जी है-

प्राचीन भारत में कोई स्वर्ण युग मौजूद था, इस पूरी अवधारणा को डी. एन. झा खारिज करते हैं। बीबीसी के साथ एक साक्षात्कार में उन्होंने दो टूक कहा कि ऐतिहासिक साक्ष्य ये कहते हैं कि भारतीय इतिहास में कोई स्वर्ण युग नहीं था। प्राचीन काल को हम सामाजिक सद्भाव और संपन्नता का दौर नहीं मान सकते। इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि प्राचीन भारत में जाति व्यवस्था बहुत सख़्त थी।….गैर-ब्राह्मणों पर सामाजिक, क़ानूनी और आर्थिक रूप से पंगु बनाने वाली कई पाबंदियां लगाई जाती थीं। ख़ास तौर से शूद्र या अछूत इसके शिकार थे। इसकी वजह से प्राचीन भारतीय समाज में काफ़ी तनातनी रहती थी। उन्होंने यह भी कहा कि स्वर्ण युग की यह पूरी परिकल्पना उन्नीसवीं सदी के आख़िर से उपजा। यह एक राजनीतिक परियोजना का हिस्सा था, न कि साक्ष्यों पर आधारित इतिहास लेखन।

डी. एन. झा की नजर में कैसे मध्यकालीन मुस्लिम शासकों भारत को हिंदू परियोजना के लिए बदनाम किया गया है-

(https://www.bbc.com/hindi/india-55937025,) उन्होंने मुस्लिम शासकों को दानव और अत्याचारी ठहराने की कुछ इतिहासकारों की कोशिश को हिंदुत्ववादी राजनीतिक परियोजना का हिस्सा माना। उन्होंने लिखा कि जहां तक मध्यकालीन मुस्लिम शासकों के आतंक और ज़ुल्म वाली हुकूमत की बात है और उन्हें दानव के तौर पर पेश करने की कोशिश है, यह सब भी उन्नीसवीं सदी के आख़िर से ही शुरु हुआ था। क्योंकि उस दौर के कुछ सामाजिक सुधारकों और दूसरे अहम लोगों ने मुसलमानों की छवि को बिगाड़कर पेश करने करना शुरु किया। जैसे कि दयानंद सरस्वती (1824-1883) अपनी किताब सत्यार्थ प्रकाश में दो अध्याय इस्लाम और ईसाई धर्म की बुराई को समर्पित कर दिए। इसी तरह विवेकानंद (1863-1902) ने कहा कि, ‘प्रशांत महासागर से लेकर अटलांटिक तक पूरी दुनिया में पांच सौ साल तक जो रक्त प्रवाह होता रहा, वही इस्लाम धर्म है।

मुस्लिम शासकों को ज़ुल्मी ठहराने का जो दौर तब से शुरू हुआ, वो आज तक जारी है। हिंदुत्व के विचारक और अनुयायी मुस्लिम शासकों को षडयंत्रकारी और हिंदुओं का धर्म परिवर्तन कराने वाला बताते रहे और उन्हें हिंदुओं के मंदिर गिराने वाले और हिंदू महिलाओं से बलात्कार करने वालों के रूप में प्रचारित करते रहे। डी. एन. झा ने ताराचंद, मोहम्मद हबीब, इरफ़ान हबीब, शीरीन मूसवी, हरबंस मुखिया, ऑड्रे ट्रश्क और दूसरे इतिहासकारों द्वारा उपलब्ध कराए गए साक्ष्यों के हवाले इस पूरी सोच को चुनौती दी।
(https://www.bbc.com/hindi/india-55937025)

