20/07/2026
तस्वीर ओ तहरीर- यादे गुज़िश्ता
हाल ही में यूरोप (माल्टा) से भारतीय प्रवास के दौरान पुराने काग़ज़ात तलाश करते हुए मुझे एक फ़ोटो मिली जिसमें पापा अजा़दार रज़ा ज़ैदी,चाचा हिफ़जुल हसनैन,चाचा मुअज़्ज़म हैदर उर्फ़ बब्बू भाई,चाचा जहीरुल हैदर उर्फ़ मुबीन मियां भाई के साथ सेंथल के दीगर गणमान्य नागरिक मौजूद थे। ये वो दौर था जब सेंथल की सियासत में उस वक्त सादात में मशहूर शायर एडवोकेट इंतेकामुल हसनैन मुन्तक़िम हैदरी साहब मरहूम व सैयद अख़्तर मेंहदी साहब मरहूम का वर्चस्व कायम था। जनाब मुन्तक़िम हैदरी साहब जो कि सेंथल की सियासत के पितामह कहे जाने वाले मरहूम दबीर हुसैन साहब के दामाद थे उनके लिए ये मशहूर था कि बरेली शहर में भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जिन चंद लोगों को नाम से जानती थी वो उनमें से एक थे वहीं जनाब अख्तर मेंहदी साहब जो कि एक बड़े जमींदार घराने के चश्मोचराग़ रहे थे उनके परनाना सैयद नूर हुसैन साहब सेंथल के पहले इलैक्डिड चेयरमैन और इसके बाद उनके नाना सैयद मुबारक मेंहदी साहब सेंथल के चैयरमेन रहे थे।
अब आते हैं प्रधान से सीधे विधायक बने पचपेड़ा के चेतराम गंगवार जी पर जो कि लगातार तीन बार मंत्री भी रहे। उनके बारे में मशहूर था कि उनको नारे गढ़ने में उनको महारथ हासिल थी। जब वो निर्दलीय लड़े तो उन्होंने नारा दिया, "चंद दिनों की बात है फिर इंदिरा जी का साथ है" वहीं अगली बार जब उनको हाथी चुनाव चिन्ह मिला तो उन्होंने नारा दिया कि "अब हाथ नहीं हाथी है, चेतराम गंगवार हमारा साथी है" ।
ज़मीं से जुड़े हुए नेता चेतराम गंगवार जी ने अपने सियासी जीवन की शुरुआत प्रधानी के चुनाव से की 1962 में ग्राम पचपेड़ा के प्रधान रहते हुए उन्होंन कांग्रेस से विधान सभा का टिकट मांगा। नहीं मिला को वह निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में नवाबगंज क्षेत्र से चुनाव मैदान में उतर गए। तब वह मात्र 1313 वोट से पिछड़ गए थे। अगला चुनाव 1967 में पूर्व सांसद बाबू हरीश कुमार गंगवार के कहने पर लडे़। उन्होंने उनकी मुलाकात अटल विहारी वाजपेयी से कराई। उन्हें जनसंघ से टिकट दिलाया। इस टिकट पर चुनाव लड़ कर वह विधायक बन गए। इसके बाद लगातार छह बार क्षेत्र की विधायकी अपने हाथ से जाने नहीं दी। दूसरा चुनाव 1972 में वह जनसंघ से ही जीते। 1977 में कांग्रेस में आ गए और यह चुनाव भी जीत लिया।
ये तस्वीर 1977 के चुनाव की जीत के दौरान की है जब जनाब अख़्तर मेंहदी साहब ने उनकी जीत पर उन्हें अपने घर दावत पर बुलाया था,जिसके लिए काफी दिन पहले इंतेज़ाम किया गया था। इस फोटो के सम्बन्ध में पापा की डायरी में एक नोट लिखा था कि चाचा जनाब मोअज्जम हैदर उस वक्त हरिद्वार में पीडब्ल्यूडी विभाग में कार्यरत थे तो चेतराम गंगवार जी ने लखनऊ से विभागीय अधिकारी को छुट्टी के लिए फोन किया था। ताकि वो इस प्रोग्राम में शामिल हो सकें।
