24/01/2026
🚩यज्ञोपवीत / जनेऊ क्यों धारण करें। 🚩
🌹ओ३म्। यज्ञोपवीतम परमं पवित्रं प्रजा पतेर्यत्सहजं पुरस्तात् । आयुष्यमग्रयं प्रतिमुंञ्च शुभ्रं। यज्ञोपवितम् बलमस्तुतेज:।।
यज्ञो पवीतमसि यज्ञस्य त्वा यज्ञोपवीतेनोपनह्यामि। 🌹
पारकस्करगृह्म सूत्र २।२।११।
अर्थ :- परम पवित्र आयूवर्धक यज्ञोपवीत जिसे प्रजापति ईश्वर प्रत्येक बालक को सहज स्वभाव से गर्भ से जरायु ( गर्भ की झिल्ली ) के रूप में प्रदान करता है। उसे तू जन्म के बाद धारण कर , पहन। यज्ञोपवीत तुझे बल तेज़ देने वाला हे। तू यज्ञोपवीत है मैं तुझे यज्ञ के व्रत के साथ पहनता हूँ।
( यज्ञोपवीत धारक ऐसा अनुभव करे कि जैसे वे जन्म से पहले माता के गर्भ की झल्ली में सुरक्षित था उसी तरह वे जन्म के बाद इन तीन धागे अर्थात ईशवर के गर्भ रूपी झल्ली में उसकी छत्रछाया में हर समय सुरक्षित है )
🚩 🚩यज्ञोपवीत तीन धागों - नौ तन्तु- पाँच गाँठों से बनता है 🚩🚩
🔥🔥यज्ञोपवीत के तीन धागे :-यज्ञोपवीत के तीन धागे कई प्रकार की शिक्षा को याद करायेंगे और संकेत करते रहेंगे कि यज्ञोपवीत धारक मैं :-
१- मन - वचन - कर्म से पवित्रता रखूँगा
२-ज्ञान - कर्म - उपासना = आपने ज्ञान को निरन्तर बढ़ाता रहूँगा और उस ज्ञान के अनुसार कर्म करूँगा फिर मैं ईश्वर की उपासना से ज्ञान और कर्म को खंडित न करने का दृढ़ मन प्राप्त करूँगा।
३-सत्य- यश - श्री :- अगर तुम ब्रह्मण बनना चाहते हो तो जीवन में सत्यता को प्रमुखता देंगे। अगर क्षत्रीय बनना है तो आपने बल समर्थ को इतना बड़ाऊँगा कि समाज में मेरा चारों ओर यश हो।
अगर वैश्य अर्थात व्यापार करना है तो तुम्हें श्री अर्थात धन को सुरक्षित करना होगा और पवित्रता से कमाई करूँगा।
४- अध्यात्मिक- अधिभौतिक - आधिदैविक दुखो में समता रखना और दुख में विचलित नहीं हूँगा :-
🔥आध्यात्मिक दुख शरिर और मन से जुड़े होते है। जैसे शरिरक रोग कष्ट और मानसिक क्लेश।
🔥अधिभौतिक:-दुसरे मनुष्यो से धोखा ,हानि ,झगड़ा ,मतभेद शत्रुता के दुख ,युद्ध
🔥आधिदैविक:- भूकम्प आँधी तूफ़ान बिमारी बाढ़ से होने वाले दुख
इन दुखों से कभी विचलित न होना इन में समभाव रखना।
५- पितृ ऋण - ऋषि ऋण - देव ऋण
🔥 🔥तीन धागों का सब से महत्व पूर्ण संकेत है कि हमारे उपर जन्म के बाद से
पितृ ऋण - ऋषि ऋण - देव ऋण जुड़े है जिनसे उऋण होना अति अवशयक है।हर समय इन तीनों के प्रति मन में कृतज्ञता का भाव रखने से ही ऋण से उऋण हो सकते है।
🔥पितृ ऋण :- आपने माता पिता का जन्म से लेकर बड़े होने तक पालन पोष्ण करने के लिए धन्यवादी रहना तथा उनके प्रति कृतज्ञता का भाव रखना।
🔥ऋषि ऋण :- आपने आचार्य ,विद्वानों ,ऋषियों के प्रति धन्यवादी रहना तथा उनके प्रति कृतज्ञता का भाव रखना जिन्होंने भी जीवन में ज्ञान दिया रास्ता दिखाया।
