Chandravanshi Maharaj Jarasandh Akhara and Museum

Chandravanshi Maharaj Jarasandh Akhara and Museum Contact information, map and directions, contact form, opening hours, services, ratings, photos, videos and announcements from Chandravanshi Maharaj Jarasandh Akhara and Museum, 5000 years old Jarasandha Akhara at Rajgir (Girivrajapura), Rajgir.

A young aged lady merely completed 25 years 03 months having a deep soul urge for corruption free, healthy atmosphere all around for Indian citizen in order to attain complete Swaraj, freedom in its true sense.

श्रीकृष्ण कहते हैं कि- बृहद्रथकुमार । हमने सुना है कि आप एक महान दानी पुरूष है । हम ब्राह्मण आपसे भीक्षा के रूप में एक व...
20/09/2021

श्रीकृष्ण कहते हैं कि- बृहद्रथकुमार । हमने सुना है कि आप एक महान दानी पुरूष है । हम ब्राह्मण आपसे भीक्षा के रूप में एक वर चाहते हैं , क्या आप उसे पूरा करेंगे?
जरासंध ने मुस्कुराते हुए कहा- आप हमारे आतिथ्य है और अभी आप मेरे लिए एक ब्राह्मण हैं और मैं अपनी जनता को भी उसकी इच्छानुसार दान देता हूँ , फिर आपलोग तो मेरे अतिथि है । आप बेहिचक , नि:संकोच अपनी बात रखें । आपकी ईच्छा मैं अवश्य पूरी करूंगा ।
चतुर कृष्ण इतनी आसानी से अपनी बात कहा रखने वाले थे , वे जरासंध को उत्तेजना के अंतिम चरण तक ले जाना चाहते थे , क्योंकि उन्हें पता था कि उनका वर कोई साधारण नहीं है । सम्राट जरासंध ने भी पूरी तरह श्रीकृष्ण को आश्वसत किया कि वे मनचाहा दान मागे , अगर मुझे अपनी जान भी देनी पड़ी तो मैं पीछे नहीं हटूंगा । सम्राट जरासंध कितने दानी पुरूष थे इसका वर्णन शुकदेव जी ने परीक्षित को कथा सुनाते हुए श्रीमद्भागवत ( गीता प्रेस ) के सत्रहवें अध्याय के तेइसवें श्लोक में महाराज जरासंध से यह कहलवाया है- " श्रीकृष्ण , भीम और अर्जुन क्षत्रिय होते हुए भी मेरे भय से ब्राह्मण का वेश धारण कर आये हैं और भिक्षा माँगने पर ही तुले हुए हैं तब मैं इनके चाहने पर अपना शरीर भी इन्हें दे सकता हूँ । " इसलिए सम्राट जरासंध ने कहा था- " याचको । आप लोग मनचाही वस्तुएँ माँग लें , आप चाहें तो मैं आप लोगों को अपना शरीर भी दे सकता हूँ।
इसी बात को श्रीमद्भागवत - भाषा बड़ा सुखसागर दशम स्कन्ध उतरार्द्ध पृष्ट 743 ( ठाकुर प्रसाद ) में इस रूप में कहा गया है- सम्राट जरासंध ब्राह्मण वेशधारी श्रीकृष्ण भीम और अर्जुन तीनों को प्रणाम कर आदर के साथ घर लिवा ले गये और अपने राज सिंहासन पर उन्हें बैठाकर सामने हाथ जोड़ खड़ा हो गये और उनकी ओर देखकर विचार कर बोले-
याचक जो द्वारे आवे । बड़ो सोऊ अतिथि कहलावे ॥
विप्र नहीं तुम योद्धा बलि । बात न कुछ किन्ही भलि ॥
जो ठग ठगनी रूप धरि आवै । ठगो जाये पर भलो न कहावे ॥
छिपै न छत्री कान्ति तिहारी । दीखत सूर वीर बलधारी ॥
तेजवंत तुम तीनों भाई । शिव , विरंची , हरिसो वरदायी ।
मैं जानयो जिय कर निर्माण । करो देव तुम आप बखान ।
तुम्हरी इच्छा हो सो करऊँ । अब बाचा से नहीं मैं टरऊँ ।।
दानी मिथ्या कबहु न भाषे । धन , तन , सर्वस कछु न राखै ॥
मांगो सो ही देहों दान । सुत , सुन्दरी सर्वस्व परान ॥
टिप्पणी : सर्वस्वदान कर देने की उनकी मानसिकता और प्रवृत्ति / नि : सन्देह सम्राट जरासंध को इतिहास के महान दानियों की अग्रपंक्ति में ला खड़ा करती है । यह जानते हुए भी कि श्रीकृष्ण उनके डर से भागे हुए शत्रु हैं , उनके विरूद्ध कोई षड्यत्र रचने आये हैं फिर भी उन्होंने श्रीकृष्ण , भीम और अर्जुन को शत्रु नहीं समझा बल्कि अपने सगे - सम्बन्धियों की तरह उनका आतिथ्य नाम सत्कार किया और अपने ' आतिथ्य देवोभव : ' की मर्यादा पर आँच नहीं आने दिया । उन्होंने श्रीकृष्ण , भीम और अर्जुन के संयुक्त षड्यंत्र का शिकार बनकर अपने प्राण गवाना स्वीकार किया , किन्तु घर आये अपने प्रबल शत्रु षड्यंत्रकारियों के विरूद्ध कोई कठोर कदम नहीं उठाकर आतिथ्य - सेवा को अमर बनाते हुए मगध की संस्कृति , परम्परा एवं मर्यादा की रक्षा की । सम्भवत : उनके आदर्शों को समाज में फैलाने के लिए ही महाभारत के शान्ति पर्व 146/5 में इस बात का उल्लेख किया गया है- " जिस प्रकार पेड़ अपने काटने वालों को भी छाया देता है उसी प्रकार यदि शत्रु भी घर पर आ जाए तो उसका आतिथ्य सत्कार करना चाहिए । " जब श्रीकृष्ण को विश्वास हो गया कि भिक्षा मांगने का अब उचित समय है तब उन्होंने कहा- हम आपके साथ मलयुद्ध करना चाहते है। हम तीनों में से किसी एक के साथ मलयुद्ध कर सकते हैं।
तब लगभग 80 वर्षीय जरासंध मुस्कुराते है। नौजवान बलशाली भीम को चुनते हैं। क्योंकि अर्जुन शरीर से बच्चे सा कोमल प्रतीत होता है।
उम्र का इतना अधिक अंतर होने पर भी सम्राट जरासंध को हराने में 28 दिन लगा, यह बात मुझे आश्चर्य में डाल देती है।
# अमित राजन चन्द्रवंशी

