ब्राह्मण समाज

ब्राह्मण समाज सभी ब्राह्मण भाई अपने बच्चो को ब्राह्?

11/07/2024
10/10/2020

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*ब्राह्मण से ही पूजा-पाठ क्यों कराएं ?*

उत्तर:- यम-नियम में आबद्ध ब्राह्मण- वर्ग अपनी निरंतर उपासना व त्यागवृत्ति, सात्त्विकता एवं उदारता के कारण ईश्वरतत्त्व के सर्वाधिक निकट रहते हैं। फिर धर्मशास्त्र, कर्मकांड के ज्ञाता एवं अधिकारी विद्वान होने के कारण परंपरागत मान्यता अनुसार पूजा-पाठ करने का अधिकार उन्हें ही है।

ब्राह्मण को देवता क्यों कहा गया ?

उत्तर:- दैवाधीनं जगत्सर्वं, मंत्राधीनं देवता।
ते मंत्रा विप्रं जानंति, तस्मात् ब्राह्मणदेवताः।।

यह सारा संसार विविध देवों के अधीन है। देवता मंत्रमि अधीन हैं। उन मंत्रों के प्रयोग-उच्चारण व रहस्य को विप्र भली-भांति जानते हैं इसलिये ब्राह्मण स्वयं देवता तुल्य होते हैं।

ब्राह्मणों को लोक-व्यवहार में अधिक सम्मान क्यों ?

उत्तर:- निरंतर प्रार्थना, धर्मानुष्ठान व धर्मोपदेश कर के जिस प्रकार मौलवी मस्जिद का प्रमुख, गिरजाघर में पादरी सर्वाधिक सम्मानित होता है, उनसे भी बढ़कर ब्राह्मण का सम्मान परंपरागत लोक-व्यवहार में सदा सर्वत्र होता आया है।

यज्ञ की अग्नि में तिल-जव,इत्यादि खाद्य पदार्थ क्यों ?

उत्तर:- आज के प्रत्यक्षवादी युग के व्यक्ति हवन में घी-तिल-जव आदि की आहुतियों को अग्नि में व्यर्थ फूंक देने की जंगली प्रथा ही समझते हैं।

प्रत्यक्षवादियों की धारणा वैसी ही भ्रमपूर्ण है जैसी कि किसान को कीमती अन्न खेत की मिट्टी में डालते हुये देखकर किसी कृषि विज्ञान से अपरिचित व्यक्ति की हो सकती है।

प्रत्यक्षवादी को किसान की चेष्टा भले ही मूर्खता पूर्ण लगती हो पर बुद्धिमान कृषक को विश्वास है, कि खेत की मिट्टी में विधिपूर्वक मिलाया हुआ उसका प्रत्येक अन्नकण शतसहस्र-गुणित होकर उसे पुनः प्राप्त होगा।

यही बात यज्ञ के संबंध में समझनी चाहिये। जिस प्रकार मिट्टी में मिला अन्न-कण शत सहस्र गुणित हो जाता है, उसी प्रकार अग्नि से मिला पदार्थ लक्ष-गुणित हो जाता है। किसान का यज्ञ पार्थिव और हमारा यज्ञ तैजस्।

कृषि दोनों है एक आधिभौतिक तो दूसरी आधिदैविक। एक का फल है- स्वल्पकालीन अनाजों के ढेर से तृप्ति तो दूसरे का फल देवताओं के प्रसाद से अनन्तकालीन तृप्ति।

यज्ञ में ‘द्रव्य’ को विधिवत अग्नि में होम कर उसे सूक्ष्म रूप में परिणित किया जाता है। अग्नि में डाली हुई वस्तु का स्थूलांश भस्म रूप में पृथ्वी पर रह जाता है।

स्थूल सूक्ष्म उभय-मिश्रित भाग धूम्र बनकर अंतरिक्ष में व्याप्त हो जाता है, जो अंततोगत्वा मेघरूप’ में परिणित होकर द्यूलोकस्थ देवगण को परितृप्त करता है।

‘स्थूल-सूक्ष्मवाद’ सिद्धांत के अनुसार प्रत्येक अंश अबाध गति से अपने अंशी तक पहुंचकर ही रहता है। जल कहीं भी हो, उसका प्रवाह आखिरकार अपने उद्गम स्थल समुद्र में पहंचे बिना दम नहीं लेता।

यह वैज्ञानिक सूत्र स्वतः ही प्रमाणित करता है कि अग्नि में फूंके गये पदार्थ की सत्ता समाप्त नहीं होती।

