10/05/2026
माँ इस संसार की वह अनमोल सत्ता है, जिसके स्नेह और त्याग पर मनुष्य का समूचा जीवन टिका रहता है। मनुष्य जब इस दुनिया में आँख खोलता है, तब सबसे पहले उसे माँ का ही चेहरा दिखाई देता है। वही उसे अपनी गोद में लेकर बोलना सिखाती है, चलना सिखाती है और धीरे-धीरे जीवन के कठोर मार्ग पर चलने योग्य बनाती है। संसार का कोई विद्यालय, कोई पुस्तक और कोई विद्वान वह शिक्षा नहीं दे सकता, जो एक साधारण माँ अपने मौन त्याग और व्यवहार से दे जाती है।
हमारे घरों की परम्पराएँ, कुल की मर्यादा, त्योहारों की रीति, बड़ों का सम्मान, छोटों पर स्नेह — यह सब पीढ़ी-दर-पीढ़ी माँ के माध्यम से ही चलता आया है। गाँव की वह अनपढ़ स्त्री भी, जिसने कभी किसी विद्यालय का मुख न देखा हो, जीवन का ऐसा ज्ञान रखती है, जो बड़े-बड़े पंडितों की पुस्तकों में भी नहीं मिलता। वह संध्या के समय चूल्हे पर रोटी सेंकते-सेंकते बच्चों को जो कथाएँ सुनाती है, उनमें केवल मनोरंजन नहीं होता, अपितु जीवन का गूढ़ सत्य छिपा रहता है।
माँ दो परिवारों की संस्कृति की सेतु होती है। वह जिस घर में जन्म लेती है, वहाँ की स्मृतियाँ और संस्कार अपने हृदय में संजोए रखती है और जिस घर में विवाह होकर आती है, वहाँ की भाषा, परम्पराएँ और रीति-नीति को भी पूरे मन से अपना लेती है। परंतु उसकी महानता इस बात में है कि वह इन दोनों संस्कृतियों में से जो श्रेष्ठ होता है, वही अपनी संतान को देती है। इस प्रकार माँ केवल परिवार नहीं सँभालती, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के चरित्र का निर्माण करती है।
मनुष्य की बोली में जो मिठास होती है, उसके व्यवहार में जो विनम्रता होती है, दूसरों के दुःख को समझने की जो शक्ति होती है — यह सब माँ के संस्कारों की देन है। पिता प्रायः जीवन के संघर्षों का मार्ग दिखाता है, पर जीवन को सहने की शक्ति माँ ही देती है। पिता अनुशासन सिखाता है, किंतु करुणा और धैर्य का पाठ माँ पढ़ाती है।
संतान चाहे कितनी ही बड़ी क्यों न हो जाए, संसार उसका कितना ही आदर क्यों न करे, पर माँ की आँखों में वह वही नन्हा बालक बना रहता है, जिसे कभी उसने अपनी गोद में सुलाया था। पुत्र वृद्ध हो सकता है, पर माँ का वात्सल्य कभी वृद्ध नहीं होता। उसके हृदय में संतान के लिए वही चिंता, वही ममता और वही प्रार्थना जीवन के अंतिम क्षण तक बनी रहती है।
आज संसार में मनुष्य ने बड़ी-बड़ी उन्नतियाँ कर ली हैं। ऊँची इमारतें खड़ी हो गई हैं, विज्ञान ने अद्भुत चमत्कार कर दिए हैं, परन्तु यदि मनुष्य के जीवन से माँ का स्नेह निकाल दिया जाए, तो यह सारी प्रगति व्यर्थ प्रतीत होगी। माँ घर की वह शीतल छाया है, जिसके रहते मनुष्य संसार के बड़े से बड़े दुःख को भी सह लेता है।
मातृ दिवस केवल एक उत्सव नहीं, अपितु उस त्याग, प्रेम और तपस्या के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का दिन है, जिसे माँ जीवन भर बिना किसी अपेक्षा के निभाती रहती है। संसार के सभी ऋण चुकाए जा सकते हैं, पर माँ के ऋण से मनुष्य जीवन भर उऋण नहीं हो सकता।
सच तो यह है कि “माँ” केवल एक संबंध नहीं, ईश्वर की सबसे सुंदर रचना है। उसकी महिमा का वर्णन शब्दों में करना उतना ही कठिन है, जितना मुट्ठी में आकाश को बाँध लेना।