माननीय, सांसद चंदेश्वर प्रसाद चंद्रवंशी जी का आज लेटर सम्राट जरासंध के अखाड़ा, राजगीर के लिए लेटर देखकर ऐसा महसूस हुआ कि ...
27/07/2021

माननीय, सांसद चंदेश्वर प्रसाद चंद्रवंशी जी का आज लेटर सम्राट जरासंध के अखाड़ा, राजगीर के लिए लेटर देखकर ऐसा महसूस हुआ कि सफलता मिलने वाली है।
दिसंबर 2020 में AICYA राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित जी ने सरकार को लेटर लिखा था💐 जून 2021 में सरकार के तरफ से रिप्लाई आया था।💐 आज संसद जी ने लेटर लिखकर मुद्दा और मजबूत कर दिए🙏
इसके लिए संसद जी को बहुत बहुत धन्यवाद💐💐🙏
कुछ मुद्दा और संसद जी के लेटर पर ऐड होना चहिए जो सरकार को अवगत कराया गया था।💐 ताकि सभी का निवारण एक साथ हो जाता🙏🙏
सम्राट जरासंध अखाड़ा सिर्फ चंद्रवंशियों का नही है, पूरे मगध का शान है, साथ ही साथ पूरे बिहार में सबसे पॉपुलर टूरिस्ट प्लेस है। भले इसकी लड़ाई चंद्रवंशी लड़ रहा है💐💐
समाज के सभी सुभचिंताको को दिल से आभार।👑👑
बरसो का मामला सायद अब हल निकल जाए🙏
जय चंद्रवंशी🙏
चंद्रवंशी महासंघ

एक बार जरूर पढ़ें💐💐ज्यादा से ज्यादा शेयर करे🙏जय जरासंध, जय मगधेश🙏
18/07/2021

एक बार जरूर पढ़ें💐💐
ज्यादा से ज्यादा शेयर करे🙏
जय जरासंध, जय मगधेश🙏

मगध नरेश सम्राट जरासंध जी की 5223वी जयंती की आप सभी को हार्दिक सुभकामनाए💐💐🙏 प्रत्येक वर्ष कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की ए...
25/11/2020