मनुस्मृति, अध्याय 3/76 में भी एक महत्वपूर्ण सूत्र है।

*‘अग्नौ प्रास्ताहुतिः सम्यग् आदित्यं उपष्ठिते’*

अग्नि में विधिवत डाली हुई आहुति, सूर्य में उपस्थित होती है।

श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 3, श्लोक 14-15 में भगवान श्रीकृष्ण सृष्टि चक्र व यज्ञ के बारे में कहते हैं- संसार के संपूर्ण प्राणी अन्न (खाद्य पदार्थ) से उत्पन्न होते हैं।

अग्नि की उत्पत्ति वृष्टि से होती है और वृष्टि यज्ञ से होती है और यज्ञ (वेद) विहित कार्यों से उत्पन्न होने वाला है।

*उत्तम ब्राम्हण की महिमा-*

*ऊँ जन्मना ब्राम्हणो, ज्ञेय:संस्कारैर्द्विज उच्चते।*
*विद्यया याति विप्रत्वं,*
*त्रिभि:श्रोत्रिय लक्षणम्।।*

ब्राम्हण के बालक को जन्म से ही ब्राम्हण समझना चाहिए। संस्कारों से “द्विज” संज्ञा होती है तथा विद्याध्ययन से “विप्र” नाम धारण करता है।

जो वेद,मन्त्र तथा पुराणों से शुद्ध होकर तीर्थस्नानादि के कारण और भी पवित्र हो गया है, वह ब्राम्हण परम पूजनीय माना गया है।

*ऊँ पुराणकथको नित्यं,*
*धर्माख्यानस्य सन्तति:।*

*अस्यैव दर्शनान्नित्यं,*
*अश्वमेधादिजं फलम्।।*

जिसके हृदय में गुरु,देवता,माता-पिता और अतिथि के प्रति भक्ति है। जो दूसरों को भी भक्तिमार्ग पर अग्रसर करता है, जो सदा पुराणों की कथा करता और धर्म का प्रचार करता है ऐसे ब्राम्हण के दर्शन से ही अश्वमेध यज्ञों का फल प्राप्त होता है।

*पितामह भीष्म जी पुलस्त्य जी से पूछा– गुरुवर!मनुष्य को देवत्व, सुख, राज्य, धन, यश, विजय, भोग, आरोग्य, आयु, विद्या, लक्ष्मी, पुत्र, बन्धुवर्ग एवं सब प्रकार के मंगल की प्राप्ति कैसे हो सकती है? यह बताने की कृपा करें।

*पुलस्त्यजी ने कहा–राजन!इस पृथ्वी पर ब्राह्मण सदा ही विद्या आदि गुणों से युक्त और श्रीसम्पन्न होता है। तीनों लोकों और प्रत्येक युग में विप्रदेव (ब्राम्हण )नित्य पवित्र माने गये हैं।

यहाँ वरण हमारे प्राचीन साहित्य और वैदिक शास्त्रों के अनुसार हैं।

🚩 हरि ॐ 🚩
*जय भोलेनाथ*
~⌒*✰‿✰🙏⌒*✰‿✰~

SHRI SANJAY PANDEY

13/09/2020

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*पवित्र तुलसी*

प्राचीन काल से ही यह परंपरा चली आ रही है कि घर में तुलसी का पौधा होना चाहिए।

शास्त्रों में तुलसी को पूजनीय, पवित्र और देवी स्वरूप माना गया है, इस कारण घर में तुलसी हो तो कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए। यदि ये बातें ध्यान रखी जाती हैं तो सभी देवी-देवताओं की विशेष कृपा हमारे घर पर बनी रहती है।

घर में सकारात्मक और सुखद वातावरण बना रहता है, पैसों की कमी नहीं आती है और परिवार के सदस्यों को स्वास्थ्य लाभ प्राप्त होता है।

*यहां जानिए शास्त्रों के अनुसार बताई गई तुलसी के संबंध में 10 खास बातें…*

*1. इन दिनों में नहीं तोड़ना चाहिए तुलसी के पत्ते-*

शास्त्रों के अनुसार तुलसी के पत्ते कुछ खास दिनों में नहीं तोड़ने चाहिए। ये दिन हैं एकादशी, रविवार और सूर्य या चंद्र ग्रहण काल।

इन दिनों में और रात के समय तुलसी के पत्ते नहीं तोड़ने चाहिए। बिना उपयोग तुलसी के पत्ते कभी नहीं तोड़ने चाहिए।

ऐसा करने पर व्यक्ति को दोष लगता है। अनावश्यक रूप से तुलसी के पत्ते तोड़ना, तुलसी को नष्ट करने के समान माना गया है।

