Sujeet kumar jha

Sujeet kumar jha Fearless & Unbiased journalism unplugged.....

26/08/2026

बाढ़ के आगे बेबस इंसान

नेपाल में भोटेकोशी और त्रिशूली नदियों का रौद्र रूप तबाही की तस्वीर दिखा रहा है।
पहाड़ों से उतरता पानी अब बिहार की गंडक के लिए भी चिंता बढ़ा रहा है।
वाल्मीकिनगर से लेकर पश्चिम चंपारण और गंडक किनारे के इलाकों पर नजरें टिक गई हैं।
नदी का पानी बढ़ा तो खेत, घर और जनजीवन फिर सैलाब की चपेट में आ सकते हैं।
प्रकृति के इस प्रहार के सामने इंसान की सारी ताकत छोटी पड़ जाती है—बाढ़ के आगे सचमुच इंसान बेबस है।

आंदोलन जायज, लेकिन न्याय सबके लिएपटना में 70वीं बीपीएससी को रद्द करने की मांग को केवल छात्रों का दबाव कहकर खारिज नहीं कि...
25/08/2026

आंदोलन जायज, लेकिन न्याय सबके लिए

पटना में 70वीं बीपीएससी को रद्द करने की मांग को केवल छात्रों का दबाव कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। परीक्षा की निष्पक्षता को लेकर यदि अभ्यर्थियों के पास ठोस शिकायतें और प्रमाण हैं, तो सरकार को उनकी निष्पक्ष जांच करानी चाहिए। लेकिन दूसरी तरफ यह भी सच है कि 70वीं बीपीएससी की पूरी चयन प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और 2,027 अभ्यर्थियों का चयन हो चुका है। ऐसे में पूरी परीक्षा रद्द करने का फैसला हजारों परिवारों के भविष्य को प्रभावित करेगा।

झारखंड का हालिया उदाहरण इस बहस को और महत्वपूर्ण बनाता है। छात्रों के दबाव में सरकार ने जेपीएससी से जुड़ी कुछ परीक्षाओं और नियुक्तियों को रद्द करने का फैसला लिया, लेकिन झारखंड हाईकोर्ट ने 11वीं से 13वीं जेपीएससी से हुई नियुक्तियों को रद्द करने के सरकारी आदेश पर रोक लगा दी। अदालत का मूल सवाल यही था कि यदि कुछ लोगों पर गड़बड़ी का आरोप है तो बिना उचित कानूनी प्रक्रिया के सभी चयनित अभ्यर्थियों को दोषी कैसे माना जा सकता है?

बिहार में भी यही कसौटी लागू होनी चाहिए। छात्रों की मांग सुनना सरकार की जिम्मेदारी है, लेकिन सफल अभ्यर्थियों के अधिकारों की रक्षा करना भी सरकार और न्याय व्यवस्था की जिम्मेदारी है।

यदि 70वीं बीपीएससी में व्यापक धांधली के ठोस प्रमाण मिलते हैं तो परीक्षा रद्द करने जैसे कठोर कदम से भी पीछे नहीं हटना चाहिए। लेकिन केवल आरोप या आंदोलन के दबाव में पूरी परीक्षा रद्द करना उचित नहीं होगा। दोषियों की पहचान कर कार्रवाई करना और निर्दोष अभ्यर्थियों को बचाना ही न्याय का रास्ता है।

सरकार को चाहिए कि आंदोलनकारी छात्रों के प्रतिनिधियों के साथ बातचीत करे और किसी स्वतंत्र एजेंसी से समयबद्ध जांच कराए। जांच की रिपोर्ट सार्वजनिक हो और उसी के आधार पर फैसला लिया जाए।

युवाओं का आंदोलन व्यवस्था में भरोसे की कमी का संकेत है, लेकिन समाधान ऐसा होना चाहिए जिसमें आंदोलनकारी छात्रों को न्याय मिले और मेहनत से चयनित अभ्यर्थियों के साथ भी अन्याय न हो।

परीक्षा की निष्पक्षता जरूरी है, लेकिन न्याय का अर्थ यह नहीं कि एक गलती की आशंका में हजारों निर्दोषों को सजा दे दी जाए।

25/08/2026

Bihar में बड़ा सियासी बदलाव! Nishant Kumar को Deputy CM बनाने की चर्चा, क्या है वजह

अधिकारी की भाषा पर सरकार का जवाबअधिकारी का काम छात्रों के सवालों का जवाब देना है, उन्हें ताना मारना नहीं। बीपीएससी के पर...
24/08/2026

