30/10/2022
केदार नाथ पाण्डेय : एक मुकम्मल कम्युनिस्ट चरित्र
अपने दिवंगत साथियों या नेताओं को याद करने की कुछ पारंपरिक रवायतें होती हैं जिनका अनुपालन अत्यंत सार्थक या आवश्यक माना जाता है। बिहार माध्यमिक शिक्षक संघ के अध्यक्ष, बिहार विधान परिषद सदस्य, सुप्रसिद्ध शिक्षाविद्, अनेक महत्वपूर्ण पुस्तकों के लेखक तथा वरिष्ठ कम्युनिस्ट का० केदार नाथ पाण्डेय को गुज़रे अभी कुछ रोज़ ही हुए हैं। राजनीति तथा शिक्षा जगत के अनेक महत्वपूर्ण लोगों ने उन्हें अपनी श्रद्धांजलि दी हैं। मैं भी अपने को रोक न सका। परंतु, जैसा कि शुरू में ही मैंने जिक्र किया है, उस अर्थ में श्रद्धांजलि व्यक्त करने में मैं अपने को पूरी तरह अक्षम पा रहा हूं।
मैंने जिस रूप में उन्हें याद करना तय किया है, वह बहुतों को भले अटपटा लगे परन्तु, बेमतलब कतई नहीं है!
उन दिनों का० केदार नाथ पाण्डेय बिहार माध्यमिक शिक्षक संघ के महासचिव हुआ करते थे और का० शत्रुघ्न प्र० सिंह अध्यक्ष। जेएनयू के मेरे एक प्रोफेसर मित्र को अपने पुत्र के विवाह विच्छेद संबंधी कानूनी निपटारे के लिए बार बार पटना आना पड़ता था। उन्होंने मुझसे आग्रह किया कि अगली बार वह पटना जंक्शन के निकट जमाल रोड स्थित माध्यमिक शिक्षक संघ भवन में रूकना चाहेंगे और उसके लिए जो भी निर्धारित शुल्क होगा, देंगे। कृपया आप यह व्यवस्था करा दीजिए। मेरे पूछने पर उन्होंने कारण बताया कि एक तो यह जगह स्टेशन से बिल्कुल निकट है। दूसरा, होटलों के मुकाबले यह अत्यंत किफायती और सुसज्जित भी है।
केदार बाबू मुझे अच्छी तरह जानते थे। मेरे पिता कवि कन्हैया से मिलने कई दफे घर भी आ चुके थे। इसलिए मेरे लिए यह काम बड़ा आसान लगा। पूरे विश्वास के साथ मैंने उन्हें जाकर जेएनयू मित्र की समस्या बता दीं। पर, मुझे बड़ा धक्का लगा जब उन्होंने साफ़ इंकार कर दिया। कारण बताया कि प्रोफेसर साहब के लिए मैं यहां क्यों ठहरने की इजाज़त दूं जबकि वह आर्थिक रूप से किसी भी होटल में ठहरने में सक्षम हैं! यह भवन एक बड़े आंदोलन और उसमें तत्कालीन फटेहाल तथा जुझारू स्कूली शिक्षकों द्वारा दी गयीं अनगिनत कुर्बानियों से खड़ा किया गया भवन है। इसलिए आर्थिक रूप से संपन्न लोगों को यहां महज़ ठहरने की इजाज़त देकर मैं एक ग़लत रूझान को प्रश्रय क्यों दूं!
केदार बाबू के इस दो टूक इंकार में भले ही एक बहुत बड़ा नैतिक मूल्य समाहित हुआ क्यों न दिखता हो, मगर जब आपके मन को भारी ठेस लगे तो नैतिकता वैक्तिकता सब भूलकर आपका तिलमिला उठना स्वाभाविक है! जवाब तो मैंने नहीं दिया लेकिन चेहरे पर एक तीखा तरेर देते हुए वहां से उठ कर चल दिया था!