मगध नरेश सम्राट जरासंध जी की 5223वी जयंती की आप सभी को हार्दिक सुभकामनाए💐💐🙏

प्रत्येक वर्ष कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को जरासंध की जयंती मनाई जाती है💐💐
इसवार मगध सम्राट जरासंध जी की 5223वीं जयंती 25 नवंबर 2020 को मनाई जा रही है🙏
खास तौर पर बिहार के मगध क्षेत्र के लगभग सभी जिलों और कस्बो में सम्राट जरासंध की मंदिर, भवन और धर्मशाला देखने को मिलता है।💐💐💐
मगध क्षेत्र में चंद्रवंशी बड़े धूमधाम से जरासंध जयंती मानते है💐💐💐
इस बार भी पटना, अरवल, जहानाबाद, गाया, नवादा, नालंदा, रोहताश, कैमूर, भागलपुर, बांका और औरंगाबाद में धूमधाम से मनाई जा रही है💐💐💐
इसके अलावे झारखंड, वेस्ट बंगाल और दिल्ली में भी धूमधाम से जरासंध जयंती बनाई जाती है💐💐

जय मगधेश🙏

2019 में 8 नवंबर 2019 को सम्राट जरासंध जयंती था/
02/12/2019

2019 में 8 नवंबर 2019 को सम्राट जरासंध जयंती था/

जय हो सम्राट जरासंध की।🙏🙏
19/11/2019

जय हो सम्राट जरासंध की।🙏🙏

11/10/2019

JAY JARASANDH ...
JAY MAGADHESH...

चंद्रवंशी क्षत्रिय समाज का इतिहास एक नजर मेंभारत के निर्माण में, इसमें वास करने वाले समस्त प्राणियों का हाथ रहा है । लेक...
26/04/2019

चंद्रवंशी क्षत्रिय समाज का इतिहास एक नजर में

भारत के निर्माण में, इसमें वास करने वाले समस्त प्राणियों का हाथ रहा है । लेकिन सृष्टि के निर्माण एवं कर्म क्षेत्र के आधार पर की गयी वर्ण व्यवस्था के बाद भारत के गौरव को बढाने में क्षत्रियों की महत्वपूर्ण भूमिका रहीं है । क्षत्रिय परिवार में दो वंशो के क्षत्रियों ने अपने त्याग, बलिदान, एवं कूर्बानी से देश श्रेष्ठ बनाने का काम किया है जो किसी से छिपा नहीं है। भारत का नामकरण भी चन्द्रवंशी क्षत्रिय राजा भरत के नाम पर ही हुआ है। इस वंश में ऐसी विभूतियों का जन्म हुआ जिन्होंने अपने पराक्रम से इतिहास की दिशा ही बदल दी। ग्रथों में अपना इतिहास अपने हाथों से लिखने एवं पाने का काम किया है । चन्द्रवंश के ही पराक्रमी, न्याय, दानी एवं त्यागी राजा नहुष ने भगवान ‘इन्द्र’ की भी गद्दी को भी सम्भालने का काम किया है। राजा नहुष के विवाह माता पार्वती एवम् महादेव शंकर के पुत्री अशोक सुंदरी से हुआ था।

द्वापर युग में अहंकार, अन्याय, शोषण, दोहन से आमलोगों को मुक्ति दिंलाने के लिये अपने ही परिवार के महान् एवं पराक्रमी योद्धाओं से ”कुरूक्षेत्र” के मैंदान में एक ‘महान धर्मयुद्ध’ लड़ने का काम किया जो “महाभारत” के नाम से देश-विदेश में जाना जाता हैं। इस महान युद्ध में भगवान विष्णु को ‘कृष्ण’ के रूप में चंद्रवंशी क्षत्रिय वंश में ही अवतार लेकर अपनी भूमिका का निर्वाह करना पड़ा था।

