Virendra Rawna

Virendra Rawna असंवैधानिक व्यवस्थाओं के विरूद्ध सामाजिक जन चेतना का कार्य

वीरेन्द्र सिंह रावणा का जन्म 30 मार्च 1974 को राजस्थान के भीलवाड़ा जिले की ऐतिहासिक नगरी शाहपुरा में हुआ। इनके पिता का नाम श्री प्रेमस्वरूप चौहान एवं माता का नाम श्रीमती प्रेमलता है।
इनके दादा श्री धनरूप चौहान एक आर्यसमाजी एवं समाजसेवी थे। उनके व्दारा किये गए ऐतिहासिक और साहसिक कार्यों से सम्पूर्ण भीलवाड़ा जिले में इनकी स्वतंत्रता सेनानी के रूप में भी पहचान है।
वीरेन्द्र सिंह रावणा ने अपने पूर्वजों

की प्रेरणा से अपने जीवन काल के दौरान सामाजिक क्षेत्र में कई कार्य किये जिनके कारण इन्हे भारत सरकार व्दारा एशिया स्तर पर प्रकाशित पुस्तक में स्थान मिला इससे पूर्व 12 जनवरी 1999 को भारत सरकार व्दारा राष्ट्रीय युवा पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया । यह पुरस्कार तत्कालीन प्रधानमन्त्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने लखनऊ, उत्तर प्रदेश में छठे राष्ट्रीय युवा महोत्सव के दौरान दिया ।
वर्तमान में विभिन्न संगठनों अखिल राजस्थान रावणा राजपूत महासभा, पिछड़ा वर्ग कर्मचारी महासंघ और आर्थिक एवं सांख्यिकी विभाग, राजस्थान अधीनस्थ कर्मचारी महासंघ में प्रदेश अध्यक्ष के पद पर अपनी सेवाएं दे रहे है तथा 2003 में मूल ओबीसी को लामबंद कर ओबीसी महापंचायत का गठन किया और अब प्रदेश महामन्त्री के रूप में कार्य देख रहे है । अभी हाल ही में समाजिक न्याय आन्दोलन के मंच से वंचित समाजों के लिए कार्य कर रहे है।
इनके छात्र जीवन में सामाजिक कार्यों जैसे वृक्षारोपण, पल्स पोलियो, रक्त दान, नशा मुक्ति, एड्स जनचेतना जैसे कार्यों में योगदान हेतु राज्य स्तर पर भी इन्हे राजस्थान सरकार व्दारा सम्मनित किया गया तथा 26 जनवरी 1994 को गणतंत्र दिवस परेड, नई दिल्ली में राष्ट्रीय सेवा योजना की तरफ से भाग लिया जिसमें भारत सरकार व्दारा सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के लिए प्रमाण पत्र दिया गया।
उपरोक्त संगठनों के तहत कार्य करते हुए ओबीसी के क्षेत्र में सन 2008 में भारत की जनगणना - 2010 में जाति आधारित जनगणना एवं ओबीसी को संवैधानिक दर्जा दिलाने सहित लगभग 12 मांगों पर तथ्यात्मत रूप से ज्ञापन तैयार कर राष्ट्रीय एवं राज्य स्तर पर मांग उठायी जिसमें सामाजिक समरसता के संवैधानिक अधिकार पर बल देते हुए जाति की गणना के महत्व को दर्शाया बाद में इसी ज्ञापन के तथ्यों पर संसद में विस्तृत बहस हुई और भारत सरकार व्दारा राज्यों को पुनः जाति आधारित जनगणना के लिए गोपनीयता के साथ आंकड़ों के निर्देश मिले। अब तक के जीवनकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि है कि जाति अधारित जनगणना के मुद्दे ने ओबीसी के राष्ट्रीय नेताओं को एक मंच पर खड़ा कर दिया। इसके बाद 3 मई 2011 को राजस्थान सरकार व्दारा पदोन्नति में आरक्षण मामलों पर सुनवाई हेतु गठित “ भटनागर समिति “ से ओबीसी के लिए पदोन्नति में आरक्षण की मांग सहित राज्य कर्मचारी गणना में ओबीसी के