इस घटना के कुछ समय बाद एक दिन स्टेशन के नजदीक अपने जीवन में अत्यंत फटेहाली तथा उपेक्षा का दंश झेल रहे अपने समय के एक समर्थवान कवि जगदीश 'विकल' जी से भेंट हो गयी। हालचाल पूछने पर उन्होंने बताया कि वे कुछ काम वाम की खोज में पटना आये हुए हैं और अभी शिक्षक संघ भवन में ठहरे हुए हैं। वे मुझे पकड़ कर संघ भवन ले गये। वहां जाकर उन्होंने जिस कमरे का ताला खोला, मैं देख कर दंग रह गया कि कमरा वातानुकूलित है। 'विकल' जी मेरी मनोभावना तत्काल भांप गये। उन्होंने विस्तार से बताया।
उन्हें काम वाम तो अभी कहीं मिला नहीं था, रहने की भी भारी दिक्कत हो रही थी। संघ की पत्रिका 'प्राच्य प्रभा' में उनकी कविताएं यदाकदा छपती थीं। इस नाते एक दिन वे औपचारिकतावश शिक्षक संघ भवन में केदार बाबू से मिलने चले गये। केदार बाबू भी उनके दुर्दिन से थोड़े बहुत परिचित थे। उन्होंने उनके पटना आने और ठहरने की जगह के बारे में पूछ लिया। 'विकल' जी ने उन्हें अपनी दुर्दशा का जो बयान किया तो केदार बाबू ने बिना कोई देर किये उन्हें अपना असबाब उठाकर संघ भवन में चले आने का आदेश दे दिया।
लेकिन कमाल देखिए कि केदार बाबू ने यहां भी अपनी नैतिकता को दांव पर लगने न दिया! वे भलीभांति जानते थे कि भवन के सबसे सस्ते दर पर मिलने वाले सिंगल बेड का किराया चुकाना भी 'विकल' जी के वश में नहीं है। हालांकि, केदार बाबू इतने सक्षम तो थे ही कि संघ की पत्रिका में छपने वाले एक लाचार रचनाकार को अपने आदेश से कुछ समय के लिए एक मुफ्त बेड दिलवा देते। लेकिन, उन्होंने अपने अधिकार को ताक पर रखकर उनके रहने की व्यवस्था महासचिव के तौर पर मिले खुद के कमरे में ही कर दीं। इतना ही नहीं, संघ भवन की कैंटीन में 'विकल' जी को मुफ़्त खाने की ग्लानि न झेलनी पड़े, उन्होंने संघ के प्रकाशनों में संभवतः संपादन/प्रूफ संशोधन का भी कुछ काम दिलवा दिया था! मैं गवाह हूं कि 'विकल' जी एक लंबी अवधि तक बड़े अभिमान से संघ भवन में टिके रहे थे।
का० केदार नाथ पाण्डेय की मृत्यु के उपरांत उन पर अपनी इस तथाकथित "श्रद्धांजलि" टिप्पणी का प्रारंभ यदि मैंने इन दो उदाहरणों के हवाले से ही किया है तो यह कोई ग़ैर वाजिब बात नहीं है! एक सामान्य शिक्षक से अपने जीवन का कार्यकलाप प्रारंभ करने से लेकर राज्य के एक सबसे सशक्त एवं व्यापक शिक्षक आंदोलन और राजधानी में निर्मित उसके शानदार/सुसज्जित प्रतिष्ठान अर्थात माध्यमिक शिक्षक संघ भवन के सर्वस्वीकार्य नायक के तौर पर उन्होंने कई दशकों तक अपनी महत्ता बनाये रखीं तो यह कोई उनके बाहुबली नेता होने के नाते नहीं था! जैसा कि आंदोलनों और संगठनों में प्रायः देखा जाता है कि वहां किसी नेता ने यदि एक सामान्य सीमा से अधिक दिनों तक अपनी पकड़ बनाये रखी तो अंततः बाहुबली नेता के रूप में उसका रूपांतरण तय माना जाता है। तो फिर यह सवाल उठना वाजिब तो है ही कि केदार बाबू ने यह कमाल किस 'बल' बूते संभव कर दिखाया?