आज हम जिस किसी भी महान ग्रंथो, वेदों एवं पुराणों का अध्ययन करें “चंद्रवंशी क्षत्रिय” वंश की महत्ता आसानी से समझी जा सकती हैं। लेकिन संसार में परिवर्तन हमेशा चलता रहता है। उसी क्रम में चंद्रवंशी क्षत्रिय वंश के उत्थान की गति रुकी और पतन की गति प्रारम्भ हो गई। महाराजा जरासंध जो एक विशाल मगध साम्राज्य के राजा थे, चन्द्रवंश क्षत्रिय वंश के अंतिम चक्रवर्ती सम्राट हुये। इनके बाद सत्ता परिवर्तन हुआ और बाद में ‘महानंद’ ने ‘मगध साम्राज्य’ पर अपना अधिपत्य जमाकर ऐसा शोषण, दोहन एवं आतंक का वातावरण बनाया कि चंद्रवंशी क्षत्रिय परिवार को अपना घर द्वार छोड़कर अन्य जगहों पर भागना पड़ा। उसी समय से इस वंश का सिलसिला शुरू हुआ, जो काल परिवर्तन होने पर भी रुकने का नाम नहीं लिया। लेकिन समय ने पलट खाया और इस वंश में ऐसी विभूतियों का जन्म हुआ जिन्होंने भारत की गुलामी के समय में सन् 1868 में एक जगह बैठकर देश की गुलामी से मुक्ति दिलाने सहित चंद्रवंशी क्षत्रिय परिवार के तत्कालीन सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक, सांस्कृतिक आदि पहलुओं पर गहरा चिंतन किया।

एक तरफ देश की आजादी की लड़ाई में भागीदारी लेना एवं दूसरी तरफ सामाजिक क्षेत्रों में एकता बनाकर चंद्रवंशी क्षत्रिय परिवार को पूर्व के गौरव सम्मान एवं प्रतिष्ठा दिलाने की दिशा में क्रांतिकारी कदम उठाना। इन दोनों कार्यों को एक साथ करना, उस अंग्रेजी हुकूमत के समय आसान काम नहीं था। फिर भी हमारे मनीषियों ने दोनों क्षेत्र में चिंतन एवं कार्रवाई जारी रखा।

इसी क्रम में स्व० नथुनी प्रसाद सिंह जी का प्रादुर्भाव हुआ। सितम्बर 1856 ई० में पटना सिटी के मारुफगंज में जन्में बाबू नथुनी जी का लालन पालन बहुत ही सुखी माहौल में हुआ। इनके पिता बाबू श्यामलाल सिंह जी उस ज़माने के जाने माने एजेंट एवं आर्डर सप्लायर थे। बालक नथुनी जी ज्यों ज्यों बड़े हुए सादगी और व्यव्हार से ओत प्रोत होते गए और आगे चलकर उन्होंने चन्द्रवंशी समाज के अलावे शोषितों, दलितों के उत्थान के लिए कई महत्वपूर्ण कार्य किये।

समाज सेवा के इसी दौर में अपने छिपे लोगों की खोज की प्रक्रिया में सन् 1906 में एक राष्ट्रिय मंच की स्थापना की, जिसका नाम “ऑल इण्डिया चंद्रवंशी क्षत्रिय महासभा” रखा। इसके कार्यकारिणी में बंगाल से लेकर लाहौर तक लोगों का प्रतिनिधित्व किया गया।

सन् 1912 ई० में भारत के जनगणना विभाग के प्रधान से मिलकर उन्होंने चंद्रवंशियों के इतिहास की जानकारी दी और भारत कंपनी एक्ट 1882 के तहत महासभा का रजिस्ट्रेशन “अखिल भारतवर्षीय चन्द्रवंशी क्षत्रिय महासभा” नाम से करवाया।

महासभा के स्थापना के बाद चन्द्रवंशी क्षत्रिय परिवार के सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक, धार्मिक, सांस्कृतिक आदि पहलुओं के क्षेत्र में विकासमूलक कार्यक्रम प्रारम्भ किया गया, जिसके क्रांतिकारी कदम का विरोध उस समय के सामंती वर्ग एवं अंग्रेजी हुकूमत के हुक्मरानों ने किया। क्योंकि जहाँ महासभा सामाजिक लड़ाई उस समय की व्यवस्था से लड़ रही थी, जो अंग्रेजी हुकूमत के हिमायती थे, वहीं देश के आजादी की लड़ाई के लिये कार्यकर्ताओं को भी प्रशिक्षित कर रही थी। परिणाम यह निकला कि महासभा के पदाधिकारियों को खुनी लड़ाई भी लड़नी पड़ी। जेल के शिकंजो में बंद होना पड़ा। जाने गंवाने पड़ी एवम् घर द्वार छोड़कर अपने देश में ही शरणार्थी होना पड़ा। लेकिन महासभा के पदाधिकारियों, समर्थकों एवं सदस्यों ने अपने अभियान को जारी रखा।

