06/08/2021
क्या कहूं कैसे कहूं निरुत्तर हूं मैं सिर्फ भगवान की तरफ देखता हूं हो सकता है तेरी रजा में कोई भेद छुपा हो पर आज तो नहीं समझ पा रहा हूं मेरे जिगर के टुकड़े को क्यों अपने पास बुला लिया हे प्रभु हे प्रभु हे प्रभु🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
मुझे इस शहर की तक़दीर पर अफ़सोस होता है, लेकिन मेरा ये पक्का यकीन है तन्मय रूहानियत में हमेशा हमारे साथ ही होंगे
मै जब पहली बार उनसे मिला तब से अब तक हम कभी एक पुलिस अफसर या पत्रकार की तरह मिले ही नहीं. हमेशा वो मुझे बड़े भाई ही लगे और मैने उन्हें कभी सीएसपी साहब नहीं कहा, हमेशा दादा ही बुलाया. जब भी साथ बैठे बेहद आत्मीयता का अनुभव हुआ ऐसा लगा जैसे कोई अपना करीब बैठा है. मिले तो पुलिस, कोर्ट,कचहरी की कोई बात नहीं हुयी. उन्हें हमेशा एक ज़िंदादिल इंसान पाया.
दादा को मैने कोरोना काल में बीस घंटे ड्यूटी करते देखा. खुद की जान की परवाह किये बगैर आम लोगो की ज़िन्दगी बचाते देखा. कोरोना की जब दूसरी लहर आयी तो उन्हें खुद कोरोना से लड़ते देखा और फिर स्वस्थ्य भी हुए. लेकिन जो वज्रपात उनपर हुआ एक पिता के कंधो पर जवान बेटे का जाना,उसका रत्ती भर अंदाज़ा हम नहीं लगा सकते.
यह घटना जब घटी मुझे पता चल गया. पहले भरोसा नही हुआ लेकिन जब खबर सही निकली तो कलेजा हिल गया.सोच सोचकर हैरान था की दादा दुःख के इस पहाड़ को कैसे उठाएंगे. तन्मय के लिए हमेशा सोचा करते थे. योजनाए बनाते थे, यह सोचते सोचते सोते थे इसका भविष्य कैसे बनाया जाए,तन्मय दादा की आस था, जीने का सहारा थे क्योकि दोनों बेटियाँ अपना कॅरियर बना चुकी थी. अब दादा को चिंता केवल तन्मय की थी.
लेकिन उन्हें क्या पता नियति को क्या मंज़ूर था. उन्हें भनक भी नहीं लगी की मौत दबे पाँव आँगन में आ चुकी है.और उनके लाडले को अपने आगोश मेँ ले लेगी. तन्मय बिस्तर पर लेटे थे दादा को आश्चर्य हुआ दिन मेँ क्यों सो रहे है, जब दादा ने उठाया और पूछा क्या हुआ तुम सो क्यों रहे हो बस उतने मेँ ही तन्मय ने आँखे फेर ली. और आँखे भी ऐसी फेरी की फिर नहीं उठे और अलविदा कह गए.
इस दिल हिलाने वाली घटना के बाद मेरी हिम्मत जवाब दे गयी में दादा से कैसे मिलु, मन ही मन उस मालिक से दुआ करता रहा ऐ खुदा तू दादा को हिम्मत देना. सोचा वो मालिक इतना निष्ठुर कैसे हो सकता है, कैसे एक प्यारे इंसान पर दुखो का पहाड़ तोड़ सकता है, जंहा दुनिया में करोडो लोग है एक तन्मय और जीयी जाता तो क्या पहाड़ टूट जाता. उसकी ज़ात से हम एहसान की उम्मीद करते है, फिर उसने ये क्यों किया. मै सोचता हु इस घटना ने जब मुझे इतना आहत किया तो फिर दादा के दिल पर क्या गुज़र रही होगी, उसका अंदाज़ा नकाफी है.
मुझे लिखते हुए ख्याल आया की इस्लाम की माने तो खुदा ने जब ज़मीन और आसमान बनाये तो इसका निज़ाम अपने चार सबसे करीबी फ़रिश्तो हज़रत जिब्राईल, हज़रत मीकाईल, हज़रत इसराफ़ील और हज़रत इज़राईल के जिम्मे किया.जिसमे फरिश्ते हज़रत इज़राईल को मलकुल्मौत बनाया, यानि मौत का फरिशता, जो मौत के समय इंसान की रूह कब्ज़ करेगा. किताबे बताती है की काम के इस बंटवारे के बाद हज़रत इज़राईल ने खुदा से कहा '''तेरा हुक्म सर आँखों पर, लेकिन जो ज़िम्मा मुझे सौंपा है इस काम को दुनिया अच्छी नज़रो से नहीं देखेगी''' इस पर खुदा ने कहा '''तुम इसकी फ़िक्र मत करो हर मौत एक कारण लिए हुए होगी, किसी का ख्याल तुम्हारी तरफ नहीं जाएगा. दुनिया कारणों के पीछे दौड़ेगी.'''और दुनिया बनने के बाद से आज तक हो भी यही रहा है.जब कोई दुनिया से जाता है तो हम कारणों पर जाते है, ये ख़याल कभी नहीं आता की उसने इतनी ही लिखी थी. लेकिन क्या यह बात हमारे दुःख को कम कर पाएगी.
बहुत कम लोग जानते है मेने भी अपने एक बेटे को खोया है, उन दिनों में जिस हालात से गुज़रा उसका बयान अलफ़ाज़ में मुमकिन नहीं. इसमें ज़्यादा मुश्किल घड़ी माँ की होती है, क्योकि माँ से बेटे की नज़दीकिया ज़्यादा होती है. तन्मय के असमय चले जाने से मम्मी के दिल का जो हाल हुआ होगा उसका अंदाज़ा दुनिया में शायद ही कोई लगा पाए.
सोचता हूँ कोई नीमच को अपना शहर माने, हमारी तकलीफो को जीये, और जब यहाँ से जाए तो खूबसूरत यादे लेकर जाए. लेकिन दादा जब भी जाएंगे इस शहर से एक ज़ख्म लेकर जाएंगे, जो शायद जीवन भर न भर सके. मुझे इस शहर की तक़दीर पर अफ़सोस होता है, आखिर ये हादसे हमारे सामने क्यों आते है, अगर खुदा करोडो लोगो के बीच एक तन्मय को बख्श देता तो क्या फर्क पड़ता, आसमान में क्या कमी हो जाती. आज पूरा शहर मातम में तो न डूबा होता, लेकिन ऐसा नहीं हुआ, उसकी मस्लेहत वही रब जानता है, मन को तस्सली देने के लिए सोचता हूँ शायद अच्छे लोगो की ज़रूरत उसको भी है इसीलिए उसने तन्मय को अपने पास बुला लिया, लेकिन मेरा ये पक्का यकीन है की शारीरिक तौर पर तन्मय भले हमारे साथ न हो लेकिन रूहानियत में वो हमेशा हमारे साथ ही होंगे, मालिक दादा को ये दुःख सहने की शक्ति दे, यही विनय,जय हिन्द !