🔥देव ऋण :- ईश्वर ने हमें मनुष्य जन्म दिया ,धरती पर खाने पीने के लिए अन्गिनत पदार्थ दिये वेदों का ज्ञान दिया और ऐसी बुद्धी दी जिससे हम अपने लिए क्या अच्छा है क्या बुरा है, की समझ से कार्य कर सकते हैं। उस पालनहार ईश्वर के प्रति हर समय धन्यवाद करना और कृतज्ञता प्रगट करनी चाहिए।
🔥🔥 हर धागे में तीन , कुल नौ तन्तु है जो संकेत करते है कि मैं आपने शरीर के नौ द्वारों को संयम में रखने का व्रत लेता हूँ । इनसे कोई कुचेष्ठा नहीं करूँगा। नौ द्वार है १ मुख २ नासा २ कान २ आँखें २ मल मूत्र के द्वार है।
🔥🔥उपर पाचं गाँठ बंधी हैं :- जो निम्न व्रत का संकेत करती हैं।
१- ब्रह्म यज्ञ -सन्ध्या स्वाध्याय करना
२- देव यज्ञ -अग्नि होत्र करना
३- पितृ यज्ञ :- जीवत माता पिता दादा दादी नाना नानी सभी बड़ों का आदर सत्कार व पोषण करना
४- बलिवैशवदेव यज्ञ -मीठे की दस अहुती रसोई घर की अग्नि में देना तथा जीव जन्तु कुते पक्षी पागल बिमार अपाहिज को भोजन देना।
५- अतिथि यज्ञ :- घर में आये विद्वानों धर्म पुरूषों का सत्कार व भोजन कराना।
🔥🔥पाँच गाँठ यह भी संकेत करती है कि मैं मन में उठने वाले काम क्रोध लोभ मोह अहंकार पर संयम रखुंगा और उन पर अब मैंने पूर्ण गाँठ लगा दी है।
🔥🔥कंधे पर यज्ञोपवीत क्यों डालते है :-
कंधे पर ही हर व्रत का भार उठाने की क्षमता कही जाती है। उपर लिखे व्रत का भार उठाना के संकल्प से इसे बांये कंधे पर डालते है। और जो दिल के ऊपर होता हुआ जाता है इसका संकेत है कि मैं सभी व्रत दिल से निंभाऊंगा।
🔥🔥यज्ञों पवीत अपवित्र भी हो जाता है अगर व्यक्ति तीन दिन तक संध्या न करे या ग्यारह बार नित्य गायत्री मंत्र का जाप न करे।
🚩🚩सभी का कर्तव्य है कि यज्ञोपवीत धारण करें तथा जिन्होंने आर्य विचारधारा पर चलने का प्रण लिया है वे अवश्य डालें। ख़ाली बातों से धर्म रक्षा नही होगी धर्म के पालन करने से ही धर्म रक्षा होती है धर्म जीवंत रहता है।
🚩🚩जिन्होंने कालजयी ग्रंथ 'महर्षि दयानंद' कृत "सत्यार्थ प्रकाश" से वेद के सिद्धान्तों को जानने का और पुनः श्री राम और श्री कृष्ण के पद चिह्नों पर चल कर राष्ट्र को पुनः आर्यवर्त (राम राज्य) बनाने का दृढ़ संकल्प लिया है वे तो यज्ञोपवीत अवश्य धारण करें।यज्ञोपवीत कोई भी ब्रह्मण क्षत्रीय वैश्य शूद्र स्त्री पुरूष बालक बालिका बग़ैर किसी भेद भाव के कभी भी यज्ञ के समय उपर आरम्भ में दिये मंत्रो का उचारण करके डाल सकते है।
मेरे श्रेष्ठ पूर्वज भगत सिंह,चौधरी छोटूराम, चंद्रशेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल, संत रविदास, महर्षि वाल्मीकि, श्री राम श्री हनुमान श्री कृष्ण यज्ञोपवीतधारी - जनेऊ धारी थे ।आओ हम भी अपने पूर्वजो का अनुसरण करे