*2. रोज करें तुलसी का पूजन-*

हर रोज तुलसी पूजन करना चाहिए के साथ ही यहां बताई जा रही सभी बातों का भी ध्यान रखना चाहिए। साथ ही, हर शाम तुलसी के पास दीपक लगाना चाहिए।

ऐसी मान्यता है कि जो लोग शाम के समय तुलसी के पास दीपक लगाते हैं, उनके घर में महालक्ष्मी की कृपा सदैव बनी रहती है।

*3. तुलसी से दूर होते हैं वास्तु दोष-*

तुलसी घर-आंगन में होने से कई प्रकार के वास्तु दोष भी समाप्त हो जाते हैं और परिवार की आर्थिक स्थिति पर शुभ असर होता है।

*4. तुलसी का पौधा घर में हो तो नहीं लगती है बुरी नजर-*

ऐसी मान्यता है कि तुलसी का पौधा होने से घर वालों को बुरी नजर प्रभावित नहीं कर पाती है।

साथ ही, सभी प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा सक्रिय नहीं हो पाती है। सकारात्मक ऊर्जा को बल मिलता है।

*5. तुलसी का सूखा पौधा नहीं रखना चाहिए घर में-*

यदि घर में लगा हुआ तुलसी का पौधा सूख जाता है तो उसे किसी पवित्र नदी में या तालाब में या कुएं में प्रवाहित कर देना चाहिए। तुलसी का सूखा पौधा घर में रखना अशुभ माना जाता है।

*6. सूखा पौधा हटाने के बाद तुरंत लगा लेना चाहिए तुलसी का दूसरा पौधा-*

एक पौधा सूख जाने के बाद तुरंत ही दूसरा तुलसी का पौधा लगा लेना चाहिए। सूखा हुआ तुलसी का पौधा घर में होने से बरकत पर बुरा असर पड़ सकता है। इसी वजह से घर में हमेशा पूरी तरह स्वस्थ तुलसी का पौधा ही लगाया जाना चाहिए।

*7. तुलसी है औषधि भी-*

तुलसी का धार्मिक महत्व तो है, साथ ही आयुर्वेद में इसे संजीवनी बुटि के समान माना जाता है। तुलसी में कई ऐसे गुण होते हैं जो कई बीमारियों को दूर करने और उनकी रोकथाम करने में सहायक हैं।

तुलसी का पौधा घर में रहने से उसकी सुगंध वातावरण को पवित्र बनाती है और हवा में मौजूद बीमारी फैलाने वाले कई सूक्ष्म कीटाणुओं को नष्ट कर देती है।

*8. रोज तुलसी की एक पत्ती सेवन करने से मिलते हैं ये फायदे-*

तुलसी की सुंगध हमें श्वास संबंधी कई रोगों से बचाती है। साथ ही, तुलसी की एक पत्ती रोज सेवन करने से हम सामान्य बुखार से बचे रहते हैं। मौसम परिवर्तन के समय होने वाली स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों से बचाव हो सकता है।

तुलसी की पत्ती सेवन करने से हमारे शरीर की रोगप्रतिरोधक क्षमता काफी बढ़ जाती है, लेकिन हमें नियमित रूप से तुलसी की पत्ती का सेवन करते रहना चाहिए।

*9. तुलसी के पत्ते चबाना नहीं चाहिए-*

तुलसी के पत्तों का सेवन करते समय ध्यान रखना चाहिए कि इन पत्तों को चबाए नहीं बल्कि निगल लेना चाहिए। इस प्रकार तुलसी का सेवन करने से कई रोगों में लाभ प्राप्त होता है।

तुलसी के पत्तों में पारा धातु के तत्व भी विद्यमान होते हैं जो कि पत्तों को चबाने से दांतों पर लग जाते हैं। ये तत्व दांतों के लिए फायदेमंद नहीं है। अत: तुलसी के पत्तों को बिना चबाए निगलना चाहिए।

*10. शिवलिंग और गणेश पूजन में वर्जित है तुलसी के पत्ते-*

यूँ तो पूजन में तुलसी का विशेष महत्तव है पर शिव पूजन और गणेश पूजन में तुलसी का प्रयोग वर्जित है। इसके लिए पुराणो में दो कथा बताई गई है।

एक कथा के अनुसार भगवान शिव ने तुलसी के पति दैत्यों के राजा शंखचूड़ का वध किया था, जिसके फलस्वरूप न तो शिव पूजन में तुलसी काम में लेते है और नाहि शंख से शिवलिंग पर जल चढ़ाते है।