अधिकारी की भाषा पर सरकार का जवाब

अधिकारी का काम छात्रों के सवालों का जवाब देना है, उन्हें ताना मारना नहीं। बीपीएससी के परीक्षा नियंत्रक राजेश कुमार सिंह का आंदोलनकारी छात्रों के संदर्भ में “हाथी चले बाजार, कुत्ते भौंके हजार” कहना न सिर्फ अमर्यादित था, बल्कि उस संवेदनशील माहौल में छात्रों के जख्म पर नमक छिड़कने जैसा था।

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने मामले का संज्ञान लेकर निलंबन का आदेश देकर यह स्पष्ट किया है कि सरकार अधिकारियों की भाषा और व्यवहार को लेकर समझौता नहीं करेगी।

लेकिन असली सवाल निलंबन से आगे है। छात्र जिन परीक्षा संबंधी सवालों को लेकर सड़क पर हैं, उनका समाधान कब होगा? अधिकारी को निलंबित करना जरूरी हो सकता है, लेकिन छात्रों की शिकायतों की निष्पक्ष जांच उससे भी ज्यादा जरूरी है।

सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि बीपीएससी में सवाल पूछने वाले छात्रों को जवाब मिले, उपेक्षा नहीं; और शिकायत करने वालों को न्याय मिले, उपहास नहीं। यही सुशासन की असली परीक्षा है।

कैमरा सबके लिए एक जैसा क्यों नहीं?हाईवे पर लगे कैमरों से ओवरस्पीडिंग का चालान कटना अच्छी बात है। इससे सड़क पर अनुशासन आत...
24/08/2026

कैमरा सबके लिए एक जैसा क्यों नहीं?

हाईवे पर लगे कैमरों से ओवरस्पीडिंग का चालान कटना अच्छी बात है। इससे सड़क पर अनुशासन आता है और हादसों पर भी लगाम लग सकती है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह नियम सभी पर समान रूप से लागू होता है?

मोतिहारी से मुजफ्फरपुर जाने वाले NH-27 पर आम आदमी टोल टैक्स देता है। सड़क खाली हो, फिर भी निर्धारित स्पीड से थोड़ी भी अधिक गति हुई तो कैमरा गाड़ी की तस्वीर लेकर चालान भेज देता है। कई बार मोबाइल पर आए चालान में तस्वीर तो होती है, लेकिन उस समय गाड़ी की वास्तविक गति कितनी थी, यह साफ नहीं होता।

दूसरी ओर मंत्री, विधायक या सरकार के किसी महत्वपूर्ण पद पर बैठे व्यक्ति का काफिला इसी सड़क से गुजरता है। कई बार उनकी गाड़ियां काफी तेज गति से चलती दिखाई देती हैं। उन्हें निर्धारित नियमों के तहत टोल से छूट भी मिल सकती है। लेकिन क्या इसका मतलब यह भी है कि उनकी गति सीमा लागू नहीं होती?

अगर आम आदमी के लिए 80 की सीमा है तो VIP या सरकारी वाहन के लिए कितनी है? अगर उनकी गाड़ी भी निर्धारित सीमा से अधिक चलती है तो क्या कैमरा उसका चालान काटता है?

अगर काटता है तो बिहार सरकार को पिछले छह महीने का आंकड़ा सार्वजनिक करना चाहिए—

NH-27 के मोतिहारी-मुजफ्फरपुर खंड पर ओवरस्पीड के कितने चालान काटे गए? इनमें कितने VIP, मंत्री, विधायक और सरकारी वाहनों के थे? कितने चालानों का भुगतान हुआ?

और अगर एक भी VIP या सरकारी वाहन का चालान नहीं कटा तो इसका कारण भी सरकार को बताना चाहिए।

कैमरा मशीन है। उसे गाड़ी में बैठे व्यक्ति का पद, जाति या धर्म नहीं पता होना चाहिए। उसे सिर्फ गति पता होनी चाहिए या उसमे भी आरक्षण लागू है?

टोल देने वाले आम आदमी के लिए नियम और टोल से छूट पाने वाले VIP के लिए अलग नियम—यह सवाल सड़क सुरक्षा से ज्यादा कानून की समानता का है।

सरकार आंकड़े सार्वजनिक करे। इससे आरोप और आशंका दोनों खत्म हो जाएंगे।

कानून वही मजबूत होता है, जो सबके लिए एक जैसा दिखाई दे।

हर हर महादेव 🙏
24/08/2026

हर हर महादेव 🙏

23/08/2026
आरोप से पहले तथ्यराजनीति में आरोप लगाना आसान है, लेकिन पत्रकारिता का धर्म आरोप को तथ्य मान लेना नहीं, बल्कि दोनों के बीच...
23/08/2026