यह ठीक वही सवाल या अवतरण है जिसकी ही एक वास्तविक पृष्ठभूमि तैयार करने की खातिर मैंने ऊपरलिखित दोनों उदाहरणों को साक्ष्य बनाकर बात शुरू की थीं। यह निःसंकोच कहा जा सकता है कि अपने अकाट्य नेतृत्व को दशकों तक बनाये रखने के लिए 'बल' के भरपूर इस्तेमाल में केदार बाबू भी पीछे नहीं थे! परंतु, जिस 'बल' का इस्तेमाल उन्होंने किया वह बाहुबल न होकर उनका वह अपार नैतिक बल था जो ऊपरलिखित दोनों उदाहरणों में भलीभांति परिलक्षित हुआ है।
जेएनयू के मेरे प्रोफेसर मित्र और कवि 'विकल' जी दोनों ही उसी कम्युनिस्ट पार्टी के जाने माने सदस्य थे जिस पार्टी के लिए का० केदार नाथ पाण्डेय ने अपना पूरा जीवन होम कर दिया था। लेकिन, जब बात आर्थिक हैसियत की आयी तो केदार बाबू ने दोनों को एक ही पलड़े पर तौलने का रत्ती भर भी विचलन अपने भीतर आने नहीं दिया। यह है कम्युनिस्ट नैतिकता! का० केदार नाथ पाण्डेय इसी कम्युनिस्ट नैतिकता के श्रेष्ठतम प्रतिमानों में से एक थे।
यह तो हुई शिक्षा और शिक्षक आंदोलनों/संघर्षों में शीर्ष योद्धा के रूप में केदार बाबू के नायकत्व और उनकी कार्यपद्धति में बरती जाने वाली नैतिकता की बात। परंतु, यदि उनके दीर्घ पार्टी जीवन और पार्टी के भीतर उनकी अनुशासित एवं प्रतिष्ठामूलक छवि पर भी बात न हो तो यह चर्चा अधूरी ही समझी जायेगी। वे पार्टी के महत्वपूर्ण राज्य कार्यकारणी के सदस्य हुआ करते थे। मगर, एक समय ऐसा भी आया जब उन्हें कार्यकारिणी ही नहीं, बल्कि राज्य परिषद में भी पूर्ण सदस्य की जगह नहीं दी गयीं। बिहार के एक सबसे बड़े शिक्षक आंदोलन के शीर्ष नेता की हैसियत के बावजूद उन्हें पार्टी पदावली में एकदम से महत्वहीन स्थिति में डाल देना कोई सामान्य बात नहीं थी। इस कार्रवाई से तिलमिला कर उन जैसा ताकतवर आदमी यदि पार्टी के प्रति गैरजवाब रवैया अख़्तियार कर भी लेता तो कोई अचरज की बात नहीं होती! मगर, अपने को एक सच्चे कम्युनिस्ट चरित्र में ढाल देने वाले यह का० केदार नाथ पाण्डेय की ही शख्सियत थी जो पार्टी के भीतर अपने को अपेक्षाकृत निम्नतम पोजिशन पर पहुंचाये जाने के बावजूद किसी भी तरह के विचलन का शिकार नहीं हुए।
का० केदार नाथ पाण्डेय को एक अनुशासित कम्युनिस्ट के नाते पार्टी के हर दायित्व को निभाने, पार्टी के हर आंदोलन तथा पार्टी कमिटियों की हर बैठक में अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराने में शायद ही कभी पीछे देखा गया हो। अपने अंतिम समय में भी जब वे विधान परिषद के निवेदन समिति के अध्यक्ष के नाते सरकार के कैबिनेट मंत्री की हैसियत पा चुके थे और दूसरी ओर शारीरिक रूप से अशक्त भी होने लगे थे तब भी केदार बाबू जनशक्ति के संपादकीय मंडल तथा दूसरी कमिटी की बैठकों में नियमित रूप से भाग लेते रहें थे।
मगर, मैं उनके अत्यंत उदात्त कम्युनिस्ट चरित्र के तौर पर आखिर आखिर तक बरते जाने वाले उनके जिस विलक्षण बरताव से चमत्कृत होता रहा उसका विशेष रूप से ज़िक्र न करूं तो सारी बातें फीकी रह जायेगीं! पार्टी के प्रत्येक सदस्यों को लेवी के रूप में अपनी आय का एक निश्चित हिस्सा अपनी सदस्यता के नवीकरण की खातिर नियमपूर्वक जमा कराना अनिवार्य होता है। इस नियम के तहत पार्टी के जनप्रतिनिधियों को एक अच्छी खासी रकम चुकानी पड़ती है। यह नियम जब तक संसदीय दुर्गुणों से मुक्त रहें, पार्टी के जनप्रतिधि बड़ी सहजता से पूरा करते रहें। मगर, बाद के दिनों में जब जनप्रतिनिधियों की सुविधाओं और आय में अकल्पनीय वृद्धि होने लगी तो कतिपय जनप्रतिनिधियों को पार्टी लेवी के रूप में एक भारी भरकम रकम जमा कराना अखरने लगा। एकाध जनप्रतिनिधि खास तौर से सदन से अवकाश ग्रहण करने वाले, समय पर अपनी पूरी लेवी जमा कराने में भारी आनाकानी करते देखे गये। वैसे सदस्यों को पार्टी से नोटिस देने की बात भी सुनी जाती रही। इसका इंतहा तो यह रहा कि अभी साल भर पहले पार्टी के तीन दफे चुने जाने वाले एक पूर्व विधायक ने जिनकी ख्याति लेखकों के सबसे बड़े संगठन के नेता के रूप में भी रही है, अपनी लेवी की रकम बचाने की खातिर पार्टी ही छोड़ दीं।