बख्तियार खिलजी ने नहीं, ब्राह्मणों ने जलाया था- नालंदा- डी. एन. झा

डी.एन. झा पूर्व मध्यकालीन इतिहास के संदर्भ में भी फैलाए गए अन्य झूठे मिथकों को साक्ष्यों के आधार खारिज करते हैं। इन झूठे मिथकों में आम तौर स्वीकृत एक मिथक है यह है कि नालंदा विश्वविद्यालय और उसके पुस्तकालय को बख्तियार खिलजी ने जलाया और नष्ट किया था। डी. एन. झा ने तिब्बती बौद्ध धर्मग्रंथ ‘परासम-जोन-संग’ को उद्धृत करते हुए बताया है कि हिंदू अंध श्रद्धालुओं द्वारा नालंदा को पुस्तकालय जलाया गया था। ( स्रोत- हिदू पहचान की खोज, पृ.38, डी. एन. झा) उनके इस मत की पुष्टि इतिहासकार बी. एन. एस. यादव भी करते हैं, उन्होंने लिखा है कि “आमतौर पर यह माना जाता है कि नालंदा विश्वविद्यालय को बख्तियार खिलजी ने नष्ट किया था, जबकि उसे हिंदुओं ने नष्ट किया था।” इतिहासकार डी. आर. पाटिल को उद्धृत करते हुए वे लिखते हैं कि “उसे (नालंदा विश्वविद्याल) शैवों (हिंदुओं) ने बर्बाद किया।” (स्रोत, एंटीक्वेरियन रिमेंन्स ऑफ बिहार, 1963, पृ.304) इस संदर्भ में आर. एस. शर्मा और के. एम. श्रीमाली ने भी विस्तार से विचार किया है (ए कम्प्रिहेंसिव हिस्ट्री ऑफ इंडिया, खंड, भाग-2 (ए. डी.985-1206) आगामी अध्याय ### (b) बुद्धिज्म फुटनोट्स 79-82

भारत और मध्यकालीन भारत का संघर्ष - ब्राह्मण-श्रमण परंपराओं के बीच संघर्ष का इतिहास है। हिंदू-मुस्लिम संघर्ष का नहीं- डी. एन. झा

असल में डी. एन. झा प्राचीनकालीन और पूर्व मध्यकालीन इतिहास को ब्राह्मण-श्रमण विचारों-परंपराओं के संघर्ष के रूप में देखते हैं और साक्ष्यों के आधार पर यह स्थापित करते हैं कि ब्राह्मणवादियों ने बड़े पैमाने पर बौद्ध मठों, स्तूपों और ग्रंथों को नष्ट किया और बौद्ध भिक्षुओं की बड़े पैमाने पर हत्या की। नालंदा विश्वविद्यालय और पुस्तकालय को जलाया जाना भी इस प्रक्रिया का हिस्सा था। ब्राह्मणों और श्रमणों के बीच संघर्ष का क्या रूप था। इस संदर्भ में सुप्रसिद्ध वैयाकरण पंतजलि (द्वितीय शताब्दी) लिखते हैं कि “श्रमण और ब्राह्मण एक दूसरे के शाश्वत शत्रु (विरोध: शाश्वतिक:) हैं, उनका विरोध वैसे ही है, जैसे सांप और नेवले के बीच। (उद्धृत डी. एन. झा, पृ. 34, हिंदू पहचान की खोज)

यह शत्रुता लंबे समय तक जारी रही है और बड़े पैमाने पर बौद्धों-जैनों और श्रमण पंरपरा के अन्य वाहकों के खिलाफ ब्राह्मणवादियों द्वारा हिंसा जारी रही। हिंसा के इस स्वरूप का साक्ष्यों द्वारा उद्घाटन करते हुए डी. एन. झा यह स्थापित करते है, हिंदू धर्म का इतिहास सहिष्णुता और अहिंसा का इतिहास रहा है, यह गढ़ा गया झूठा मिथक हैं। हिंदू धर्म का इतिहास हिंसा और असहिष्णुता से भरा पड़ा है। यह हिंसा न केवल श्रमण विचारों के वाहकों के खिलाफ हुई, इसके साथ वैदिक-ब्राह्मणवादी परंपरा के विभिन्न संप्रदायों के बीच भी व्यापक हिंसा हुई, जिसमें वैष्णवों और शैवों के बीच हिंसा भी शामिल है।

