08/10/2026
एक विस्तारक प्रचारक का पत्र अपनी माँ के नाम
माँ, लगता होगा तुझको कि मैं तेरा निर्दयी बेटा हूँ,
जो तेरी चिंता नहीं करता,
तुझसे महीनों दूर रहता,
दिनों–दिनों तक तुझसे बात नहीं करता।
पर माँ, ऐसा नहीं है…
मन मेरा भी चाहता है
कि तेरे पास बैठूँ,
तेरे हाथ की रोटी-चटनी खाऊँ,
तेरी डाँट सुनूँ,
तेरे आँचल में सिर छिपाऊँ।
जब क्रोध आता है मुझ पर,
तब भी सबसे पहले तेरी याद आती है।
मन करता है बस पास बैठ जाऊँ,
तुझे निहारूँ,
बिन कुछ बोले सब कह दूँ।
लेकिन माँ,
कर्तव्य और प्रण मुझे हमेशा याद दिलाते हैं
कि मैंने जो मार्ग चुना है,
वह तेरा ही आशीर्वाद और संस्कार है।
तेरे सपनों को आचरण में उतारना ही
मेरे जीवन का ध्येय है।
जब-जब संघ-स्थान पर जाता हूँ,
तो लगता है जैसे तेरी ममता साथ चल रही है।
पत्रक और कार्ययोजना में
तेरा चेहरा मुझे स्मरण कराता है
कि योजना अवश्य सफल होगी।
भोजन के लिए जब परिवारों में जाता हूँ,
तो लगता है जैसे अपना ही परिवार मिल गया।
माँ, तेरा सपना छोटा घर है
और मैं आज विशाल भारत को अपना घर बना चुका हूँ।
जब शाखा में भगवा ध्वज लहराता है,
तो उसमें भी तेरे आशीष की झलक दिखती है।
तेरा सौम्य चेहरा मेरी थकान मिटा देता है,
मुझमें नई ऊर्जा भर देता है।
इसलिए माँ, तू चिंता मत कर
तेरे ही सपनों को साकार करने के लिए
मैं तन-मन-हृदय से संघकार्य में जुटा हूँ।
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