09/06/2026
#अमरनाथ की अविस्मरणीय और रोचक यात्रा -( #महुआपार से जय बाबा बर्फानी तक)
#जय बाबा बर्फानी
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वर्ष 2005-2006 की बात है। जीवन के वे सुनहरे दिन थे जब मित्रता केवल परिचय का विषय नहीं, बल्कि आत्मीयता और विश्वास का दूसरा नाम हुआ करती थी। उन्हीं दिनों हम पांच मित्रों के साथ मैं #शैलेन्द्र शाही (पिंटू), #महेश शाही, #अग्नद शाही तथा #उमेश शुक्ला जी (शुक्लपूरी वाले ) —के साथ पवित्र अमरनाथ यात्रा पर जाने का विचार बना। हमारे एक प्रिय मित्र, जो इस यात्रा के सूत्रधार और वाहन स्वामी थे, भी इस यात्रा में साथ थे। आज वे इस संसार में नहीं हैं, परंतु उनकी सादगी, मित्रता और जीवन के प्रति उत्साह आज भी हमारी स्मृतियों में जीवित है।
यात्रा का आरंभ महुआपार से हुआ। मन में अपार उत्साह था और हृदय में केवल एक ही अभिलाषा—बाबा बर्फानी के दर्शन। घर से निकलते समय परिवारजनों का आशीर्वाद मिला और हम सभी मित्र एक नई आध्यात्मिक यात्रा की ओर बढ़ चले।
हमारा पहला पड़ाव लखनऊ था। वहाँ कुछ समय विश्राम और आगे की योजना बनाने के बाद हम उत्तराखंड के किच्छा के लिए रवाना हुए। किच्छा में उमेश शुक्ला जी के रिश्तेदार रहते थे। वहाँ पहुँचते ही जिस आत्मीयता और प्रेम से हमारा स्वागत हुआ, उसने हमें अभिभूत कर दिया। ऐसा लगा मानो हम किसी रिश्तेदार के घर नहीं, बल्कि अपने ही घर आए हों। दो दिनों तक हम वहीं रुके। परिवार के सभी सदस्यों ने हमें इतना स्नेह दिया कि वह अनुभव आज भी मन को भावुक कर देता है।
अक्सर लोग कहते हैं कि आज के समय में कोई किसी का नहीं होता, लेकिन मेरी समझ में यह पूरी तरह सत्य नहीं है। यदि हम लोगों को केवल स्वार्थ की दृष्टि से देखेंगे तो हर जगह स्वार्थ दिखाई देगा, किंतु यदि हम प्रेम और विश्वास के साथ संबंध बनाएँगे तो संसार में आज भी इंसानियत जीवित मिलेगी। किच्छा में मिला स्नेह इसी सत्य का प्रमाण था।
दो दिन बाद हम पंजाब की ओर बढ़े। रोपड़, हिमाचल प्रदेश और धर्मशाला , पठानकोट होते हुए हमारी यात्रा आगे बढ़ती रही। हम किसी जल्दी में नहीं थे। यात्रा का उद्देश्य केवल गंतव्य तक पहुँचना नहीं था, बल्कि रास्ते के प्रत्येक अनुभव को जीना भी था। पहाड़ों की हरियाली, घुमावदार सड़कें, ठंडी हवाएँ और मित्रों की हँसी-ठिठोली पूरे वातावरण को आनंदमय बना रही थीं।
जम्मू की सीमा में प्रवेश करते ही हमें एक विशाल लंगर दिखाई दिया। वहाँ यात्रियों के लिए भोजन, चिकित्सा, विश्राम और अन्य आवश्यक सुविधाओं की निःशुल्क व्यवस्था थी। सैकड़ो श्रद्धालु वहाँ सेवा कर रहे थे और हजारों यात्री उसका लाभ उठा रहे थे।
वहाँ बैठकर पहली बार धन के वास्तविक महत्व का गहरा अनुभव हुआ। संसार में बहुत लोग धन कमाने को ही जीवन का उद्देश्य समझते हैं, लेकिन धन की वास्तविक सार्थकता उसके सदुपयोग में है। अंततः मनुष्य इस संसार से खाली हाथ जाता है। यदि कुछ शेष रहता है तो वह है उसके द्वारा किए गए परोपकार और सेवा के कार्य। यही सच्ची कमाई है और यही धर्म का वास्तविक स्वरूप भी है।
जम्मू पहुँचने के बाद हम अखनूर गए, जहाँ उमेश शुक्ला जी के बहनोई भारतीय सेना में तैनात थे। सेना के आवास में हमारा अत्यंत सम्मानपूर्वक स्वागत हुआ। शुक्ला जी की बहन ने हमें अपने भाइयों की तरह अपनाया। उनकी सेवा-भावना देखकर हम सभी भावुक हो गए। ऐसा लगता था जैसे भगवान स्वयं विभिन्न रूपों में हमारी सहायता कर रहे हों। आज भी जब उस घटना को याद करता हूँ तो मन कृतज्ञता से भर जाता है।
