20/06/2017
Lalit Bisht
पलायन एक चिंतन
पलायन पर परेशान देहरादून स्थित अपने मकान की छत पर शाम को ठंडी बियर और के एफ सी चिकन के तन्दरुस्त लेग पीस के साथ पलायन पर फेसबुक में अपने क्रांतिकारी विचार लिखते हुए सरकारों को दोष दे रहा था कि अचानक ग्रुप में एक मैसेज पढ़कर चौंक गया , लिखा था पहाड़ी गाँवों में जमीन चाहिए , और कीमत देहरादून के बरोबर , नीचे नम्बर लिखा था !! तुरन्त नम्बर पर सम्पर्क किया तो अगले दिन मिलने जा पहुंचा , एक सरदार जी थे !! पंकु उनको अपने गाँव ले गया और जमीन दिखाई ,सौदा तय हो गया , butola ji को दस लाख मिल गए !! पूछे बिना भी न रह पाया कि सरदार जी पहाड़ों से सारे लोग छोड़कर जा रहे हैं और आप इतनी महंगी जमीन ले रे हो ?? सरदार भी उख्खड़ दिमागी था , कहन लगा ..तू आम खा ...पेड़ रहने दे !!!!
इस बात को दो तीन साल गुजर गए !! Butola ji सरदार को बेची अपनी जमीन देखने गया तो वहां शानादार कॉटेज बने थे ,जहां अंग्रेज बाँझ के पेड़ों पर गोवा जैसे झूले लटकाकर आराम फरमा रहे थे , कॉटेज में पहुँचा वहाँ स्टे का भाड़ा पूछा तो पता चला , कोदे की रोटी ,झंगोरे की खीर और हिमालयन बकरी की कचमोली के साथ अंगलजोत कुल मिलाकर सात हजार हर रात का किराया था !!! पंकु के बच्चे भी अब बड़े हो गए थे जो अभी दिल्ली में थे !!! Butola jiकी देहरादून वाली छत के आस पास अब ऊँची छते थी , खुद की छत उसकी कुंवें की सी मांद थी , दिनभर कमरा और टीवी तक सीमित था , गाँव की बड़ी याद आती थी , वो खुलापन , वो हरियाली , वो सकूँ ?? पर अब पंकु की जड़ें गाँव से उखड़ चुकी थी , दुबारा उन जड़ों को रोपना असम्भव था , क्योंकि अब उन जड़ों का गांव की जमीन में अस्तित्व खत्म
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