महासभा ने सन् 1918 ई० तक स्व० नथुनी प्रसाद सिंह के नेतृत्व में उस समय के राजे, राजवाड़े, नवाबों एवं अंग्रेजी हुकूमत के हुकामरानों से संघर्ष किया तथा उत्तरोत्तर गति से अपने लक्ष्यों की प्राप्ति की ओर बढ़ती रही। बाद में डॉ० मुरलीधर सिंह, अमरनाथ सिंह, गोपीनाथ सिंह, महादेव सिंह, शिवनारायण सिंह, राय साहब सनातन सिंह, अमीरचंद सिंह, शालिग्राम सिंह, गंगा प्रसाद सिंह, शिव गुलाम सिंह, मंगल प्रसाद, प्राणनाथ सिंह, नन्द लाल सिंह, दमड़ी सिंह, त्रिवेणी नाथ दास, डॉ० रामरतन सिंह के नेतृत्व में महासभा के कार्यक्रम लाहौर से लेकर बंगाल तक सफलता पूर्वक चलता रहा।

सामजिक सम्मान के साथ लोग देश की गुलामी की जंजीर तोड़ने के लिये अपने जीवन की बिना कीमत मांगे देश की आजादी की बलिबेदी पर अपनी कुर्बानियां देना प्रारंभ कर दिया। उसमें स्व० पलटू चन्द्रवंशी भोजपुर, भगवानलाल मुजफ्फरपुर, स्व० छेदीदास, बालकेश्वर चन्द्रवंशी (चंद्रगढ़, नवीनगर) और कालू सिंह महरा जी का नाम देश की आजादी के लिये शहीद होनेवाले योद्धाओं के सूची में स्वर्ण अक्षरों में अंकित हैं। अन्य हजारों की संख्या में शहीद हुए क्षत्रिय चंद्रवंशियों का नाम उसी तरह गायब हैं, जैसे बने भवन के नींव में पड़ी ईंट का होता हैं।

लेकिन अफ़सोस की बात यह रही कि महासभा द्वारा संचालित सारे क्रन्तिकारी कदमों पर उस समय विराम लग गया जब हमारा मुल्क 15 अगस्त 1947 को आजाद हुआ।

उस समय हमारे मनीषि आजादी का जश्न मनाने में लग गए जो करीब 26 जनवरी 1950 तक जारी रहा।इस अवधि की निष्क्रियता ने ना आजाद मुल्क में चंद्रवंशी क्षत्रिय परिवार की भागीदारी ही सुनिश्चित करा पाई और ना महासभा के बढ़ते कदम को ही कायम रख सकी। फलतः आपसी विवाद गहराया, एकता टूटी और चंद्र लोगों ने अपने स्वार्थ की पूर्ति हेतु महासभा के अंदर जंग छेड़ दिया और 1968 के दशक में महासभा को कमजोर करने का काम किया। जहां हमारा संगठन लाहौर, दिल्ली, शिमला, गोरखपुर, बनारस, गाजीपुर, इलाहाबाद, मिर्जापुर, मुगलसराय, बंगाल, उड़ीसा, दानापुर, पटना, गया, छपरा, धनबाद आदि जगहों में सन 1918 में ही बन गया था।

सभी शाखाओं का विस्तार ग्राम सभा, पंचायत सभा, थाना सभा, जिला सभा, प्रदेश सभा स्तर पर करने का काम जिस गति से 1947 के पूर्व तिथि 1950 से 1964 के दशक तक विराम लग गया। हम तमाम चंद्रवंशी क्षत्रिय परिवार के लिए यह अवधि भारी नुकसानदेह रही। 1964 से 1970 के दशक तक स्व० टी० एन० दास, कोकिल प्रसाद सिंह एवं स्व० शिवदास सिंह के नेतृत्व में समस्त विचारधाराओं को एक साथ जोड़कर महासभा का कार्य तूफानी गति से चलाया गया और गांव में निवास करने वाले समस्त चंद्रवंशी भाइयों एवं बहनों को महासम्मेलन, सम्मेलन, प्रचार सभा, रैली एवं प्रशिक्षण शिविर का आयोजन कर महासभा के साथ जोड़ा गया जो 1970 से 1980 के दशक तक कायम रहा और बड़े पैमाने पर ग्राम, पंचायत, थाना, प्रखंड, जिला एवं प्रदेश स्तर तक शाखा सभाओं का गठन हुआ। नव जवानों एवं नव युक्तियों में जागरूकता आयी। लोगों को संगठन के प्रति प्रेम जगा। संगठन में राजनीतिक प्रस्ताव युवाशक्तियों द्वारा उठाया गया। राजनीतिक प्रस्ताव के माध्यम से भारतीय राजनीति में चंद्रवंशी परिवार की भागीदारी सुनिश्चित करने की लड़ाई सड़कों पर आना प्रारंभ हो गई।