अपनी किताब ‘हिंदू पहचान की खोज’ में डी. एन. झा श्रमणों के खिलाफ ब्राह्मणवादियों की व्यापक हिंसा के प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। वे लिखते है कि “बौद्ध रचना दिव्यावदान (तीसरी शताब्दी) में पुष्यमित्र शुंग को बौद्धों का बहुत बड़ा उत्पीड़क बताया गया है: वह चार गुना सेना के साथ बौद्धों के विरुद्ध निकल पड़ता है, स्पूतों को नष्ट करता है, बौद्ध विहारों को जला देता है और शाकल (सियालकोट) तक भिक्षुओं की हत्या करता जाता है और जहां वह प्रत्येक श्रमण के सिर लिए एक सौ दीनार के इनाम की घोषणा करता है।” (दिव्यावदान, सं. ई. बी. कोवेल और आर.ए. मील, कैम्ब्रिज, 1886, पृ.433-34)

डी. एन. झा लिखते हैं कि बौद्ध एवं जैन संप्रदायों और ब्राह्मणवादियों के बीच शत्रुता मध्ययुग के आरंभ में तीखी होती जाती है। यह हमें धर्मशास्त्रीय वैमनस्व संबंधी पाठों तथा उन्हें मानने वालों के बीच उत्पीड़न से पता चलता है। कहा जाता है कि उद्योत्कर (सातवीं शताब्दी) ने बौद्ध तर्कशास्त्रियों नागार्जुन और दिगनाग के तर्कों का खंड़न किया था और उनके तर्कों को वाचस्पति मिश्र ने अधिक दृढ़ बनाया। सनातनी-ब्राह्मणवादी दार्शनिक कुमारिल भट्ट (आठवीं शताब्दी) ने सभी गैर-परंपरावादी आंदोलनों (खासकर बौद्ध और जैन) के दर्शनों को मानने से इंकार कर दिया। बौद्धों-जैनों के बारे में कुमारिल कहता है कि “वे उन अकृतज्ञ और अलग हो गए बच्चों के समान हैं जो अपने अभिवावकों द्वारा की गई भलाई स्वीकार करने से इंकार करते हैं, क्योंकि वे वेद-विरोधी प्रचार के लिए ‘अहिंसा’ के विचार का प्रयोग एक औजार के रूप में करते हैं। बुद्ध के संदर्भ में शंकर (आदि शंकराचार्य) कहते हैं कि “वे (बुद्ध) असंबद्ध प्रलाप (असंबद्ध-प्रलापित्वा) करते हैं, यहां तक कि वे जानबूझकर और घृणापूर्वक मानवता को विचारों की गड़बड़ी की ओर ले जाते हैं।”

सोलहवीं बंगाल के भगवद्गीता के टिप्पणीकार मधुसूदन सरस्वती यहां तक कहते हैं कि भौतिकवादियों, बौद्धों तथा अन्य के विचार म्लेच्छों के विचारों के समान हैं। ब्राह्मणवादी दार्शनिकों को अनुकरण करते हुए पुराण (सौर पुराण) यह मत प्रकट करता है कि “चार्वाकों, बौद्धों और जैनियों को साम्राज्य में रहने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।” ( सौर पुराण, 64.44, 38.54)

डी.एन. झा लिखते हैं कि बौद्धों और जैनियों के विरुद्ध शैव तथा वैष्णव अभियान सिर्फ जहरीले शब्दों तक सामित नहीं थे। उन्हें प्रथम सहस्राब्दी के मध्य से प्रताड़ित कि जाने लगा, जिसकी पुष्टि आरंभिक मध्ययुगीन स्रोतों से होती है। ह्यूआन सांग को उद्धृत करते हुए वे लिखते हैं कि “हर्षवर्धन के समकालीन गौड़ राजा शशांक ने बुद्ध की मूर्ति हटाई थी। यह भी बताते हैं कि शिवभक्त हूण शासक मिहिरकुल ने 1600 बौद्ध स्तूपों और मठों को नष्ट किया तथा हजारों बौद्ध भिक्षुओं तथा सामान्य जनों की हत्या की।” (सैमुअल बील, सी-यू: बुद्धिस्ट रेकॉर्डस ऑफ द वेस्टर्न वर्ल्ड, दिल्ली, 1969, पृ.171-72, उद्धृत डी. एन. झा) कश्मीर में बौद्धों के दमन का महत्वपूर्ण प्रमाण राजा क्षेमगुप्त ( 950-58) के शासन में मिलता है।

