31/05/2025
खंडवा की चीखें तुम्हें सुनाई दीं क्या?
एक आदिवासी महिला के साथ गैंगरेप हुआ।
उसके अंगों में लोहे की रॉड डाली गई।
उसकी आंतें बाहर निकाली गईं।
वो दर्द से तड़पती रही... मर गई।
लेकिन सरकार सो रही है।
नेता चुप हैं।
संविधान की बातें करने वाले मौन हैं।
आदिवासी हों या दलित – क्या हमारी ज़िंदगियों की कोई कीमत नहीं?
कितनी बहनों को कुर्बानी देनी होगी, ताकि एक सिस्टम जागे?
हम चुप रहे, तो अगली बारी हमारी है।
इंसाफ नहीं मिला, तो ये लोकतंत्र नहीं – यह जंगलराज है।