जबकि एक अन्य कथा के अनुसार एक बार गणेशजी ने तुलसी का विवाह प्रस्ताव यह कह कर अस्वीकार कर दिया की वो ब्रह्मचारी है जिससे रुष्ट होकर तुलसी ने उन्हें दो विवाह का श्राप दे दिया, प्रतिक्रिया स्वरुप गणेश जी ने तुलसी को एक राक्षस से विवाह का श्राप दे दिया। इसलिए गणेश पूजन में भी तुलसी का प्रयोग वर्जित है।

यहाँ वर्णित और दिए गए सभी विवरण हमारे प्राचीन साहित्य और वैदिक शास्त्रों के अनुसार हैं।

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SHRI SANJAY PANDEY

11/09/2020

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*संख्या 108 का रहस्य और महत्व*

हमारी मात्रिकाएँ (16 स्वर +38 व्यंजन = 54 ) नाभि से आरम्भ होकर ओष्टों तक आती है, इनका एक बार चढ़ाव, दूसरी बार उतार होता है, दोनों बार में वे 108 की संख्या बन जाती हैं।

इस प्रकार 108 मंत्र जप से नाभि चक्र से लेकर जिव्हाग्र तक की 108 सूक्ष्म तन्मात्राओं का प्रस्फुरण हो जाता है।

अधिक जितना हो सके उतना उत्तम है पर नित्य कम से कम 108 मंत्रों का जप तो करना ही चाहिए।

हरि ॐ

SHRI SANJAY PANDEY

10/09/2020

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*भारतीय भाषाओं की वर्णमाला में विज्ञान*

आज के विद्यार्थियों को भी नहीं पता होगा कि भारतीय भाषाओं की वर्णमाला विज्ञान से भरी है।

वर्णमाला का प्रत्येक अक्षर तार्किक है और सटीक गणना के साथ क्रमिक रूप से रखा गया है।

इस तरह का वैज्ञानिक दृष्टिकोण अन्य विदेशी भाषाओं की वर्णमाला में शामिल नहीं है।

जैसे देखो:

*क ख ग घ क*
- पाँच के इस समूह को *कंठवय* कहा जाता है क्योंकि यह उच्चारण करते समय कंठ से ध्वनि निकलती है।
उच्चारण का प्रयास करें।

*च छ ज झ ग*
- इन पाँचों को *तालव्य* कहा जाता है क्योंकि यह उच्चारण करते समय जीभ तालू महसूस करेगी।
उच्चारण का प्रयास करें।

*ट ठ ड ढ ण*
- इन पाँचों को *मुर्धन्य* कहा जाता है क्योंकि इस उच्चारण के दौरान जीभ रूखी महसूस होगी।
उच्चारण का प्रयास करें।

*त थ द ध न*
- पाँच के इस समूह को *दंतव्य* कहा जाता है क्योंकि यह उच्चारण करते समय जीभ दांतों को छूती है।
कोशिश करो।

*प फ ब भ म*
- पाँच के इस समूह को *औष्ठव्य* कहा जाता है क्योंकि दोनों होंठों का उच्चारण इसी से होता है।
कोशिश करो।

दुनिया की किसी भी अन्य भाषा में ऐसा वैज्ञानिक दृष्टिकोण है?

हमें अपनी भारतीय भाषा के लिए गर्व की आवश्यकता है लेकिन साथ ही साथ हमें यह भी बताना चाहिए कि दुनिया को क्यों और कैसे बताएं।

यहाँ वर्णित और दी गई सभी जानकारी और संबंधित संदर्भ हमारे प्राचीन साहित्य और वैदिक शास्त्रों के अनुसार हैं।

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SHRI SANJAY PANDEY

09/09/2020

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*पितृपक्ष अमावस्या पर कुछ सामान्य उपाय*

पितृपक्ष अमावस्या पर कुछ ऐसे सामान्य उपाय होते हैं, जिन्हें करने के बाद पितरों को तृप्त यानि संतुष्ट किया जा सकता है

1. पीपल के पेड़ के नीचे लगाए दीपक

पितृ मोक्ष अमावस्या के दिन सुबह जल्दी उठकर पितरों के निमित्त घर का बना मिष्ठान व शुद्ध जल की मटकी पीपल के पेड़ के नीचे अपने पितरों के निमित्त रखकर वहां दीपक जलाएं।

2. गाय को खिलाएं हरी पालक

पितृ मोक्ष अमावस्या के दिन दिन कुतप-काल के समय अपने पितरों के निमित्त गाय को हरी पालक खिलाएं। पितरों को संतुष्टी मिलेगी।