आरोप से पहले तथ्य

राजनीति में आरोप लगाना आसान है, लेकिन पत्रकारिता का धर्म आरोप को तथ्य मान लेना नहीं, बल्कि दोनों के बीच की दूरी को ईमानदारी से सामने रखना है। बिहार में कथित “डस्टबिन घोटाले” को लेकर पूर्व स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडे को जिस तरह कठघरे में खड़ा किया जा रहा है, उसमें सबसे पहले तथ्यों की पड़ताल जरूरी है।

उपलब्ध जानकारी के अनुसार विवाद से जुड़ा बीएमएसआईसीएल का मूल मेडिकल डिवाइस और कंज्यूमेबल्स टेंडर जून 2023 में जारी हुआ था। उस समय बिहार के स्वास्थ्य मंत्री तेजस्वी यादव थे। इसलिए केवल इस आधार पर मंगल पांडे को उस टेंडर के लिए जिम्मेदार ठहराना कि वे बाद में स्वास्थ्य मंत्री बने, तथ्य की कसौटी पर उचित नहीं ठहरता। यह जरूर देखा जाना चाहिए कि टेंडर, दर निर्धारण, वर्क ऑर्डर, सप्लाई और भुगतान की प्रक्रिया किस-किस समय और किसके कार्यकाल में हुई।

दूसरा बड़ा सवाल ₹15,490 की कीमत का है। यदि यह सामान्य डस्टबिन है तो कीमत निश्चित रूप से जांच का विषय है। लेकिन सरकारी पक्ष का दावा है कि यह अस्पतालों में मेडिकल वेस्ट के लिए इस्तेमाल होने वाला विशेष कंटेनर/सिस्टम का हिस्सा है। यदि ऐसा है तो इसकी तुलना बाजार के सामान्य डस्टबिन से करना उचित नहीं होगा। तुलना उसी स्पेसिफिकेशन वाले उत्पादों और समान सरकारी खरीद की दरों से होनी चाहिए।

यही इस पूरे विवाद की असली कसौटी है।

कितनी कंपनियों ने टेंडर में भाग लिया? किसे काम मिला? सबसे कम बोली कितनी थी? ₹15,490 की दर किस अधिकारी या समिति ने मंजूर की? कितनी मात्रा में खरीद हुई? कुल भुगतान कितना हुआ? क्या प्रतिस्पर्धी दरों की तुलना की गई? क्या सप्लाई ऑर्डर और पेमेंट भी उसी प्रक्रिया के तहत हुए?

इन सवालों के दस्तावेजी जवाब सामने आने के बाद ही यह तय किया जा सकता है कि मामला महंगी खरीद का है, प्रशासनिक चूक का है या वास्तव में भ्रष्टाचार का।

इसका अर्थ यह नहीं कि आरोपों को खारिज कर दिया जाए। यदि जांच में स्पेशिफिकेशन बदलने, प्रतिस्पर्धा सीमित करने, किसी खास आपूर्तिकर्ता को लाभ पहुंचाने या बाजार दर से असामान्य रूप से अधिक भुगतान के प्रमाण मिलते हैं, तो कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन जांच की मांग और दोष सिद्ध होने के बीच की रेखा नहीं मिटनी चाहिए।

पत्रकारिता का काम किसी नेता को बचाना नहीं है और न ही किसी नेता को बिना प्रमाण दोषी ठहराना। उसका काम है—दस्तावेज सामने रखना, सवाल पूछना और पाठक को निष्कर्ष तक पहुंचने देना।

आज सोशल मीडिया के दौर में एक राजनीतिक आरोप कुछ ही घंटों में “घोटाला” और फिर “साबित घोटाला” बन जाता है। ऐसे समय में पत्रकारिता की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। सनसनी से ज्यादा जरूरी सत्यापन है।

इसलिए सवाल पूछा जाना चाहिए, जांच भी होनी चाहिए और अगर गड़बड़ी मिले तो जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए। लेकिन जब तक प्रमाण सामने न आएं, ईमानदार पत्रकारिता को यही कहना चाहिए—

यह आरोप है, तथ्य अभी स्थापित नहीं हुआ है।

आरोप लगाइए, लेकिन प्रमाण के साथ। सवाल उठाइए, लेकिन दस्तावेज के साथ। क्योंकि पत्रकारिता की विश्वसनीयता किसी के पक्ष या विपक्ष में खड़े होने से नहीं, बल्कि तथ्य के पक्ष में खड़े होने से बचती है।

शिक्षा का कर्ज छोटा क्यों?बिहार में उच्च शिक्षा का सपना देखने वाले गरीब और मेधावी छात्रों के लिए स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड ...
22/08/2026

शिक्षा का कर्ज छोटा क्यों?

