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पर्यावरण: अस्तित्व और निरंतरता की रक्षा पर्यावरण संरक्षण, मानव जीवन के अस्तित्व तथा पृथ्वी पर जैविक निरंतरता के मध्य के ...
15/08/2026

पर्यावरण: अस्तित्व और निरंतरता की रक्षा

पर्यावरण संरक्षण, मानव जीवन के अस्तित्व तथा पृथ्वी पर जैविक निरंतरता के मध्य के अंतरसंबंधों का विश्लेषणात्मक अध्ययन प्रस्तुत करता है। औद्योगीकरण, अत्यधिक प्राकृतिक दोहन और अनियंत्रित शहरीकरण ने जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता के ह्रास और संसाधन संकट को जन्म दिया है।

अध्ययन दर्शाता है कि पर्यावरण मात्र एक बाहरी घटक नहीं, बल्कि जीवन चक्र की प्राथमिक इकाई है। सतत विकास (Sustainable Development) के सिद्धांतों के क्रियान्वयन और 'सप्तधारा' मॉडल में पर्यावरण के संतुलन की अनिवार्य आवश्यकता का मूल्यांकन किया गया है।

१. प्रस्तावना (Introduction)

मानव सभ्यता का इतिहास प्रकृति के साथ उसके संबंधों पर आधारित रहा है। आधुनिक युग में तकनीकी और आर्थिक प्रगति ने जीवन को सुगम बनाया है, लेकिन इसने प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) पर अत्यधिक दबाव भी डाला है। पर्यावरण संरक्षण अब केवल एक नैतिक दायित्व नहीं, बल्कि मानव जाति के अस्तित्व का प्रश्न बन चुका है।

मुख्य चुनौतियां एवं पर्यावरण क्षरण (Key Challenges)
पर्यावरण और मानव निरंतरता के समक्ष मुख्य संकट निम्नलिखित क्षेत्रों में केंद्रित हैं:

* जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग: वैश्विक तापमान में वृद्धि के कारण मौसम चक्र में अनिश्चितता, हिमनदों (Glaciers) का पिघलना और समुद्री जलस्तर में वृद्धि हो रही है।
* जैव विविधता का ह्रास (Loss of Biodiversity): वनों की कटाई और प्राकृतिक आवासों के विनाश से हजारों प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर हैं, जिससे खाद्य श्रृंखला (Food Chain) प्रभावित हो रही है।

* प्रदूषण का प्रसार: वायु, जल और मृदा प्रदूषण के कारण वैश्विक स्तर पर गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं (श्वसन रोग, कैंसर आदि) उत्पन्न हो रही हैं।

* संसाधनों का अतिदोहन: भूजल स्तर में गिरावट और जीवाश्म ईंधनों की सीमितता भावी पीढ़ियों के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लगाती है।

३. अस्तित्व और निरंतरता का वैज्ञानिक दृष्टिकोण
मानव जीवन के तीन प्रमुख आधार—शुद्ध वायु, स्वच्छ जल और उपजाऊ मृदा—प्रकृति द्वारा ही प्रदत्त हैं।
| प्राकृतिक घटक | मानव जीवन पर प्रभाव | अनियंत्रित दोहन का परिणाम |

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४. सतत विकास: समाधान का मार्ग (Sustainable Development)

पर्यावरण संरक्षण के बिना आर्थिक या व्यावसायिक विकास लंबे समय तक नहीं टिक सकता। इसके लिए निम्नलिखित रणनीतियों को अपनाना अनिवार्य है:

* नवीकरणीय ऊर्जा का अपनाव: सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और हरित हाइड्रोजन जैसे विकल्पों को प्राथमिक ऊर्जा स्रोत बनाना।

* सर्कुलर इकोनॉमी (Circular Economy): 'पुनर्चक्रण' (Recycle), 'पुनः उपयोग' (Reuse) और 'कमी' (Reduce) के सिद्धांत पर आधारित उत्पादन प्रणाली।