अगले दिन हम श्रीनगर के लिए रवाना हुए। सुबह यात्रा आरंभ की और मार्ग में विश्राम तथा भोजन करते हुए शाम तक श्रीनगर पहुँच गए। कश्मीर की प्राकृतिक सुंदरता सचमुच धरती के स्वर्ग जैसी प्रतीत होती है। चारों ओर बर्फ से ढके पर्वत, हरे-भरे वृक्ष, बहती नदियाँ और ठंडी हवाएँ मन को मंत्रमुग्ध कर रही थीं।
शाम होते-होते हम रामगांव क्षेत्र पहुँचे। यहाँ भी यात्रियों के लिए विशाल लंगर और विश्राम की व्यवस्था थी। हर स्थान पर सेवा-भाव देखकर बार-बार यही विचार मन में आता था कि धर्म केवल पूजा-पाठ का नाम नहीं है, बल्कि निस्वार्थ सेवा ही उसका सर्वोच्च स्वरूप है।
अगली सुबह हम बालटाल के लिए रवाना हुए और लगभग तीन घंटे बाद वहाँ पहुँच गए। बालटाल वह स्थान है जहाँ से पवित्र अमरनाथ गुफा की पैदल यात्रा आरंभ होती है। चारों ओर श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ रहा था। कोई पैदल जा रहा था तो कोई घोड़े या पालकी की सहायता ले रहा था।
हमने भी आवश्यक सामान लिया और "हर-हर महादेव" तथा "बम-बम भोले" के जयघोष के साथ यात्रा प्रारंभ कर दी। लगभग पंद्रह किलोमीटर का यह मार्ग अत्यंत चुनौतीपूर्ण था। कहीं खड़ी चढ़ाई थी तो कहीं संकरे रास्ते। ऊँचाई बढ़ने के साथ ऑक्सीजन की मात्रा कम होती जाती थी, जिससे साँस लेने में कठिनाई महसूस होती थी। लेकिन श्रद्धा और विश्वास के सामने सभी कठिनाइयाँ छोटी लग रही थीं।
हजारों श्रद्धालु एक ही दिशा में बढ़ रहे थे। हर ओर शिव नाम का उद्घोष गूँज रहा था। ऐसा लग रहा था मानो सम्पूर्ण हिमालय शिवमय हो उठा हो। उस वातावरण में थकान का अनुभव भी भक्ति में परिवर्तित हो जाता था।
दोपहर लगभग तीन बजे हम पवित्र अमरनाथ गुफा तक पहुँच गए। जैसे ही पहली बार बर्फ से निर्मित प्राकृतिक शिवलिंग के दर्शन हुए, मन श्रद्धा से भर गया। उस क्षण को शब्दों में व्यक्त करना कठिन है। ऐसा लगा जैसे समय ठहर गया हो और सारी चिंताएँ समाप्त हो गई हों।
हिमालय की गोद में स्थित वह दिव्य गुफा, भीतर विराजमान बाबा बर्फानी और हजारों श्रद्धालुओं की आस्था—यह दृश्य किसी अलौकिक लोक का अनुभव करा रहा था। आँखें नम थीं और हृदय में अद्भुत शांति का अनुभव हो रहा था। वर्षों बाद भी वह दृश्य स्मृति में उतना ही ताज़ा है।
दर्शन और पूजन के पश्चात हमने गुफा के निकट एक टेंट में रात्रि विश्राम किया। वहाँ भी किसी दानी सज्जन द्वारा विशाल लंगर संचालित किया जा रहा था। प्रसाद ग्रहण करने के बाद हम विश्राम के लिए चले गए।
रात्रि का वह अनुभव आज भी अविस्मरणीय है। हिमालय की ऊँची चोटियों के बीच, तारों से भरे आकाश के नीचे, ठंडी हवाओं के बीच ऐसा अनुभव हो रहा था मानो स्वयं भगवान शिव के सान्निध्य में बैठे हों। जीवन में कुछ क्षण ऐसे होते हैं जो समय के साथ धूमिल नहीं होते, बल्कि और अधिक उज्ज्वल होते जाते हैं। वह रात उन्हीं में से एक थी।
अगली सुबह हम वापसी यात्रा पर निकल पड़े और दोपहर तक बालटाल पहुँच गए। वहाँ से आगे बढ़ते हुए शाम तक श्रीनगर लौट आए। सुरक्षा कारणों से हमने श्रीनगर में ही रात्रि विश्राम करने का निर्णय लिया।
श्रीनगर में रुकना और डल झील की सैर न करना संभव नहीं था। हम सभी मित्र एक शिकारे में बैठकर डल झील की सैर के लिए निकल पड़े। झील का शांत जल, उसमें प्रतिबिंबित पर्वतों की छाया और चारों ओर फैली प्राकृतिक सुंदरता मन को मोह रही थी।
