09/07/2026
सनातन धर्म में मृतक को स्नान — प्राचीन पोस्टमार्टम विज्ञान
सनातन धर्म में मृतक को स्नान कराने की सामाजिक एवं वैज्ञानिक पृष्ठभूमि तथा वर्तमान समय के अनुसार परिवर्तन की आवश्यकता
1: सामाजिक एवं वैज्ञानिक पृष्ठभूमि
i) मृतक को स्नान कराने का उद्देश्य यह है कि उसे सम्मान और आदर के साथ उसकी अंतिम यात्रा के लिए विदा किया जाए।
ii) स्वच्छता (शुद्धि) का ध्यान रखना ताकि कीटाणुओं आदि से परिवार और संबंधियों की सुरक्षा हो सके।
iii) इसका एक विशेष वैज्ञानिक उद्देश्य भी था। प्राचीन काल में कुछ जिम्मेदार और जानकार व्यक्ति स्नान के दौरान मृतक के शरीर का बारीकी से निरीक्षण करते थे। यह एक प्रकार का प्रारंभिक पोस्टमार्टम होता था, जिससे यह पता लगाया जा सके कि मृत्यु स्वाभाविक है या उसमें हिंसा, हत्या अथवा किसी षड्यंत्र का तत्व शामिल है। इस प्रकार यह सामाजिक बुराइयों की रोकथाम का भी एक माध्यम था।
2: वर्तमान में प्रचलित अनावश्यक रस्में और मृतक का अनादर
i) मृतक को मिट्टी (चाइना मिट्टी) से स्नान कराना शास्त्रों में कहीं भी वर्णित नहीं है। पहले के समय में साबुन और शैंपू उपलब्ध न होने के कारण मिट्टी का उपयोग किया जाता था।
ii) आज भी स्नान कराने के लिए वही पुरानी विधि अपनाई जाती है, जिसमें ईंटों के सहारे लकड़ी का तख्ता रखकर मृतक को उस पर लिटाया जाता है। इससे शरीर को अनावश्यक रूप से अधिक हिलाना-डुलाना पड़ता है।
iii) मृतक के शरीर के बाल संवारने तथा मिट्टी लगाने के लिए परिवार, रिश्तेदारों तथा छोटे-बड़े लोगों की भीड़ एकत्र हो जाती है, और यह माना जाता है कि इस कार्य में भाग लेना पुण्य है। जबकि इससे मृतक की गरिमा प्रभावित होती है। वास्तविक पुण्य मृतक का अंतिम दर्शन करना, अंतिम संस्कार में सम्मिलित होना तथा दिवंगत आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करना है।
3: वर्तमान समय में परिवर्तन की आवश्यकता
i) मृतक को स्नान कराने के लिए ऐसी कुर्सी की व्यवस्था की जाए जिसे पीछे की ओर झुकाया जा सके। पंचायत ऐसी दो-तीन कुर्सियाँ स्थायी रूप से उपलब्ध रख सकती है।
ii) स्नान के लिए साबुन और शैंपू का उपयोग किया जाए।
iii) मृतक को केवल तीन या चार वयस्क व्यक्ति बंद कमरे में स्नान कराएँ, बाल व्यवस्थित करें और कफ़न (काई) तैयार करें।
iv) धर्म के अनुसार गंगाजल, तुलसी के पत्ते और शालग्राम शिला का उपयोग किया जाए। इसी प्रकार जहाँ मृतक को रखा जाए वहाँ पवित्रता के लिए गाय के गोबर का लेप करने की परंपरा भी विद्यमान है।
नोट - यदि किसी निकट संबंधी के आने की प्रतीक्षा करनी हो, तो कफ़न दो से तीन घंटे पहले तैयार करके मृतक को घर के खुले आँगन में छायादार स्थान पर रखा जाए, ताकि स्त्री-पुरुष सभी अपने प्रियजन का शांतिपूर्वक अंतिम दर्शन कर सकें। धर्म के अनुसार मृतक को एक निश्चित दिशा में सिर और पैर रखकर लिटाने की परंपरा का भी पालन किया जाए। निर्धारित समय पर मृतक को अंतिम यात्रा के लिए श्मशान घाट तक पहुँचाने हेतु एम्बुलेंस या शव वाहन का उपयोग किया जाए। निस्संदेह कंधा देना पुण्य का कार्य है, किंतु श्मशान घाट में मृतक का अंतिम दर्शन करना, अंतिम संस्कार में सम्मिलित होना, भगवान से दिवंगत आत्मा की मुक्ति और शांति के लिए प्रार्थना करना तथा शोकाकुल परिवार के दुःख में सहभागी होना भी उतना ही बड़ा पुण्य है।
Moolchand Malhi