* हरित तकनीक (Green Technology): ऐसी तकनीकों का विकास जो न्यूनतम कार्बन उत्सर्जन करें।

* जन जागरूकता एवं जनभागीदारी: पर्यावरण संरक्षण को व्यक्तिगत और सामाजिक जीवनशैली का हिस्सा बनाना।
५. निष्कर्ष एवं सुझाव (Conclusion & Recommendations)

निष्कर्ष:
पर्यावरण विकास की सप्तधारा का वह आधार है जो शेष सभी धाराओं (शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, वाणिज्य, तकनीक और मनोरंजन) को संधारणीयता (Sustainability) प्रदान करता है। यदि विकास की प्रक्रिया में पर्यावरण की अनदेखी की जाती है, तो वह प्रगति अंततः विनाश में परिणत होगी।

सुझाव:

१. वैश्विक और राष्ट्रीय स्तर पर पर्यावरण नियमों का सख्ती से पालन कराया जाए।

२. प्राथमिक स्तर से ही पाठ्यक्रम में व्यावहारिक पर्यावरण शिक्षा को अनिवार्य किया जाए।

३. वृहत स्तर पर वृक्षारोपण एवं प्राकृतिक जल स्रोतों के संरक्षण को जन-आंदोलन का रूप दिया जाए।

वाणिज्य: आर्थिक समृद्धि का इंजन​वाणिज्य और व्यापार किसी भी देश की अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा हैं।​भूमिका: स्थानीय बाजारों ...
15/08/2026

वाणिज्य: आर्थिक समृद्धि का इंजन

​वाणिज्य और व्यापार किसी भी देश की अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा हैं।

​भूमिका: स्थानीय बाजारों से लेकर अंतरराष्ट्रीय व्यापार तक, वाणिज्य धन के प्रवाह को बनाए रखता है और बुनियादी ढांचे (Infrastructure) के निर्माण के लिए संसाधन जुटाता है।

​आवश्यकता: एक पारदर्शी, सुगम और समावेशी व्यावसायिक माहौल (Ease of Doing Business) छोटी-बड़ी सभी इकाइयों को फलने-फूलने का अवसर देता है, जिससे देश की आर्थिक स्थिति मजबूत होती है।

वाणिज्य: आर्थिक समृद्धि का इंजन (विस्तृत विश्लेषण)
वाणिज्य और व्यापार किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को गति देने वाली जीवनरेखा हैं। यह केवल वस्तुओं और सेवाओं का क्रय-विक्रय नहीं है, बल्कि देश के वित्तीय स्वास्थ्य, अवसंरचना और वैश्विक साख का निर्धारण करने वाला मुख्य स्तंभ है।

वाणिज्य की मुख्य भूमिका

* धन का निर्बाध प्रवाह: स्थानीय मंडियों से लेकर बहुराष्ट्रीय व्यापार तक, वाणिज्य बाजार में पूंजी और तरलता (Liquidity) को बनाए रखता है, जिससे आर्थिक गतिविधियां लगातार चलती रहती हैं।

* बुनियादी ढांचे का विकास: व्यापार से प्राप्त राजस्व और कर (Taxes) सरकार को सड़कें, बंदरगाह, रेलवे और ऊर्जा जैसे महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे (Infrastructure) के निर्माण के लिए वित्तीय संसाधन प्रदान करते हैं।

* वैश्विक जुड़ाव और विदेशी मुद्रा: अंतर्राष्ट्रीय वाणिज्य देश को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (Global Supply Chain) से जोड़ता है, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत होता है।
वर्तमान युग की आवश्यकताएं

आधुनिक और प्रतिस्पर्धात्मक वैश्विक बाजार में वाणिज्य को अधिक मजबूत और प्रभावी बनाने के लिए निम्नलिखित पहलुओं पर विशेष बल देने की आवश्यकता है:

* व्यापारिक सुगमता (Ease of Doing Business): पारदर्शी नीतियां, सरल कर प्रणाली (जैसे GST) और लालफीताशाही (Red Tapism) को खत्म करके ऐसा माहौल बनाना जहां छोटे से बड़ा व्यवसायी बिना बाधा के काम कर सके।

* एमएसएमई (MSME) और कुटीर उद्योगों को बढ़ावा: सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग वाणिज्य की वास्तविक रीढ़ हैं। इन्हें सस्ता ऋण, आधुनिक तकनीक और बाजार तक सीधी पहुंच देना अनिवार्य है।

* डिजिटल और ई-कॉमर्स क्रांति: छोटे विक्रेताओं को डिजिटल भुगतान, ऑनलाइन मार्केटप्लेस और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क से जोड़कर उनके बाजार का दायरा बढ़ाना।

निष्कर्ष:

वाणिज्य विकास की वह धारा है जो उत्पादन को उपभोग से और क्षमता को आय से जोड़ती है। जब व्यापार सुगम, समावेशी और नैतिक होगा, तभी देश की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी और नागरिकों के जीवन स्तर में गुणात्मक सुधार आएगा।

रोजगार: सम्मानजनक जीवन का आधार​शिक्षा और स्वास्थ्य का प्रत्यक्ष लाभ तब मिलता है जब नागरिक को अपनी आजीविका चलाने के सम्मा...
15/08/2026

रोजगार: सम्मानजनक जीवन का आधार

​शिक्षा और स्वास्थ्य का प्रत्यक्ष लाभ तब मिलता है जब नागरिक को अपनी आजीविका चलाने के सम्मानजनक अवसर प्राप्त हों।

​भूमिका: रोजगार केवल आय का साधन नहीं है; यह व्यक्ति को आत्म-सम्मान प्रदान करता है और देश की मानव पूंजी (Human Capital) का सही उपयोग सुनिश्चित करता है।
​आवश्यकता: आज के दौर में केवल सरकारी या पारंपरिक नौकरियों पर निर्भर न रहकर उद्यमिता (Entrepreneurship), स्वरोजगार और नए क्षेत्रों में अवसर पैदा करना अत्यंत आवश्यक है।

रोजगार: सम्मानजनक जीवन का आधार (विस्तृत विश्लेषण)
शिक्षा और स्वास्थ्य द्वारा अर्जित क्षमताओं की वास्तविक सार्थकता तब सिद्ध होती है, जब व्यक्ति को अपनी आजीविका चलाने और अपने कौशल का उपयोग करने के उचित एवं सम्मानजनक अवसर मिलते हैं। रोजगार केवल जीवनयापन के लिए धन अर्जित करने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह किसी भी राष्ट्र के आर्थिक और सामाजिक ढांचे का मजबूत आधार स्तंभ है।

रोजगार का व्यापक अर्थ और भूमिका

* आत्म-सम्मान और सामाजिक प्रतिष्ठा: रोजगार व्यक्ति में आत्मनिर्भरता, आत्मविश्वास और गरिमा का भाव जगाता है। जब कोई नागरिक अपनी मेहनत से आजीविका कमाता है, तो वह समाज पर बोझ बनने के बजाय गर्व के साथ राष्ट्र निर्माण में भागीदार बनता है।

* मानव पूंजी (Human Capital) का सही उपयोग:

देश के शिक्षित और अस्वस्थ (या स्वस्थ) कार्यबल की क्षमता का उपयोग यदि रोजगार के माध्यम से न हो, तो वह 'जनसांख्यिकीय लाभांश' (Demographic Dividend) आपदा में बदल सकता है। रोजगार मानव संसाधन को उत्पादक शक्ति में परिवर्तित करता है।

* गरीबी उन्मूलन और असमानता में कमी: न्यायसंगत रोजगार के अवसर समाज के आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को ऊपर उठाने और आय की असमानता को कम करने का सबसे प्रभावी साधन हैं।