शिकारा धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था और ऐसा लग रहा था मानो समय भी उसके साथ धीमी गति से चल रहा हो। उस क्षण का आनंद शब्दों में व्यक्त करना कठिन है। मेरा मानना है कि जीवन में एक बार प्रत्येक व्यक्ति को डल झील की सैर अवश्य करनी चाहिए।
अगले दिन हमारा अगला लक्ष्य माता वैष्णो देवी के दर्शन करना था। हम श्रीनगर से कटरा पहुँचे और यात्री निवास में रात्रि विश्राम किया। प्रातःकाल हम माता के जयकारों के साथ यात्रा मार्ग पर आगे बढ़े। श्रद्धालुओं की भीड़, भक्ति का वातावरण और पर्वतीय मार्ग की सुंदरता मन को उत्साहित कर रही थी।
दोपहर तक हम माता वैष्णो देवी के पवित्र भवन पहुँच गए। माता के दर्शन कर मन श्रद्धा और आनंद से भर गया। इसके बाद हम भैरव बाबा के मंदिर भी गए, क्योंकि मान्यता है कि भैरव बाबा के दर्शन के बिनायात्रा पूर्ण नहीं मानी जाती। वहाँ दर्शन कर हमें यात्रा की पूर्णता का अनुभव हुआ।
शाम तक हम पुनः कटरा लौट आए और अगले दिन वापसी यात्रा आरंभ की। मार्ग में हिमाचल प्रदेश के प्रसिद्ध शक्तिपीठों—ज्वाला देवी, चिंतपूर्णी देवी तथा अन्य प्रमुख मंदिरों के दर्शन का सौभाग्य भी प्राप्त हुआ।
इसके बाद हम अमृतसर होते हुए दिल्ली पहुँचे, जहाँ मेरे मुखर्जी नगर स्थित निवास पर रात्रि विश्राम किया। पूरे दिन विश्राम करने के बाद हम मथुरा-वृंदावन पहुँचे। वहाँ बाँके बिहारी जी के दर्शन किए और श्रीकृष्ण जन्मभूमि में पूजन-अर्चन का सौभाग्य प्राप्त किया। मथुरा में स्थानीय पुजारियों और परिचितों का जो स्नेह मिला, उसने यात्रा को और भी मधुर बना दिया।
इसके बाद हम मथुरा रिफाइनरी गए, जहाँ गाँव के परिचित लोगों से भेंट हुई। कुछ समय उनके साथ बिताने के बाद हम लखनऊ के लिए रवाना हुए। वहाँ भोजन और विश्राम करने के पश्चात मेरे सभी मित्र अपने गाँव महुआपार लौट गए और इस प्रकार हमारी लंबी तथा अविस्मरणीय यात्रा सम्पन्न हुई।
आज जब पीछे मुड़कर उस यात्रा को देखता हूँ तो लगता है कि वह केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं थी, बल्कि जीवन को समझने की यात्रा थी। उस समय शायद नियति हमें ऐसे अनुभव प्रदान करना चाहती थी, क्योंकि उसे ज्ञात था कि आने वाले वर्षों में जीवन जिम्मेदारियों, कर्म और पुरुषार्थ में इतना व्यस्त हो जाएगा कि ऐसे अवसर दुर्लभ हो जाएँगे। वास्तव में बाद के वर्षों में ऐसा ही हुआ।
मनुष्य का स्वभाव है कि वह 99 को 100 बनाने की दौड़ में लगा रहता है। लेकिन जीवन की सबसे मूल्यवान संपत्ति धन नहीं, बल्कि वे स्मृतियाँ होती हैं जो जीवनभर आनंद और प्रेरणा देती हैं। अमरनाथ यात्रा की यह स्मृति मेरे लिए ऐसी ही अमूल्य धरोहर है।
आज भी जब उन दिनों को याद करता हूँ तो मित्रों की हँसी, पहाड़ों की कठिन चढ़ाइयाँ, बाबा बर्फानी के दिव्य दर्शन, डल झील की सैर, माता वैष्णो देवी का आशीर्वाद और अनगिनत लोगों का निस्वार्थ प्रेम चलचित्र की भाँति आँखों के सामने घूम जाता है।
इस यात्रा ने मुझे यह भी सिखाया कि नियति और पुरुषार्थ वास्तव में एक-दूसरे के पूरक हैं। नियति अवसर प्रदान करती है और पुरुषार्थ उन अवसरों को सार्थक बनाता है। यदि उस समय हम यात्रा का साहस न करते तो जीवन के इतने सुंदर अनुभवों से वंचित रह जाते।
अंत में, मैं अपने सभी मित्रों से पुनः यही कहना चाहूँगा कि यदि अवसर मिले तो एक बार फिर ऐसी यात्रा का आयोजन अवश्य करें। कौन जाने, यह बाबा बर्फानी का पुनः बुलावा ही हो।
हर-हर महादेव
जय बाबा बर्फानी🙏