उन्होंने श्रीनगर में स्थित बौद्ध विहार जयेंन्द्र विहार नष्ट करके उसकी सामग्री का प्रयोग श्रेमगौरीश्वर के निर्माण के लिए किया। (राजतरंगिणी ऑफ कल्हण, 1.140-144,उद्धृत डी. एन. झा) “उत्तर प्रदेश के सुलतानपुर जिले में नष्ट किए गए सैंतालिस किलेबंद नगर के अवशेष मिले हैं, जो वास्तव में बौद्ध नगर थे और जिन्हें ब्राह्मणवादियों ने बौद्धवाद पर अपनी जीत की खुशी में आग लगाकर बर्बाद किया था।” (उद्धृत, डी. एन. झा, सोसायटी एंड कल्चर इन नादर्न इंडिया इन द टवेल्फ्थ सेंचुरी, इलाहाबाद, 1973, पृ.436)

बौद्धों के प्रति ब्राह्मणवादियों में किस कदर नफरत थी, इसका एक बड़ा उदाहरण देते हुए डी. एन. झा लिखते हैं कि दक्षिण भारत में मिलता है। तेरहवीं शताब्दी के एक अल्वार ग्रंथ के अनुसार वैष्णव कवि-संत तिरुमण्कई ने नागपट्टिनम में एक स्तूप से बुद्ध की एक बड़ी सोने की मूर्ति चुराई और उसे पिघलाकर एक अन्य मंदिर में प्रयुक्त किया, कहा गया कि वह मंदिर बनाने का आदेश स्वयं भगवान विष्णु ने उन्हें दिया था। (रिचर्ड एव. डेविस, लाइव्स ऑफ इमेजेज, प्रथम संस्करण, दिल्ली, 1999, पृ.83) डी. एन. झा प्रमाणों के साथ यह प्रस्तुत करते हैं कि ब्राह्मणवादियों ने बौद्धों से कहीं अधिक ज्यादा जैनियों का दमन किया है।

निष्कर्ष रूप में डी. एन. झा लिखते हैं कि ब्राह्मणवाद निहित रूप से असहिष्णु था…अक्सर ही हिंसा का रूप धारण करने वाली असहिष्णुता सैन्य-प्रशिक्षण प्राप्त ब्राह्मणों से काफी सहायता पाती रही होगी। इसलिए यह दावा (हिंदुओं का दावा) पचाना कठिन है कि हिंदूवाद तिरस्कार करने के बजाय समावेश करता है। यह भी मानना असंभव है कि हिंदूवाद के रूप में हिंदूवाद का सार ही सहिष्णुता है।

इसी तरह यह कहना कि इस्लाम ने ही इस देश में हिंसा लाई है, जिसे इसका पता नहीं ही नहीं था, ऐसा कहना प्रमाणों की उपेक्षा है। भारत में इस्लाम के आगमन काफी पहले सन्यासी-योद्धाओं और साधु फौजियों के दल बन चुके थे और वे आपस में खूब मारा-मारी करते थे। (डेविड एन. लोरेन्जेन, (वॉरियर एसोटिक्स इन इंडियन हिस्ट्री, जर्नल ऑफ द अमेरिकन सोसायटी, पृ.61-75, उद्धृत डी.एन. झा, पृ.42)

डी. एन. झा न साक्ष्य आधारित वस्तुगत लेखन करके भारतीय इतिहास के तमाम गुत्थियों को सुलझाया और हिंदुत्वादी इतिहाकारों द्वारा गढ़े गए तमाम झूठे मिथकों की पोल खोल दी है ।

03/01/2026
02/01/2026
27/07/2025

श्रमणों का वर्षावास शुरू होते ही वे एक स्थान पर ठहर जाते थे। वर्ष भर दूसरों के द्वार जाकर भोजन पानी माँगते और धम्म सिखाते थे। ये ज्ञान की होम डिलीवरी का सिस्टम था। लोग अपने द्वार पर ज्ञान का श्रवण करते थे। श्रवण करने वाले श्रावक कहलाते थे।

वर्षावास में श्रमण रुक जाते, अब श्रावकों को श्रमण के वचन श्रवण करने के लिए उनके रुकने के स्थान पर आना होता था। धम्म की होम डिलीवरी बंद होने पर लोगों को स्टोर में आकर ज्ञान लेना होता था। इस तरह श्रमणों के वचन श्रवण करने (सुनने) का मास श्रावण मास बन गया।