आधुनिक दौर की चुनौतियां और आवश्यकताएं

आज की तेजी से बदलती अर्थव्यवस्था में केवल पारंपरिक या सरकारी नौकरियों के भरोसे बैठकर देश के विशाल कार्यबल को समाहित नहीं किया जा सकता। इसके लिए निम्नलिखित दूरदर्शी कदमों की आवश्यकता है:

* उद्यमिता (Entrepreneurship) और स्टार्ट-अप संस्कृति: युवाओं को केवल 'नौकरी मांगने वाला' बनाने के बजाय 'नौकरी देने वाला' (Job Creator) बनने के लिए प्रेरित और प्रोत्साहित करना। इसके लिए वित्तीय सहायता और सुगम नीतियां आवश्यक हैं।

* कौशल विकास (Skill Development) और पुनर्कौशल (Re-skilling): ऑटोमेशन, एआई (AI) और आधुनिक तकनीकों के आगमन से पुरानी नौकरियां समाप्त हो रही हैं और नए प्रकार के अवसर पैदा हो रहे हैं। उद्योग की जरूरतों के अनुसार युवाओं को लगातार नई स्किल्स सिखाना अनिवार्य है।

* असंगठित क्षेत्र को मजबूती: एमएसएमई (MSME), कृषि, हस्तशिल्प और गीग इकोनॉमी (Gig Economy) जैसे क्षेत्रों को संस्थागत सहयोग, बीमा और सुरक्षा प्रदान करना ताकि इनमें लगे लाखों लोगों का जीवन सुरक्षित हो सके।
* महिला श्रम शक्ति की भागीदारी: विकास तभी समावेशी होगा जब महिलाओं को कार्यस्थल पर सुरक्षित, समान और सम्मानजनक अवसर मिलेंगे।

निष्कर्ष:

रोजगार विकास की वह धारा है जो शिक्षा और स्वास्थ्य के निवेश को देश की समृद्धि में बदलती है। जब प्रत्येक सक्षम नागरिक को उसकी योग्यता के अनुसार सम्मानजनक रोजगार मिलेगा, तभी देश से गरीबी और बेरोजगारी जैसी कुरीतियां समाप्त होंगी और राष्ट्र वास्तविक अर्थों में आत्मनिर्भर बनेगा।

15/08/2026

स्वास्थ्य: जीवन की प्राथमिक पूंजी

​"पहला सुख निरोगी काया"

—यह पुरानी कहावत आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। एक बीमार और अस्वस्थ समाज कभी भी प्रगति के शिखर पर नहीं पहुंच सकता।

​भूमिका: स्वास्थ्य केवल बीमारियों की अनुपस्थिति नहीं है, बल्कि शारीरिक, मानसिक और सामाजिक कल्याण की स्थिति है।

​आवश्यकता: सुलभ, सस्ती और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं हर नागरिक का अधिकार होनी चाहिए। प्राथमिक चिकित्सा से लेकर मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता और खेल-कूद की संस्कृति को बढ़ावा देना राष्ट्र के विकास के लिए अनिवार्य है।

स्वास्थ्य: जीवन की प्राथमिक पूंजी (विस्तृत विश्लेषण)

"पहला सुख निरोगी काया" — यह उक्ति केवल एक कहावत नहीं, बल्कि मानव जीवन और सामाजिक प्रगति की सबसे बुनियादी शर्त है। स्वास्थ्य वह धुरी है जिसके इर्द-गिर्द मानव जीवन की सभी सफलताएं और राष्ट्र की उन्नति घूमती है। एक बीमार और शारीरिक या मानसिक रूप से कमजोर समाज कभी भी विकास के उच्च शिखरों को नहीं छू सकता।

