06/06/2026
अन्धकार और मलिनता में पनपने वाले, छिपकर निकलने वाले तथा झुण्ड को शक्ति मानने वाले वितृष्णा के पर्याय, जब तथाकथित क्रान्ति के प्रतीक बनने लगें, तो यह समझना कठिन नहीं रह जाता कि क्रान्ति कितनी निर्विचार है।
पीडाएँ परिवर्तन नहीं लातीं, परिवर्तन लाती है जीवनी शक्ति, वह जीवनी शक्ति जो पवित्रता और प्रकाश में निहित है, कम से कम मनुष्य के लिये।
आन्दोलन के लिये असन्तोष ही काफी नहीं होता, उसको कोई आदर्श चाहिए। तिलचट्टे कौन सा आदर्श अपनायेंगे अभी यह साफ नहीं। वैसे आदर्श कहते हैं दर्पण को और दर्पण चमकता है प्रकाश में। किन्तु तिलचट्टे ? वे तो प्रकाश सह नहीं सकते, उसमें मरने लगते हैं। फिर इनके आन्दोलन का क्या होगा।
जो भी हो, मैं तो यह देख-देख कर चकित हूँ कि भारत की युवा चेतना को जिस अनर्गल कथन का स्वस्थ प्रतिवाद करना था उसको उसने अपना राजनैतिक प्रस्थान बनाने की चेष्टा प्रारम्भ की है। वह भी उनके बल पर, जिन्हें संसदीय भाषा में ‘विपक्ष’ न कहा जाये तो वे स्वयं भी नहीं जानते कि उनका पक्ष क्या है।
राष्ट्र-निर्माण के लिए नौकरी नामक स्वर्णिम अवसर के लिए लालायित ये भीड़ कितनी आन्दोलन-क्षम है और इसकी यात्रा कहाँ तक जाएगी यह लगभग स्पष्ट है। एक अँधेरे से दूसरे अँधेरे तक। तिलचट्टे इतना ही चलते हैं।
मैं स्मरण करता हूँ कि मित्रों के साथ क्रीडारत एक विपन्न मैथिल बालक से जब दरभंगा नरेश ने कहा कि अभी तुम बच्चे हो, तो उसने कहा कि महाराज मैं बच्चा हो सकता हूँ पर मेरी सरस्वती (वाणी) बच्ची नहीं है। अभी मैं पाँच वर्ष का पूरा नहीं हुआ पर त्रैलोक्य का वर्णन कर सकता हूँ-
बालोऽहं जगदानन्द नमे बाला सरस्वती।
अपूर्णे पञ्चमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम्॥
उस बच्चे ने राजा को जीत लिया। वह कथा अभी मिथिला में जीवित है।
रामायण में वाली ने श्रीराम को कहा कि तुमने मुझे छिपकर मारा इसलिये तुम अनैतिक हो। तो, श्रीराम ने वाली के एक-एक आक्षेप का उत्तर दिया। यह नहीं कहा कि ‘ अच्छा, हूँ तो हूँ।’ कहाँ है हमारी आत्मवत्ता जो किसी आरोप-अपमान को ओढ़कर विलाप करने के स्थान पर अपना पक्ष रख सके।
अस्मिता पर आये आक्षेप का चरित्रबल से जवाब देने वाली पीढ़ी ‘कॉकरोच’ बन रही है। उसे क्यों लगता है कि यह उसका प्रतीक हो सकता है। क्या यह प्रतिक्रिया है ? नहीं यह उसकी आत्महीनता का उद्घोष है।
इतिहास कहता है कि एक बार ऐसे ही तिरस्कार की चिकित्सा अंगदेश का मुकुट देकर की गयी थी। महाभारत हुआ और वह देवपुत्र अपने धँसे हुए रथ का पहिया नहीं निकाल पाया। मुकुट के छल से उस योद्धा का सिर खरीदने वाले न अपना मुकुट बचा सके और न सिर।
मैं कहता हूँ कि बन्धुओं, तिलचट्टे मत बनो।तिलचट्टे कोई क्रान्ति नहीं कर सकते। गरुड बनो यदि बन सको तो। अपने हिस्से का अमृत छीन लो, उसके लिए चाहे देवताओं से ही क्यों न लड़ना पड़े।
जो अँधेरे तुम्हें आश्रय दे रहे हैं वे एक जलते दिए का भी सामना नहीं कर सकते। यहाँ रोज़ सूर्य का सामना है।
भारत की युवा शक्ति आत्महीनता से उबर सके इसकी प्रभु से प्रार्थना।
लोग तिलचट्टे मारने से बचें, उन पर दया करें।
सेवाज्ञ संस्थानम्
Kailash Vijayvargiya Akash Vijayvargiya Rashtriya Swayamsevak Sangh (RSS) Vishva Hindu Parishad -VHP Bharatiya Janata Party (BJP) BJP4Indore BJP Madhya Pradesh
Vedant Shukla