शेष वर्ष में श्रावकों के द्वार पर श्रमणों का भोजन पानी होता था। श्रावण मास में श्रावकों का दायित्व था कि वे श्रमणों के पास जाकर श्रवण करें और उनके लिये भोजन, वस्त्र और साफ़ पानी लेकर उन्हें अर्पित करें। याद रखिए, बारिश में साफ़ पानी सबसे ज़रूरी आहार होता है। जो श्रमण चल नहीं सकते उनके लिये श्रावकों को कई किलोमीटर चलना होता था।

इस तरह श्रावक, श्रावण मास में श्रमणों के वचन श्रवण करने हेतु भोजन वस्त्र और साफ़ पानी इत्यादि लेकर जाते थे।

ये परंपरा महायान के बाद वज्रयान के शिखर पर पहुँचते ही उत्तर भारत के गाँव-गाँव में स्थापित हो चुकी थी।

अब कावड़ यात्रा पर पुनर्विचार कीजिए।

- संजय श्रमण

बुद्धिज़्म में जाति/ आउटकास्ट्स/ नीच/ वृषल पर क्या विचार हैं?  ===================वसल सुत्त, जिसे "आउटकास्ट्स पर प्रवचन" ...
22/07/2025

बुद्धिज़्म में जाति/ आउटकास्ट्स/ नीच/ वृषल पर क्या विचार हैं?
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वसल सुत्त, जिसे "आउटकास्ट्स पर प्रवचन" भी कहा जाता है, बौद्ध धर्म में एक महत्वपूर्ण पाठ है जो जाति व्यवस्था और सामाजिक पदानुक्रम पर बुद्ध के विचारों को व्यक्त करता है।

यहाँ पालि ग्रंथ "वसल सुत्त" के पियदस्सी थेर द्वारा 1999 के पालि से अंग्रेजी अनुवाद का हिंदी अनुवाद दिया गया है| यह इस प्रकार है |

वसल सुत्त: (नीच व्यक्ति पर प्रवचन)
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मैंने यह धर्म सुना है:

एक समय भगवान् (बुद्ध) श्रावस्ती के निकट अनाथपिण्डिक के आराम जेतवन में निवास कर रहे थे। तब भगवान् ने प्रातःकाल वस्त्र धारण कर पात्र और दोहरे चीवर को लिया, और भिक्षा के लिए श्रावस्ती नगरी में प्रवेश किया। उस समय ब्राह्मण अग्गिकभारद्वाज के घर में अग्नि जल रही थी और हवन की तैयारी हो रही थी। भगवान् भिक्षाटन करते हुए ब्राह्मण के निवास स्थान पर पहुँचे। ब्राह्मण ने भगवान् को दूर से देखकर कहा: "वहीं ठहर जाओ, मुंडित सिर वाले! वहीं ठहर जाओ, दरिद्र संन्यासी! वहीं ठहर जाओ, नीच!" जब उसने ऐसा कहा, तो भगवान् ने ब्राह्मण से पूछा: "हे ब्राह्मण, क्या तुम जानते हो कि नीच व्यक्ति कौन है और नीच बनाने वाले कारण क्या हैं?" "नहीं, मान्य गौतम, मैं नहीं जानता कि नीच व्यक्ति कौन है और न ही नीच बनाने वाले कारण क्या हैं। यदि मान्य गौतम मुझे धर्म समझाएँ तो अच्छा हो, जिससे मैं जान सकूँ कि नीच व्यक्ति कौन है और नीच बनाने वाले कारण क्या हैं।"

"तो सुनो, ब्राह्मण, ध्यान दो—मैं कहूँगा।"
ब्राह्मण ने उत्तर दिया: "जी, भद्र!"

