21/05/2025
*** सभी मर्दों को समर्पित ***
मैं मर्द हूँ..
हर सुबह अलार्म से पहले
जिम्मेदारियों की आवाज़ सुनता हूं
नींद अधूरी छोड़कर
एक और दिन के लिए उठता हूं
चेहरे पे मुस्कान ओढ़े
थकावट को छुपाता हूं
घर की उम्मीदों का बोझ
हंसते हुए उठाता हूं
"तुम तो मर्द हो", ये कहकर
हर दर्द को अनकहा कर देता हूँ
दिल भी तो टूटता है मेरा
मगर आंसू छुपा लेता हूं
पिता हूं, बेटा हूं, पति हूं
हर रिश्ते में खुद को बाँटता हूं
कभी खुद को तलाशता हूं
कभी ख़ुद से भी हार जाता हूं
ना कोई शिकायत, ना गिला
बस कर्तव्यों का पुलिंदा हूं
कभी ATM, कभी ड्राइवर
हर रूप में ज़रूरत बन जाता हूं
थक के भी जब घर लौटूं
तो सवाल मिलते हैं सुकून की जगह
"थोड़ा टाइम बच्चों को दो"
कह कर ताने दे जाती है ये दुनिया
कभी चुपचाप छत की ओर
घंटों एकटक देखता हूं
क्या मेरे भी सपनों का
कहीं कोई कोना बचा है?
ना कोई "Thank you", ना कोई वाह
बस चलता रहता हूं, जैसे रिवाज
कभी खुद की तारीफ़ सुने ज़माना बीत गया
अब तो तारीख़ें भी बोझ सी लगती हैं आज
घर की ईंटों में मेरे पसीने की
हर बूँद बसी होती है
पर जब खर्चों की लिस्ट बनती है
तो मेरी कीमत गिनती में नहीं होती है
"मर्द रोते नहीं", ये कह के
जज़्बातों को मार दिया जाता है
पर दिल है मेरा भी,
जो हर दिन टूट कर जुड़ जाता है
पिता का कंधा जब झुकता है
तो कोई नहीं देखता उसकी पीठ
जिसने दुनिया को थाम रखा है
वही सबसे अकेला दिखता है
जब बेटा गलती करता है
तो कहा जाता है — "कहाँ है बाप?"
पर जब वही बेटा कुछ अच्छा करे
तो उसका श्रेय भी बाप से छिन जाता है
कभी सुकून की एक चाय
खामोशी से पी जाता हूं
हर चुस्की में बस यही सोचता हूं
कि कब खुद से मिल पाऊंगा
ज़िंदगी की इस तेज़ रफ्तार में
कभी थमने का मौका नहीं मिलता
जो मर्द थमता है एक पल को भी
उसे कमजोर कह दिया जाता है
पर मैं भी इंसान हूं आखिर
मुझे भी गले लगने की चाह है
ना सिर्फ़ दवाबों से,
कभी मोहब्बत से भी, ये चाह है
मेरे सपनों की भी एक डायरी है
जो कभी नहीं खुलती
पर हर दिन उसमें एक नया पन्ना
चुपचाप भरता चला जाता हूं
मैं मर्द हूं, हां, मगर
किसी मशीन से कम नहीं समझो
मैं भी टूटता हूं, मैं भी बिखरता हूं
पर फिर भी खुद को समेट लेता हूं