बिहार में उच्च शिक्षा का सपना देखने वाले गरीब और मेधावी छात्रों के लिए स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड कभी उम्मीद की बड़ी योजना थी। 2 अक्टूबर 2016 को शुरू हुई इस योजना के तहत छात्रों को उच्च शिक्षा के लिए ₹4 लाख तक का शिक्षा ऋण उपलब्ध कराने का प्रावधान था। इसका उद्देश्य साफ था—पैसे की कमी किसी प्रतिभाशाली छात्र की पढ़ाई के रास्ते में बाधा न बने।

लेकिन अब इस योजना की ऋण सीमा ₹4 लाख से घटाकर ₹2 लाख किए जाने की खबर ने गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सवाल यह है कि आज जब सामान्य उच्च शिक्षा की फीस, हॉस्टल और अन्य खर्च मिलाकर कई पाठ्यक्रमों की लागत लाखों रुपये है, तब ₹2 लाख में गरीब छात्र अपनी पढ़ाई कैसे पूरी करेगा?

हालांकि इस योजना के दूसरे पहलू पर भी ईमानदारी से विचार होना चाहिए। किसी भी सरकारी सहायता योजना की तरह स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड के दुरुपयोग की शिकायतों और आशंकाओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यदि कहीं पात्रता से बचने के लिए गलत दस्तावेज लगाए गए हों, शिक्षा के नाम पर ऋण लेकर उसका इस्तेमाल दूसरे काम में किया गया हो या ऐसे संस्थानों और पाठ्यक्रमों को ऋण दिया गया हो जिनकी गुणवत्ता संदिग्ध हो, तो इसकी जांच और जवाबदेही जरूरी है। सरकारी पैसे का दुरुपयोग रोकना उतना ही महत्वपूर्ण है जितना जरूरतमंद छात्रों तक पैसा पहुंचाना।

लेकिन दुरुपयोग रोकने का रास्ता पूरी योजना की ऋण सीमा घटाना नहीं हो सकता। सरकार को चाहिए कि वह पात्रता, संस्थान और पाठ्यक्रम की जांच मजबूत करे, राशि के उपयोग की निगरानी करे और जिन मामलों में गड़बड़ी मिले, वहां कड़ी कार्रवाई करे। कुछ मामलों की गड़बड़ी की कीमत सभी गरीब और ईमानदार छात्रों से वसूलना उचित नहीं होगा।

समस्या सिर्फ राशि घटने की भी नहीं है। पहले से छात्रों को समय पर राशि मिलने में दिक्कतों की शिकायतें रही हैं। ऐसे में योजना को आसान, तेज और अधिक सक्षम बनाने के बजाय उसकी आर्थिक सीमा कम करना गरीब विद्यार्थियों के लिए मुश्किलें बढ़ा सकता है।

सरकार यह तर्क दे सकती है कि ₹2 लाख से अधिक की जरूरत वाले छात्रों के लिए पीएम विद्यालक्ष्मी जैसी वैकल्पिक व्यवस्था उपलब्ध है। लेकिन सवाल यह है कि क्या हर गरीब छात्र उस व्यवस्था तक आसानी से पहुंच पाएगा? और क्या राज्य की अपनी योजना का उद्देश्य ही यही नहीं था कि आर्थिक रूप से कमजोर बिहार के छात्र बिना वित्तीय बाधा के उच्च शिक्षा हासिल कर सकें?

बिहार को आज उच्च शिक्षा में निवेश बढ़ाने की जरूरत है, घटाने की नहीं। यदि सरकार वास्तव में राज्य का सकल नामांकन अनुपात बढ़ाना चाहती है, तो शिक्षा ऋण की सीमा बढ़नी चाहिए, प्रक्रिया सरल होनी चाहिए और पैसा समय पर मिलना चाहिए। साथ ही योजना में पारदर्शिता और निगरानी की ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जिससे एक रुपये का भी दुरुपयोग न हो।

सरकार दूसरी योजनाओं में खर्च की प्राथमिकताओं पर पुनर्विचार कर सकती है, लेकिन शिक्षा पर खर्च को बोझ मानना दूरदर्शी नीति नहीं होगी। गरीब छात्र के हाथ में किताब और अवसर देने वाला कर्ज कम करना बचत नहीं, भविष्य की कीमत हो सकता है।

स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड को कमजोर करने के बजाय सरकार को इसे अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और प्रभावी बनाने पर विचार करना चाहिए। दुरुपयोग रोकिए, फर्जीवाड़े पर कार्रवाई कीजिए, लेकिन जरूरतमंद छात्र की जरूरत मत घटाइए। आखिर बिहार के प्रतिभाशाली युवाओं के सपनों की कीमत दो लाख रुपये तय नहीं की जा सकती।

Address

Patna
Patna
800001

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Sujeet kumar jha posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Shortcuts

Share

Category