1. जो क्रोधी हो, द्वेष रखता हो, दूसरों का भला न बोलता हो (दूसरों के गुणों को दोष देता हो), मिथ्या दृष्टि वाला और कपटी हो—जानो वही नीच है।
2. जो इस संसार में जन्मे प्राणियों (एकज या द्विज) को मारता हो, जिसमें प्राणियों के प्रति करुणा न हो—जानो वही नीच है।
3. जो गाँवों-बस्तियों को लूटता और घेरता हो, उत्पीड़क के रूप में कुख्यात हो—जानो वही नीच है।
4. चाहे गाँव हो या वन, जो दूसरों की वस्तु चुराता हो, जो उसे न दी गई हो—जानो वही नीच है।
5. जो ऋण लेकर, माँगने पर भाग जाए और कहे: 'मैं तुम्हारा कर्जदार नहीं'—जानो वही नीच है।
6. जो लालच में राह चलते व्यक्ति को मारकर उसकी वस्तु छीन ले—जानो वही नीच है।
7. जो स्वार्थ, परार्थ या धन के लिए साक्षी के रूप में झूठ बोले—जानो वही नीच है।
8. जो बलपूर्वक या सहमति से मित्रों-संबंधियों की पत्नियों के साथ संबंध रखे—जानो वही नीच है।
9. जो धनी होकर भी बूढ़े माता-पिता का भरण न करे—जानो वही नीच है।
10. जो माता, पिता, भाई, बहन या सास-ससुर को कठोर वचनों से पीड़ित करे—जानो वही नीच है।
11. जो श्रेष्ठ बात पूछे जाने पर हानिकारक उत्तर दे और टालमटोल करे—जानो वही नीच है।
12. जो बुरा कर्म करके उसे छिपाना चाहे और गुप्त रूप से पाप करे—जानो वही नीच है।
13. जो दूसरे के घर भोजन करके, बदले में उस मेजबान को भोजन देकर सम्मानित न करे—जानो वही नीच है।
14. जो ब्राह्मण, तपस्वी या किसी भिखारी को झूठ से धोखा दे—जानो वही नीच है।
15. जो भोजनकाल में आए ब्राह्मण/तपस्वी को कठोर वचनों से क्रोधित करे और भिक्षा न दे—जानो वही नीच है।
16. जो अज्ञान से आच्छादित होकर कुछ पाने की आशा में कटु या झूठे वचन बोले—जानो वही नीच है।
17. जो अहंकार से ग्रस्त हो स्वयं को बढ़ा-चढ़ाकर और दूसरों को घटाकर बताए—जानो वही नीच है।
18. जो क्रोधी, कंजूस, नीच इच्छाओं वाला, स्वार्थी, कपटी, निर्लज्ज और (पाप में) निर्भय हो—जानो वही नीच है।
19. जो बुद्ध या उनके शिष्य (गृहस्थ या संन्यासी) की निंदा करे—जानो वही नीच है।
20. जो अर्हंत न होकर भी स्वयं को ऐसा बताए—वह सारे ब्रह्मांड में चोर और सबसे नीच नीच है।
21. जन्म से कोई नीच नहीं होता, जन्म से कोई ब्राह्मण नहीं होता। कर्म से नीच होता है, कर्म से ब्राह्मण होता है।
22. मैं जो उदाहरण देता हूँ, उससे जानो (कि जन्म से कोई नीच नहीं होता): एक नीच का पुत्र सोपक हुआ, जो मातंग के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
23. उस मातंग ने दुर्लभ महान यश प्राप्त किया। अनेक क्षत्रिय और ब्राह्मण उसकी सेवा में जाते थे।
24. वह (संन्यासी बनकर) विषय-वासनाओं का त्याग कर, दिव्य रथ (आर्य अष्टांगिक मार्ग) पर चलता हुआ ब्रह्मलोक पहुँचा।
25. उसका (नीच) जन्म ब्रह्मलोक की प्राप्ति में बाधक न बना। कुछ ब्राह्मण वेद-पारंगत गुरुओं के कुल में जन्मे हैं।
26. वे अक्सर बुरे कर्म करते देखे जाते हैं। इसी जीवन में निंदित होते हैं, अगले जन्म में दुर्गति पाते हैं। उच्च जन्म उन्हें दुखद गति या निंदा से नहीं बचाता।
27. जन्म/जाति से कोई नीच नहीं होता, जन्म/ जाति से कोई ब्राह्मण नहीं होता। कर्म से नीच होता है, कर्म से ब्राह्मण होता है।