ऐसे में का० केदार नाथ पाण्डेय को न सिर्फ समय पर बल्कि पार्टी मुख्यालय में स्वयं उपस्थित होकर अपनी लेवी की एक काफी मोटी रकम को नियमपूर्वक जमा कराते देखना अत्यंत प्रेरक क्षण होता था। उस विषम परिस्थिति में भी जब सीढियां चढ़ना उनके लिए पहाड़ चढ़ने जैसा हो गया, उन्होंने इस नियमबद्धता में कोई व्यवधान नहीं आने दिया। वे पार्टी कार्यालय आकर और नीचे रिसेप्शन में ही बैठकर नवीकरण की पूरी प्रक्रिया संपन्न कराते।
और अंत में का० केदार नाथ पांडेय के विराट व्यक्तित्व के एक और उज्जवल पक्ष की एक झलक! वह है उनकी अध्ययनशीलता और किसी शोधार्थी की तरह किसी विषय की तह में जाने की उनकी ललक। एक बार उन्हें वियतनाम की यात्रा पर जाने का निमंत्रण मिला था। एक कुशल राजनीतिज्ञ की हैसियत से उन्हें स्वयं को देश विदेश की परिस्थितियों तथा देशों के इतिहास/भूगोल की जानकारी से अपने को भलीभांति लैश रखने की आवश्यकता रहती थी। इसलिए, उन्हें कई मायनों में एक निहायत ऐतिहासिक और समाजवादी देश वियतनाम की विस्तृत जानकारी न हो, यह सोचना ही भारी भूल होगी! लेकिन, उन्हें पता था कि बर्बर अमरीकी साम्राज्यवाद को लंबे युद्ध में धूल चटा कर वियतनाम को एक कम्युनिस्ट देश के रूप में स्थापित करने वाले चचा हो ची मिन्ह न सिर्फ एक महान कम्युनिस्ट योद्धा के रूप में बल्कि एक महान साहित्यकार के रूप में भी विश्वविख्यात हैं। इसलिए वियतनाम पहुंचने के पहले वे हो ची मिन्ह के साहित्यिक पक्ष के बारे में भी अच्छी जानकारी हासिल कर लेना चाहते थे। उन्हें कहीं से पता चला कि मेरे पिता कवि कन्हैया की कोई पुस्तक है जिसमें हो ची मिन्ह की साहित्यिक रचनाओं पर विशेष सामग्री है। उन्होंने मुझे फोन किया कि उन्हें कन्हैया जी की वह पुस्तक चाहिए। उन दिनों पटना में बाढ़ आयी हुई थी। बारिश भी लगातार हो रही थी। मैंने उन्हें बताया कि अभी घर से निकलना नामुमकिन है। बारिश थमने और बाढ़ के पानी के कम होने पर मैं पुस्तक लेकर आपके यहां हाज़िर हो जाऊंगा। लेकिन, मुझे हतप्रभ रह जाना पड़ा यह देखकर कि उस विषम परिस्थिति में केदार बाबू ठीक उसी दिन शाम को ठेंहुना भर पानी में कार को हेलाते हुए स्वयं मेरे घर के नीचे हाजिर हो गये। मैं संकोच से पानी पानी हो गया। कहा, "आप इस हालत में क्यों आ गये? मैंने तो कहा ही था कि पुस्तक पहुंचा दूंगा।" बड़े वात्सल्य भाव से उन्होंने उत्तर दिया, "इस खराब स्थिति में आप कैसे आ पाते! मेरे पास कार की सुविधा थी इसलिए मैं खुद लेने आ गया।" ऐसी थी केदार बाबू की अध्ययनशीलता और उस खातिर किसी भी खतरे को उठा कर किसी नयी सामग्री को पाने की उनकी बेचैनी!
भौतिक रूप से का० केदार नाथ पाण्डेय की उपस्थिति अब हमारे बीच नहीं रह गयी। लेकिन, हमारे इस भौतिक समाज को एक सुसंस्कृत और न्यायसंगत समाज में तब्दील करने के सतत् संघर्ष में उन्होंने अपना सर्वस्व होम कर दिया था, यह उद्दाम उदाहरण कई पीढ़ियों तक लोक गाथा की तरह अपना अस्तित्व बनाये रखेगा! इसी विश्वास और कामना के साथ का० केदार नाथ पाण्डेय को लाल सलाम।
-सुमन्त