स्वास्थ्य का व्यापक अर्थ

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार भी स्वास्थ्य का अर्थ केवल बीमारियों से मुक्त होना नहीं है। इसे तीन मुख्य आयामों में देखा जाना चाहिए:

* शारीरिक स्वास्थ्य (Physical Health): शरीर का रोगों से मुक्त होना, उच्च कार्यक्षमता और ऊर्जावान बने रहना।

* मानसिक स्वास्थ्य (Mental Health): आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में तनाव, चिंता और अवसाद से मुक्ति तथा भावनात्मक संतुलन अत्यंत आवश्यक है।

* सामाजिक कल्याण (Social Well-being): व्यक्ति का अपने समाज और पर्यावरण के साथ सकारात्मक व सौहार्दपूर्ण संबंध होना।

राष्ट्र निर्माण में स्वास्थ्य की भूमिका

* उत्पादकता में वृद्धि: स्वस्थ नागरिक अधिक कार्यकुशल होते हैं। वे श्रम शक्ति (Workforce) को मजबूती प्रदान करते हैं, जिससे देश की जीडीपी और आर्थिक गतिविधियों को गति मिलती है।

* आर्थिक बोझ में कमी: जब नागरिक स्वस्थ रहते हैं, तो परिवारों और सरकार का एक बड़ा हिस्सा इलाज पर खर्च होने से बच जाता है। इस बचत का उपयोग शिक्षा, बुनियादी ढांचे और नवाचार में किया जा सकता है।

* सकारात्मक सोच और खुशहाली:

एक स्वस्थ समाज में अपराध और निराशा का स्तर कम होता है, जबकि सहयोग, नवाचार और खुशहाली का स्तर ऊंचा होता है।

वर्तमान आवश्यकताएं और कदम
स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत बनाने और देश के प्रत्येक नागरिक तक इसकी पहुंच सुनिश्चित करने के लिए निम्नलिखित क्षेत्रों पर काम करना अनिवार्य है:

* सुलभ और सस्ती स्वास्थ्य सेवाएं: प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHCs) का जाल ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों तक फैलना चाहिए, ताकि हर गरीब से गरीब व्यक्ति को भी समय पर इलाज मिल सके।

* रोकथाम पर जोर (Preventive Healthcare): केवल बीमारी के इलाज पर ध्यान देने के बजाय स्वच्छता, शुद्ध पेयजल, पौष्टिक आहार और टीकाकरण जैसी निवारक स्वास्थ्य प्रणालियों को बढ़ावा देना।

* मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता: समाज में मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर बात करने की संस्कृति विकसित करना और परामर्श (Counseling) सुविधाओं को सुलभ बनाना।

* खेल-कूद और योग की संस्कृति: दिनचर्या में योग, व्यायाम और खेलों को शामिल करना, जिससे जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों (जैसे डायबिटीज, बीपी) से बचा जा सके।

निष्कर्ष:
स्वास्थ्य केवल एक व्यक्तिगत विषय नहीं है; यह एक संपूर्ण राष्ट्र की सामर्थ्य और भविष्य का प्रतिबिंब है। जब तक देश का प्रत्येक नागरिक शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ नहीं होगा, तब तक शिक्षा, तकनीक या वाणिज्य के क्षेत्र में किए गए प्रयास पूरे समर्थ के साथ फलदायी नहीं हो सकते। इसलिए, स्वास्थ्य की सुरक्षा और संवर्धन विकास की सप्तधारा का सबसे मजबूत स्तंभ है।

शिक्षा: विकास की नींव​शिक्षा विकास की आधारशिला है। यह केवल अक्षर ज्ञान या डिग्रियां हासिल करने तक सीमित नहीं है, बल्कि व...
15/08/2026

शिक्षा: विकास की नींव

​शिक्षा विकास की आधारशिला है। यह केवल अक्षर ज्ञान या डिग्रियां हासिल करने तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यक्ति के भीतर चेतना, तर्कशक्ति और संवेदनशीलता जगाने का माध्यम है।
​भूमिका: शिक्षा समाज को अज्ञानता और कुरीतियों से मुक्त कर नवाचार (Innovation) की दिशा में ले जाती है।