जब भगवान् ने यह कहा, तो ब्राह्मण अग्गिकभारद्वाज ने कहा: "अद्भुत, भद्र गौतम! अद्भुत! जैसे कोई उलटी हुई वस्तु को सीधा करे, छिपी हुई को प्रकट करे, भटके हुए को मार्ग दिखाए, या अंधेरे में दीपक थामे ताकि आँखों वाले देख सकें—वैसे ही आपने धर्म को अनेक प्रकार से समझाया है। मैं भद्र गौतम, धर्म और संघ की शरण लेता हूँ। भद्र गौतम मुझे आज से जीवनपर्यंत शरणागत उपासक के रूप में स्वीकार करें।"
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वसल सुत्त का सार: इस सुत्त में संदर्भित कई नैतिक आधार वर्तमान सन्दर्भों में प्रोब्लेमाटिक हैं | इसके वाबजूद एक सरलीकृत सार ये हो सकता है|

जन्म से कोई नीच नहीं होता:
वसल सुत्त में स्पष्ट रूप से कहा कि कोई भी व्यक्ति जन्म से नीच नहीं होता है.

कर्मों से निर्धारित होती है स्थिति:
सुत्त ने जोर दिया कि किसी व्यक्ति की सामाजिक स्थिति उसके नैतिक कर्मों, कार्यों और चरित्र से निर्धारित होती है, न कि उसके जन्म के आधार पर.

नैतिक जीवन का मार्गदर्शन:
यह सुत्त नैतिक जीवन जीने और अच्छे कर्म करने के लिए एक मार्गदर्शक के रूप में कार्य करता है.

सभी के लिए समानता:
वसल सुत्त सभी मनुष्यों के लिए समानता और सम्मान की वकालत करता है, चाहे उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि कुछ भी हो.

जाति/ जन्म आधारित व्यवस्था का विरोध:
वसल सुत्त ने जाति व्यवस्था के खिलाफ मजबूत नैतिक एवं तार्किक विरोध को उजागर किया.

संक्षेप में, वसल सुत्त एक महत्वपूर्ण बौद्ध सुत्त है जो नैतिकता को धर्म का मूलभूत आधार मानता है अपितु जन्म और जाति आधारित धर्म की मान्यता के विरुद्ध अपने कारण प्रस्तुत करता है |

बाइनरी का स्थायीकरण: जन्म आधारित ऊंच नीच का विरोध करने के वाबजूद, ऊँच नीच की बाइनरी में बात रखने के कारण, अंतिम रूप से ऊँच नीच की बाइनरी को समर्थन ही मिलता है| यह एक फिसलपट्टी है |

Amit Kumar

डा अम्बेडकर ने अपनी पुस्तक "फिलॉसफी ऑफ हिंदुइज़्म" में लिखा है कि बौद्ध धम्म पहले एक धार्मिक क्रांति थी जो अंततः एक सामा...
23/06/2025

डा अम्बेडकर ने अपनी पुस्तक "फिलॉसफी ऑफ हिंदुइज़्म" में लिखा है कि बौद्ध धम्म पहले एक धार्मिक क्रांति थी जो अंततः एक सामाजिक-राजनीतिक क्रांति में बदल गई। वे बौद्ध धम्म को फ्रांस की क्रांति से कहीं बड़ी क्रांति मानते थे। यह पूछना स्वाभाविक हो जाता है कि बौद्ध धम्म एक धार्मिक क्रांति कैसे था और बौद्ध सिद्धांतों पर हमारे समाज को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता आज अधिक क्यों है।

डा अम्बेडकर के अनुसार, धर्म कोई निश्चित घटना नहीं है और इसका अर्थ समय-समय पर मानव सोच का उसके सामाजिक परिवेश के संबंध में होते विकास के आधार पर बदलता रहा है। अपने विकासवादी इतिहास के दौरान, धर्म के अर्थ में दो बड़े परिवर्तन हुए हैं - धर्म की योजना में ईश्वर और नैतिकता की अवधारणाओं का एकीकरण। इन परिवर्तनों के परिणामस्वरूप कट्टरतावाद उत्पन्न हुआ जो व्यक्तिगत और सामाजिक संबंधों दोनों में भावनात्मक निरर्थकता के रूप में प्रकट होता है।