1980-1990 के दशक में प्रतिस्पर्धा बढ़ी। अशिक्षा, अंधविश्वास एवं सामाजिक कुरीतियों से जमकर लड़ने की योजना बनी। 8 मार्च 1994 को पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में चंद्रवंशियों की विराट रैली का आयोजन किया गया जिस से पटना की सड़के भर गई। गाँव-गाँव में शिक्षा के प्रति सम्मान पैदा हुआ। आपसी एकता का प्रदर्शन करने के लिए आम लोगों को प्रशिक्षित किया गया। राजनीतिक दलों से जुड़ने के लिए नौजवानों एवं नियुक्तियों को प्रेरित किया गया। अपनी मांगों को महारैली रैली प्रदर्शन आदि तरीकों से सरकार के सामने रखने के लिए मसौदा बनाया गया तथा कार्यान्यवन के लिए दिशा तय किया गया। सन् 1990 से 2000 के दशक तक आम चंद्रवंशी परिवार के चौमुखी विकास हेतु एक योजना बनाई गयी।

सर्वप्रथम तिलक दहेज जैसी दानवी शक्ति से निपटने के लिए वर्ष 1998 में “चंद्रवंशी सामूहिक विवाह” का आयोजन बोधगया की पावन धरती के कालचक्र मैदान में प्रारंभ किया जिसमें आशातीत सफलता मिली और समाज के हर वर्ग द्वारा सराहा भी गया। महारैली, रैली, महासम्मेलन, सम्मेलन आदि के माध्यम से तत्कालीन सरकार को चंद्रवंशी एकता का एहसास भी कराया गया। परिणामस्वरूप हमारे बीच विधानसभा, विधान परिषद के टिकट राजनीतिक दलों से दिए गए। जिसका लाभ चंद्रवंशी परिवार को मिला। सन 2001 से 2006 तक महासभा ने प्रारंभ में अपनी एकता से झारखंड प्रदेश के सरकार को अपनी ताकत दिखाने का काम किया। साथ ही देवघर के महासम्मेलन की सफलता ने पूरे भारतवर्ष के जगह मसीह परिवार के सामाजिक राजनीतिक शैक्षणिक आर्थिक सांस्कृतिक दिवाली वो में विकास के सारे मार्ग खोल दिए थे। हमारी युवा शक्ति में एक नया जोश आया था। उनका मनोबल बढ़ा था। महासभा के प्रति उनमें सम्मान पैदा हुआ था।

भारत के केंद्रीय एवं प्रांतीय सरकारों एवं राजनीतिक दलों में हलचल पैदा हो गई थी कि चंद्रवंशी परिवार में एकता बनी है। यह अपने अधिकारों के लिए मरने-मारने को तैयार है। यदि इसका अधिकार इन्हें नहीं दिया गया तो छीनने में सक्षम है। इनके उत्थान का सारा वातावरण इनका केंद्रीय मंच अ०भा०च०अ० महासभा ने बनाया है, उसे नकारा नहीं जा सकता है। लेकिन अफसोस की बात रही है “देवघर” महासम्मेलन के प्रदर्शन के बाद हमारे बढ़ते कदम पर पुनः विराम लग गया। फलतः उसके बाद के बिहार एवं झारखंड प्रदेश में होने वाले चुनावों में हमें तरजीह नहीं दिया गया और समझा गया कि हमारी वो ताकत आज नहीं है। हम बिखरे हैं खंडो में विभाजित हैं। लेकिन ऐसी बात नहीं है। आज हमारी महासभा अपनी स्थापना के 100 वर्ष पार कर गई है। इस अवधि में महासभा के सामने अनेक बाधाएँ आयी, जिसे महासभा ने सफलतापूर्वक निपटाने से लेकर आज तक आने वाली बाधाएँं एवं संकटों में महासभा जूझते हुए निपटने का काम किया और विजयी होकर अपने लक्ष्य की प्राप्ति की ओर बढ़ती रही।