3. जरुर करें तर्पण

पितृ मोक्ष अमावस्या के दिन सुबह जल्दी उठकर तर्पण करें। तर्पण का पितृ पक्ष में बहुत अधिक महत्व माना जाता है।

4. आमान्य दान करें

पितृ मोक्ष अमावस्या पर दान करना बहुत अच्छा माना जाता है। इस दिन किसी भी मंदिर में या ब्राह्मण को आमान्य दान जरुर करें।

5. तेल का चौमुखा दीपक रखें

पितृ मोक्ष अमावस्या के दिन अपने पितरों के निमित्त तेल का चौमुखा दीपक रखें। सूर्यास्त के बाद घर की छत पर दिपक रखें और ध्यान रखें की आपका मुख दक्षिण दिशा में रखें।

यहाँ वर्णित और दिए गए सभी विवरण हमारे प्राचीन साहित्य और वैदिक शास्त्रों के अनुसार हैं।

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SHRI SANJAY PANDEY

08/09/2020

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*हिंदू विवाह में ३६ गुण क्या हैं*

यहां हिंदू विवाह की ३६ गुण की एक सूची दी गई है। अधिक जानने के लिए नीचे स्क्रॉल करें।

*१. नाडी (८ अंक)*

नाड़ी गण नक्षत्र पर आधारित है।
इसमें २१ नक्षत्र शामिल हैं जो ३ समूहों में विभाजित हैं, जैसे कि अंत्य, मध्य और अध्या।
नक्षत्र मिलान दंपति के बीच शारीरिक अनुकूलता और नए परिवार को शुरू करने की उनकी क्षमता को भी दर्शाता है।
ऐसा कहा जाता है कि एक ही नाडी के जोड़ों को अपनी शादी के दौरान गर्भधारण करने में समस्या आती है।

*२. भकूट (७ अंक)*

यह गुन युगल के बीच भावनात्मक अनुकूलता को दर्शाता है और यह उनके आरोही या लगन पर आधारित है।
इस गुना के ग्रह के संयोजन संवेदनशीलता को इंगित करते हैं कि साझेदार एक दूसरे की भावनाओं के प्रति होंगे।

*३. गण (६ अंक)*

हिंदू शास्त्र के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को 3 गणों में वर्गीकृत किया गया है जो देवता, राक्षस और मानव हैं।
व्यक्ति का स्वभाव उस गण को दर्शाता है जो वे संबंधित हैं।
उदाहरण के लिए, अंतर्मुखी और सरल जीवन जीने वाले विश्वासी देवता गण के हैं, जबकि आक्रामक मानसिकता के लोग राक्षस गण के हैं।
कुंडली मिलान ऑनलाइन के अनुसार, सबसे अच्छा मैच युगल के एक ही गण के बीच है।

*४. मैत्री (५ अंक)*

यह गुन राशी के रूप में जाना जाने वाले चन्द्र राशि की ग्रह अनुकूलता पर आधारित है।
यह गण अपने आपसी हितों, पसंद और नापसंद के आधार पर जोड़े के बीच साझा किए गए दोस्ताना बंधन को इंगित करता है।

*५. योनि (४ अंक)*

यह गुन नक्षत्र पर आधारित है।
यह नाडी युगल के बीच शारीरिक अनुकूलता को दर्शाता है लेकिन आकर्षण और संतोषजनक क्षमता के संदर्भ में।

*६. दीन या तारा (३ अंक)*

दीन गुन भी नक्षत्र पर आधारित है और यह युगल की लंबी उम्र और युगल के लिए विधवापन की संभावनाओं को इंगित करता है।

*७. वैश्य (२ अंक)*

गुन नक्षत्र पर आधारित है और युगल के बीच साझा किए गए पारस्परिक स्नेह और रोमांटिक बंधन को इंगित करता है।

*८. वर्ण (१ अंक)*

यह गुन व्यावसायिक प्रकृति और युगल के बीच संगतता मैच का संकेत है।

कुल अंक 36. 20 से ऊपर कुछ भी संगत माना जाता है। 28+ सहज और खुशहाल विवाह का संकेत देता है।

यह ध्यान रखना दिलचस्प है कि हमारे पूर्वजों द्वारा संतान, भावनात्मक संगतता, बुनियादी प्रकृति और रोमांटिक प्रेम की दोस्ती जैसे कारकों पर अधिक वेटेज दिया गया था।
यह भी ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि अंक विवाह की सफलता के लिए अनुकूल परिस्थितियों का संकेत देते हैं।
वास्तविक विवाह तभी सफल हो सकता है जब दोनों व्यक्ति सही प्रयास में हों और अपने वैवाहिक कर्तव्यों को अच्छी तरह से निभाएँ।

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