04/12/2025
1- "जिहाद" आतंकवाद को नहीं बल्कि ज़ुल्म के खिलाफ़ यानी मज़लूम के हक़ में किए जाने वाले संघर्ष को कहते हैं।
2- ज़ुल्म ज़्यादती के खिलाफ़ किया जाने वाला संघर्ष यानी जिहाद मुसलमानों पर फ़र्ज़ यानी अनिवार्य है।
महमूद मदनी
महमूद मदनी की इस बात से मैं पूरी तरह सहमत हूं लेकिन कुछ बुनियादी सवाल मेरे ज़हन में हैं।
"जिहाद" ज़ुल्म के खिलाफ़ किया जाने वाला संघर्ष है या सिर्फ़ मुसलमानों पर होने वाले ज़ुल्म के खिलाफ़ संघर्ष ?
ज़ुल्म सिर्फ़ वही है जिससे मुसलमान पीड़ित हों? अन्य समुदायों पर होने वाला ज़ुल्म, ज़ुल्म नहीं कहलायेगा क्या?
अगर ज़ुल्म, ज़ुल्म है और ज़ालिम, ज़ालिम तो गैर मुस्लिमों पर मुस्लिम शासकों द्वारा किए जाने वाले ज़ुल्म के खिलाफ़ भी जिहाद क्यूं नहीं किया जाना चाहिए?
फलस्तीनी मुसलमानों के हक़ के लिए इजराइल के खिलाफ़ जिहाद (संघर्ष) बिल्कुल सही है तो पाकिस्तान बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों और कश्मीरी पंडितों पर होने वाले ज़ुल्म के खिलाफ़ जिहाद क्यूं नहीं?
दलितों पिछड़ों अति पिछड़ों के अधिकारों के लिए किसी आंबेडकर, महात्मा फुले, लालू,मुलायम,चरणसिंह, नीतीश कुमार, कांशीराम,मायावती, चंद्रशेखर , राहुल गांधी वगैरह वगैरह को ही क्यूं जिहाद करना पड़ता है?
इन गैर मुस्लिम पीड़ितों के अधिकारों के लिए, कोई मक्की, मदनी, बरेलवी, देवबंदी, महमूद, अरशद, तौसीफ़ आगे बढ़कर जिहाद का ऐलान क्यूं नहीं करता?
अन्नदाताओं की ज़मीन हड़पने के लिए बनाए गए काले क़ानून के खिलाफ़ संघर्ष करने वाले किसानों के साथ, महमूद मदनी मुसलमानो के साथ आगे क्यूं नहीं आए ? जबकि उन पर जिहाद फ़र्ज़ है।
मुसलमानों को समझना चाहिए कि उनके धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक नेतृत्व ने अगर ज़ुल्म के खिलाफ़ ईमानदारी के साथ जिहाद किया होता तो आज जिहाद शब्द को लेकर महमूद मदनी को सफ़ाई न देना पड़ती।
सच्चाई तो यह है कि इस देश में, ग़ैर मुस्लिम सामाजिक और राजनीतिक नेतृत्व ने मुसलमानों के अधिकारों के लिए बड़े पैमाने पर जिहाद किया और आज भी कर रहे हैं।
मेरी समझ के मुताबिक़ तो, ज़ुल्म के खिलाफ़ कभी कोई आवाज़ न उठाने वाले महमूद ओ अरशद मदनी जैसे लोगों ने स्टेब्लिशमेंट के इशारे पर बहुत सोची समझी रणनीति के तहत, जिहाद शब्द का इस्तेमाल कर एक ऐसी बहस छेड़ दी है जिससे ज़ालिमों को ही फायदा पहुंचेगा।,✍️sufi Shadab Saheb