चेतराम गंगवार जी इसके बाद भी राजनीति में सक्रिय रहे और की बार विधायक बने। उनका एक इलैक्शन मुझे अब भी याद है जो कुंवर सेन जी के खिलाफ उन्होंने लड़ा था जिसमें सेंथल से बहुत कम लोगों ने उनको ये इलैक्शन लड़ाया था उस समय भी हमारा परिवार चेतराम जी के साथ था।
इस फोटो सम्बन्ध में जब मेरी बात मरहूम चेतराम गंगवार जी की पुत्री सुश्री विमलेश गंगवार जी से हुई जो एक बेहतरीन कवित्री और लेखिका हैं तो वो एकदम भावुक हो गईं और उन्होंने सेंथल से जुड़े कई संस्मरण सांझा किये और कई लोगों जिनमें मरहूम जनाब सगी़र हुसैन बख़्शी जी , उनके भाई मरहूम जनाब शमीम हुसैन साहब और खान सरफ़राज़ खान साहब का भी तज़किरा शामिल रहा। मैंने उनके पिता चेतराम गंगवार जी के सम्बन्ध में उनकी लिखी गई किसी कविता के बारे में जब पूंछा तो उन्होंने ये कविताएं भेजी जो एक पिता के लिए एक बेटी की तरफ़ से सच्ची श्रद्धांजलि हैं, जिसमें उन्होंने लिखा था कि
शब्द मेरे हैं परन्तु भाव पिता जी आदरणीय श्री चेतराम गंगवार पूर्व मंत्री जी के हैं-
समुन्दर पीने की इच्छा है
तो पी लो , सारी जल राशि ।
पर याद रखना , डूब जाओगे ।।
इश्क करना है तो
,करो इबादत हर शख्स की ,
जो प्यासे हैं भूखे हैं बीमार हैं ।
करके तो देखो इनकी इबादत ,
सच में
बहुत तसल्ली मिलेगी ।।
मैने कई बार , सूरज के साथ देखा था उसे ।
पर तब भी नही भूला वह अदब और कायदे जरा भी ।।
मै इतरा रही थी खूब कि ,
मुझसे ऊंचा कोई नही इस जगत में ।
ऑख खोल कर देखा , कि ,,,
सब से निचली सीढी पर खड़ी थी मैं
पास रहो या बहुत दूर ,
पर इतना तो हो जरूर ,
जहां पर भी हो , वहां पर
महफूज रहो भरपूर ।।
उन्होंने अपने पिता जी की मौत पर कुछ इस तरह से लिखा।
पिता जी के लिए ,,,,,,,,,,,,
जरूरत तो थी ,
तुम्हारे साथ की बहुत ।
पर अचानक एक मोड़ पर ,
राह बदल ली तुमने ।।
सोचा न था कभी आयेगी एक शाम,
विदाई की , मौन जुदाई की ।
बातें रह जाएंगी आधी ,
अब न होंगी मुलाकातें ,
रह जायेंगी रह जाएंगी,,,,,
बस यादें ।
और आखिर में जो चेतराम गंगवार जी के बाद एक ख़ला पैदा हुआ है जिसको भरने उनके पौत्र भुजेन्द्र गंगवार जी जान से लगे हुए हैं,ये सच है कि लोग उनमें उनके दादा जी को देख रहे हैं और साथ ही उनकी मेहनत को देखते हुए उनकी कामयाबी की दुआएं भी कर रहे हैं उनके लिए ये शेर उनकी बुआ जी ने लिखा -
हो तो कोई ऐसा हुनर दार जो ,
उजड़े गुलिस्तां को फिर से आबाद कर दे।
(इस तस्वीर में ऊपर लेफ़्ट से राईट- सलीम भाई पुत्र जनाब अख्तर मेंहदी साहब मरहूम, मरहूम तनवीर हुसैन बुखारी साहब, चाचा जहीरुल हैदर ज़ैदी उर्फ़ मुबीन मियां भाई, सैयद क़मरुल हसनैन साहब नीम वालान,
नीचे लेफ़्ट से राईट- सैयद इनामुल हसनैन साहब, चाचा सैयद हिफज़ुल हसनैन साहब, सैयद हिलाल अली ज़ैदी साहब, चाचा सैयद मुअज़्ज़म हैदर साहब उर्फ़ बब्बू भाई, विधायक जनाब चेतराम गंगवार जी, सैयद नज़ाएरुल हसनैन साहब, जनाब अख़्तर सज्जाद साहब, पापा सैयद अजा़दार रज़ा ज़ैदी साहब।)