हमारा समाज देश के तमाम चंद्रवंशी परिवारों को यह विश्वास दिलाती है कि बुजुर्गों का आशीर्वाद, वयस्कों का कंधा से कंधा मिलाकर साथ एवं नौजवानों की कुर्बानी मिले तो दुनिया की कोई भी ताकत आगे बढ़ने से रोक नहीं सकता है। आज चंद्रवंशी समाज को पारदर्शी बनाना होगा। आर्थिक दृष्टिकोण से शक्तिशाली बनाना होगा। पदाधिकारियों, कार्यकर्ताओं एवं समर्थकों को व्यक्तिगत स्वार्थ त्यागना होगा। सामूहिक नेतृत्व में काम करने की आदत बनानी होगी। दलगत भावना को त्यागना होगा। युवाशक्तियों में सम्मान पैदा करके आगे लाना होगा। हर स्तर पर प्रशिक्षण शिविर लगाकर कार्यकर्ताओं एवं पदाधिकारियों को प्रशिक्षित करना होगा। वर्तमान के बुजुर्गों को आने वाली पीढ़ी के मार्ग प्रशस्त करने हेतु कुर्बानी देने के लिए तैयार रहना होगा।

आशा हैं कि चंद्रवंशी परिवार में एकता सद्भाव एवं प्रेम बढ़ाने का संदेश दिया हैं एवं चट्टानी एकता कायम रखने में सहायक सिद्ध होगा और विभिन्न प्रदेशों में विभिन्न उपनाम के साथ जीने वाले चंद्रवंसियों को जागरूक करने मे सहायक होगा।

Brief History of King of Magadh Jarasandh Maharaj jiJarasandha (जरासंध) was a great and powerful Chandravanshi king of M...
26/04/2019

Brief History of King of Magadh Jarasandh Maharaj ji

Jarasandha (जरासंध) was a great and powerful Chandravanshi king of Magadha. He was the son of a vedic king named Brihadratha. He was also a great devotee of Lord Shiva. He enmity with the Yadava clan in the Mahābhārata. There is a famous Jarasandha’s Akhara at Rajgir, Patna, Bihar where martial arts were practiced by Jarasandha.

जरासंध का जन्म

मगधदेश में बृहद्रथ नाम के राजा थे। उनकी दो पत्नियां थीं, लेकिन उन्हें कोई संतान नहीं थी। एक दिन संतान की चाह में राजा बृहद्रथ महात्मा चण्डकौशिक के पास गए और सेवा कर उन्हें संतुष्ट किया। प्रसन्न होकर महात्मा चण्डकौशिक ने उन्हें एक फल दिया और कहा कि ये फल अपनी पत्नी को खिला देना, इससे तुम्हें संतान की प्राप्ति होगी। राजा बृहद्रथ की दो पत्नियां थीं। राजा ने वह फल काटकर अपनी दोनों पत्नियों को खिला दिया। समय आने पर दोनों रानियों के गर्भ से शिशु के शरीर का एक-एक टुकड़ा पैदा हुआ। रानियों ने घबराकर शिशु के दोनों जीवित टुकड़ों को बाहर फेंक दिया। उसी समय वहां से एक ब्रह्मा के मानस पुत्री गुजर रही थी । उसका नाम जरा था। जब उसने जीवित शिशु के दो टुकड़ों को देखा तो अपनी माया से उन दोनों टुकड़ों को जोड़ दिया और वह शिशु एक हो गया। एक शरीर होते ही वह शिशु जोर-जोर से रोने लगा।

बालक की रोने की आवाज सुनकर दोनों रानियां बाहर निकली और उन्होंने उस बालक को गोद में ले लिया। राजा बृहद्रथ भी वहां आ गए और उन्होंने उस मानस पुत्री से उसका परिचय पूछा। मानस पुत्री ने राजा को सारी बात सच-सच बता दी। राजा बहुत खुश हुए और उन्होंने उस बालक का नाम जरासंध रख दिया क्योंकि उसे जरा नाम की मानस पुत्री ने संधित (जोड़ा) किया था।

महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित महाभारत ग्रंथ में अनेक महारथी व बलशाली राजाओं का वर्णन है। ऐसा ही एक महारथी राजा था जरासंध। उसके जन्म व मृत्यु की कथा भी बहुत ही रोचक है। जरासंध मगध (वर्तमान बिहार) का राजा था। वह अन्य राजाओं को हराकर अपने पहाड़ी किले में बंदी बना लेता था। जरासंध बहुत ही बाहुबली था/ भीम ने 13 दिन तक कुश्ती लड़ने के बाद जरासंध को पराजित कर उसका वध किया था।

Genealogy of Jarasandha

According to James Todd Kuru had two sons, Sudhanush and Pariksh*ta. The descendants of the former terminated with Jarasandha, whose capital was Rajagriha on the Ganges, in the province of Bihar. Rajgir is in Patna District.