​आवश्यकता: आधुनिक युग में ऐसी शिक्षा प्रणाली की आवश्यकता है जो केवल रटने पर नहीं, बल्कि कौशल विकास, व्यावहारिक ज्ञान और नैतिक मूल्यों पर बल दे। जब देश का प्रत्येक नागरिक शिक्षित होगा, तभी वह विकास की अन्य धाराओं में योगदान दे सकेगा

शिक्षा: विकास की नींव (विस्तृत विश्लेषण)

शिक्षा केवल साक्षरता या डिग्रियां हासिल करने का साधन नहीं है, बल्कि यह मानव चेतना, बौद्धिक क्षमता और सामाजिक संवेदनशीलता को जगाने वाली मूल शक्ति है। किसी भी राष्ट्र के सतत और समावेशी विकास की शुरुआत उसकी शिक्षा प्रणाली की मजबूती से ही होती है।

शिक्षा की मुख्य भूमिकाएं

* कुरीतियों से मुक्ति: शिक्षा समाज को अज्ञानता, अंधविश्वास और रूढ़िवादिता के अंधकार से निकालकर वैज्ञानिक दृष्टिकोण और तार्किक सोच प्रदान करती है।

* नवाचार (Innovation) को बढ़ावा: यह युवाओं में जिज्ञासा और मौलिक सोच को विकसित करती है, जिससे नई तकनीकों और समाधानों की खोज संभव होती है।
* मानव पूंजी का निर्माण: शिक्षा नागरिक को कौशल प्रदान कर उसे देश की आर्थिक और सामाजिक प्रगति में योगदान देने योग्य बनाती है।

वर्तमान युग की आवश्यकता

आज की तेजी से बदलती दुनिया में पारंपरिक रटने वाली शिक्षा प्रणाली प्रासंगिक नहीं रह गई है। modern समय में शिक्षा को निम्नलिखित पहलुओं पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है:

* व्यावहारिक एवं कौशल-आधारित ज्ञान (Skill-based Education): केवल किताबी ज्ञान की जगह रोजगारपरक और व्यावहारिक कौशल सिखाना।

* नैतिक मूल्य और संवेदनशीलता: तकनीक और अर्थशास्त्र के साथ-साथ नागरिक में मानवीय संवेदनाएं, ईमानदारी और सामाजिक उत्तरदायित्व का बोध होना।
* समान पहुंच: गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक समाज के अंतिम व्यक्ति की पहुंच सुनिश्चित करना, ताकि कोई भी नागरिक विकास की मुख्यधारा से न छूटे।

निष्कर्ष:

जब देश का प्रत्येक नागरिक शिक्षित और जागरूक होगा, तभी वह स्वास्थ्य, तकनीक, वाणिज्य और पर्यावरण जैसी विकास की अन्य धाराओं में अपना प्रभावी योगदान दे पाएगा। इसलिए, शिक्षा को सही अर्थों में संपूर्ण विकास की नींव माना जाता है।

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"जब कौशल और सक्षमता भर्ती और पदोन्नति को संचालित करते हैं, तो सबसे बेहतरीन सर्जन ऑपरेशन करता है, सबसे कुशल इंजीनियर पुल का डिज़ाइन तैयार करता है, और सबसे सक्षम दिमाग नीतियों को संभालते हैं।"

27/07/2026

केवल "समान अवसर" का वादा करना काफी नहीं है; हमें एक-दूसरे के प्रति सहानुभूति, विनम्रता और नागरिक एकजुटता की आवश्यकता है। एक न्यायपूर्ण समाज वह नहीं है जो केवल विजेताओं को पुरस्कृत करे, बल्कि वह है जो हर नागरिक के योगदान को गरिमा और सम्मान दे।

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