मैं, धर्म की योजना में इश्वर और नैतिकता के इस समावेश को ब्रह्मांडीय-नैतिक भ्रष्टाचार का नाम देना चाहूंगी। तथागत बुद्ध पहले धर्मगुरु थे जिन्होंने एक वैचारिक क्रांति के माध्यम से धर्म के अर्थ को ईश्वर और नैतिकता की अवधारणाओं से मुक्त करके इस भ्रष्टाचार को संशोधित किया और मानव मन को अपनी शिक्षाओं का केंद्र बनाया।

डॉ. अम्बेडकर ने "बुद्ध और उनका धम्म" में प्रश्न उठाया कि जिस व्यक्ति में आंतरिक पवित्रता नहीं, वह समाज को क्या दे सकता है..? बुद्ध ने कहा कि दुनिया में दुःख की उपस्थिति की उत्पत्ति मानव मन में है जो अंततः वर्ग संघर्ष पैदा करने वाली गलत सामाजिक विचारधाराओं के रूप में प्रकट होता है। मनुष्य समाज में अपने और दूसरों के प्रति अपने गलत विचारों और कार्यों के कारण दुःख से पीड़ित होता है जो अनैतिक व्यक्तिगत अथवा सामाजिक संबंधों को जन्म देता है।

तथागत बुद्ध ने सभी मानव विचारों और कार्यों के निर्णायक कारक के रूप में एक सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापी ईश्वर से शक्ति छीनकर, वर्ग, जाति और लिंग के आधार पर नैतिकता के विभाजन से उत्पन्न होने वाले नैतिक संघर्षों को कम करने के लिए जीवन के सभी नैतिक मूल्यों को सार्वभौमिक और समान किया। उन्होंने मानव मन के पुनर्विन्यास को सामाजिक सुधार का स्रोत बनाया।

डॉ अंबेडकर ने "बुद्ध और उनका धम्म" के रूप में बौद्ध धम्म को पुनर्जीवित और पुनर्व्याख्या करके, धर्मशास्त्र को ब्रह्मांडीय-नैतिक भ्रष्टाचार से मुक्त किया, जो मानव मन और समाज को गुलाम बनाने के लिए किया गया अब तक का सबसे बड़ा भ्रष्टाचार है।

डॉ अमृतपाल कौर...✍️🙏🌷✍️

Dr Ambedkar in his book " Philosophy of Hinduism" writes that Buddhism was first a religious revolution which eventually turned into a Socio-Political revolution. He considered Buddhism as a far greater revolution than the French Revolution. It becomes natural to ask how was Buddhism a religious revolution and why the need to revive our society on Buddhist principles is even greater today.

According to Dr Ambedkar, Religion is not a fixed phenomenon and its meaning has varied from time to time in accordance with the development of human thinking in relation to his societal surroundings. During its evolutionary history, two drastic changes have occurred in the meaning of religion - the integration of concepts of God and Morality into the scheme of religion. These changes have resulted in fanaticism which manifests itself as sentimental nonsense both in personal as well as social relations.

I would name this incorporation of God and Morality into the scheme of religion as COSMO-MORAL CORRUPTION. Tathagat Buddha was the first religious teacher who, through an ideological revolution corrected this corruption by freeing the meaning of religion from the concepts of God and Morality and made human mind the epicentre of his teachings.

Dr Ambedkar in " Buddha and His Dhamma " questions what can a man who has no internal purity in him give to the society..? Buddha said that the presence of Dukkha in the world has its origin in the human mind which eventually manifests as wrong social ideologies creating class conflicts. A man suffers from Dukkha because of his wrong thoughts and actions towards himself and others in the society which leads to wrong inter personal as well as inter social relations.

Tathagata Buddha, by taking away the power from an omniscient, omnipotent and omnipresent God as the deciding factor of all human thoughts and actions, universalized and equalised all moral values of life in order to reduce moral conflicts arising out of division of morality based on class, caste and gender. He made the re-orientation of human mind the source of social reformation.

Dr Ambedkar by reviving and reinterpreting Buddhism in "The Buddha and His Dhamma", freed theology from COSMO-MORAL corruption, the biggest corruption ever done to enslave human mind and society.

Dr Amritpal Kaur...✍️🙏🌷✍️

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