Ancestry of Jarasandha as per Bhagavata Purana is as under:

Samvarana (+Tapati) → Kuru → Sudhana → Suhotra → Chyavana → Kriti → Uparichara Vasu → Vrihadratha → Jarasandha → Sahadeva → Somapi → Sruta Sravas

James Todd writes that Jarasandha was the monarch of Rajagriha,3 or Bihar, whose son Sahadeva, and grandson Marjari, are declared to have been contemporaries of the Mahabharata, and consequently coeval with Pariksh*ta, the Delhi sovereign.

कंस का ससुर था जरासंध

जरासंध मथुरा के राजा कंस का ससुर एवं परम मित्र था। उसकी दोनों पुत्रियों आसित व प्रापित का विवाह कंस से हुआ था। श्रीकृष्ण से कंस वध का प्रतिशोध लेने के लिए उसने 17 बार मथुरा पर चढ़ाई की, लेकिन हर बार उसे असफल होना पड़ा। जरासंध के प्रताप से अनेक राजा अपने राज्य छोड़ कर भाग गए थे। शिशुपाल जरासंध का सेनापति था।

100 राजाओं का करना चाहता था वध

जरासंध भगवान शंकर का परम भक्त था। उसने अपने पराक्रम से 86 राजाओं को बंदी बना लिया था। बंदी राजाओं को उसने पहाड़ी किले में कैद कर लिया था। जरासंध 100 को बंदी बनाकर उनकी बलि देना चाहता था, जिससे कि वह चक्रवर्ती सम्राट बन सके।

भीम ने ऐसे किया था जरासंध का वध

जरासंध का वध करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने योजना बनाई। योजना के अनुसार श्रीकृष्ण, भीम व अर्जुन ब्राह्मण का वेष बनाकर जरासंध के पास गए और उसे कुश्ती के लिए ललकारा। जरासंध समझ गया कि ये ब्राह्मण नहीं है। जरासंध के कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना वास्तविक परिचय दिया।

जरासंध ने भीम से कुश्ती लड़ने का निश्चय किया। राजा जरासंध और भीम का युद्ध कार्तिक कृष्ण प्रतिपदा से 13 दिन तक लगातार चलता रहा। युद्ध के नियम के अनुशार जरासंध को हराना बहुत मुश्किल था ना के बराबर/ इसलिए कृष्ण ने जरासंध को मरने का कूट नीति बनाई / चौदहवें दिन भीम ने श्रीकृष्ण का इशारा समझ कर जरासंध के शरीर के दो टुकड़े कर दिए।

जरासंध का वध कर भगवान श्रीकृष्ण ने उसकी कैद में जितने भी राजा थे, सबको आजाद कर दिया और कहा कि धर्मराज युधिष्ठिर चक्रवर्ती पद प्राप्त करने के लिए राजसूय यज्ञ करना चाहते हैं। आप लोग उनकी सहायता कीजिए। राजाओं ने श्रीकृष्ण का यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और धर्मराज युधिष्ठिर को अपना राजा मान लिया। भगवान श्रीकृष्ण ने जरासंध के पुत्र सहदेव को अभयदान देकर मगध का राजा बना दिया।

Kripya share kare🙏🙏

Address

5000 Years Old Jarasandha Akhara At Rajgir (Girivrajapura)
Rajgir
803116

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Chandravanshi Maharaj Jarasandh Akhara and Museum posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Contact The Organization

Send a message to Chandravanshi Maharaj Jarasandh Akhara and Museum:

Share

5000 years old Jarasandha Akhara and Museum at Rajgir (Girivrajapura)

Jarasandha (जरासंध) was a great and powerful Chandravanshi king of Magadha. He was the son of a vedic king named Brihadratha. He was also a great devotee of Lord Shiva. He enmity with the Yadava clan in the Mahābhārata. There is a famous Jarasandha’s Akhara at Rajgir, Patna, Bihar where martial arts were practiced by Jarasandha.

More details : https://bit.ly/2AbdjUo