कर्मचारियों हेतु अलग से गणना के प्रावधान की मांग पर राज्य सरकार व्दारा मात्र 8 दिन में ओबीसी के कर्मचारियों की गणना हेतु अधिसूचना जारी करवाई। इसके बाद 2 अगस्त 2012 को राजस्थान में क्रीमीलेयर के कारण प्रत्येक 6 माह में ओबीसी के प्रमाण पत्र की प्रक्रिया से 3 वर्ष तक के लिए छुटकारा दिलवाया, अब 1 वर्ष के पश्चात 3 वर्ष तक अभ्यर्थी के स्वयं के शपथ पत्र पर वैधता का प्रावधान लागू हुआ है। इनके व्दारा उठाए गए मुद्दों में से एक ओबीसी के संवैधानिक दर्जे पर 30 अगस्त 2012 को राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग ने केंद्र सरकार को ओबीसी के संवैधानिक दर्जे की सिफारिश भी की।
अन्य सामाजिक कार्यों के तहत सन् 1998 में सर्वप्रथम राजधानी जयपुर में रावणा राजपूत समाज की जनजागृति रैली का आयोजन में प्रमुख भुमिका निभाई तथा सन् 2000 व 2001 में अखिल राजस्थान रावणा राजपूत महासभा के तत्वाधान में मालपुरा, टोंक व पुष्कर, अजमेर में क्रमशः 108 व 251 जोड़ो का ऐतिहासिक सामूहिक विवाह का आयोजन कर सामाजिक जागृति के लिए पहल की। इन अवसरों पर तत्कालीन राज्यसभा सदस्य श्री रामदास अग्रवाल के सांसद कोटे से 18 लाख रुपये का आवंटन करवाया । इसी प्रकार रावणा राजपूत समाज के लिए सन् 2003 में राजस्थान राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग को एक ही जाति नाम “ रावणा राजपूत “ के लिए ज्ञापन देकर विभिन्न पद नामों दरोगा, हजुरी, वजीर, कोठारी, भंडारी, हवलदार, कोतवाल आदी पद सूचक जाती नामों को ओबीसी जातिय सूचि में अलग से कोष्ठक में दर्शाने की मांग रखी जिसके फलस्वरूप तत्कालीन राजस्थान राज्य ओबीसी आयोग के अध्यक्ष श्री रणवीर सहाय वर्मा ने राज्य सरकार को मेरे प्रस्ताव पर सुनवाई कर सिफारिश भेजी।
सन् 2003 में भीलवाड़ा जिले में सामंतवाद के विरुद्ध रावणा राजपूत जनजागृति हेतु बिजोलिया से गुलाबपुरा तक लगभग 250 कि. मी. की 6 दिवसीय पद यात्रा का आयोजन कर भीलवाड़ा की राजनीति में रावणा राजपूत समाज का इतिहास रचा।
सन् 2008 में विद्याधर नगर, जयपुर में रावणा राजपूत समाज की राज्य स्तरीय रैली कर तत्कालीन सामंतवादी सरकार का सफाया किया।
सन् 2003 में आर्थिक एवं सांख्यकी विभाग के कर्मचारियों के हितार्थ संघर्षशील रहते हुए सांख्यकी सहायक पद नाम परिवर्तन की मांग सहित अन्य मांगों पर ज्ञापन दिया गया जिसके फलस्वरूप गहलोत सरकार ने सन् 2012 में सहायक सांख्यकी पद का नाम परिवर्तन कर सहायक सांख्यकी अधिकारी कर दिया । पदनाम परिवर्तन का फैसला सांख्यिकी सेवाओं में सराहनीय उपलब्धि साबित हुआ।
वर्तमान में रावणा राजपूतों की इतिहास में सही पहचान के लिए संघर्षशील है। पूर्व में इनके द्वारा कर्नल जेम्स टॉड द्वारा लिखित राजस्थान का इतिहास पुस्तक के 2013 संस्करण से दरोगा जाति के विवादास्पद अध्याय को हटवाया गया। 12 सितम्बर 2016 को विधाद्यर स्टेडियम जयपुर में समाज के इतिहास को लेकर स्वाभिमान की महापंचायत की, जो इतिहास को लेकर ऐतिहासिक पहल है।

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