04/04/2021
“गधे की परछाई”
आज मैं आपको एक कहानी सुनाती हूँ। ये ऐथेंस की बहुत पुरानी एक घटना है जो बहुत छोटी-सी है पर बहुत गम्भीर बात कह जाती है। भारत में राजनीति की हालत देख कर मुझे यह निरंतर याद आती है। ऐथेंस में ही प्रजातंत्र की शुरुआत हुई थी, वो प्रजातंत्र आज के हमारे प्रजातंत्र से बहुत अलग था पर दोनो का लक्ष्य एक था - लोगों का शासन।
एक बार ऐथेंस की एक राजनीतिक सभा में एक बहुत बड़े राजनीतिक वक्ता डीमॉस्थनीज़ को बोलने से रोक दिया गया। तब उन्होंने वहाँ उपस्थित प्रजा से कहा कि उन्हें बस एक छोटी-सी कहानी सुनाने दें। तब प्रजा शांत हो गई। उन्होंने कहानी सुनाना प्रारम्भ किया:
“गर्मी का मौसम था। एक युवा ने एक गधे को यात्रा करने के लिए भाड़े पे लिया। गधे को हांकने वाला उन्हें गदहे की पीठ पर खुद के पीछे बिठा कर चल पड़ा। दोपहर की तपतपाती गर्मी में चलना बहुत मुश्किल हो गया और दूर-दूर तक कहीं पेड़ नहीं थे, बहुत गर्मी थी। यात्री और गधे का चालक दोनों बहुत परेशान हुए। दोनों ने सोचा कि क्यों न गधे के नीचे बैठकर धूप से बचा जाय। फिर क्या था! गधे की परछाई की छाँव में बैठने के लिए दोनों लड़ने लगे और धक्कम-मुक्का के साथ बहस शुरू हो गई:-
यात्री: मैं बैठूँगा, मेरा अधिकार है मैंने गधा भाड़े पर लिया है तो उसकी परछाई भी मेरी हुई।
चालक: अरे! ये मेरा गधा है, इस पर बस मेरा अधिकार है, तुम ग़ैर हो, किराया सिर्फ़ गधे पर बैठने के लिए है, गधे की परछाई मेरी है।”
इतनी कहानी कह कर वो महान वक्ता डीमॉस्थनीज़ चुप हो गए, पीछे मुड़े और प्रजा के बीच से जाने लगे। ऐथेंस की प्रजा ज़ोर-ज़ोर से उन्हें कहानी पूरा करने को कहने लगी, विनती करने लगी। खूब रोका - “कृपा करके कहानी पूरी करिए, ये क्या बात हुई? आप कहानी पूरी किये बग़ैर नहीं जा सकते।”
यह सुन कर डीमॉस्थनीज़ रूक गए, वापस आए और कहा:
“बिलकुल! आपको गधे और गधे की परछाई के बारे में सुनने में बड़ी दिलचस्पी है, लेकिन जब कोई आपसे गम्भीर मुद्दों पर बात करना चाहे तो आप उसे सुनना नहीं चाहते!”