23/08/2026
आरोप से पहले तथ्य
राजनीति में आरोप लगाना आसान है, लेकिन पत्रकारिता का धर्म आरोप को तथ्य मान लेना नहीं, बल्कि दोनों के बीच की दूरी को ईमानदारी से सामने रखना है। बिहार में कथित “डस्टबिन घोटाले” को लेकर पूर्व स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडे को जिस तरह कठघरे में खड़ा किया जा रहा है, उसमें सबसे पहले तथ्यों की पड़ताल जरूरी है।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार विवाद से जुड़ा बीएमएसआईसीएल का मूल मेडिकल डिवाइस और कंज्यूमेबल्स टेंडर जून 2023 में जारी हुआ था। उस समय बिहार के स्वास्थ्य मंत्री तेजस्वी यादव थे। इसलिए केवल इस आधार पर मंगल पांडे को उस टेंडर के लिए जिम्मेदार ठहराना कि वे बाद में स्वास्थ्य मंत्री बने, तथ्य की कसौटी पर उचित नहीं ठहरता। यह जरूर देखा जाना चाहिए कि टेंडर, दर निर्धारण, वर्क ऑर्डर, सप्लाई और भुगतान की प्रक्रिया किस-किस समय और किसके कार्यकाल में हुई।
दूसरा बड़ा सवाल ₹15,490 की कीमत का है। यदि यह सामान्य डस्टबिन है तो कीमत निश्चित रूप से जांच का विषय है। लेकिन सरकारी पक्ष का दावा है कि यह अस्पतालों में मेडिकल वेस्ट के लिए इस्तेमाल होने वाला विशेष कंटेनर/सिस्टम का हिस्सा है। यदि ऐसा है तो इसकी तुलना बाजार के सामान्य डस्टबिन से करना उचित नहीं होगा। तुलना उसी स्पेसिफिकेशन वाले उत्पादों और समान सरकारी खरीद की दरों से होनी चाहिए।
यही इस पूरे विवाद की असली कसौटी है।
कितनी कंपनियों ने टेंडर में भाग लिया? किसे काम मिला? सबसे कम बोली कितनी थी? ₹15,490 की दर किस अधिकारी या समिति ने मंजूर की? कितनी मात्रा में खरीद हुई? कुल भुगतान कितना हुआ? क्या प्रतिस्पर्धी दरों की तुलना की गई? क्या सप्लाई ऑर्डर और पेमेंट भी उसी प्रक्रिया के तहत हुए?
इन सवालों के दस्तावेजी जवाब सामने आने के बाद ही यह तय किया जा सकता है कि मामला महंगी खरीद का है, प्रशासनिक चूक का है या वास्तव में भ्रष्टाचार का।
इसका अर्थ यह नहीं कि आरोपों को खारिज कर दिया जाए। यदि जांच में स्पेशिफिकेशन बदलने, प्रतिस्पर्धा सीमित करने, किसी खास आपूर्तिकर्ता को लाभ पहुंचाने या बाजार दर से असामान्य रूप से अधिक भुगतान के प्रमाण मिलते हैं, तो कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन जांच की मांग और दोष सिद्ध होने के बीच की रेखा नहीं मिटनी चाहिए।
पत्रकारिता का काम किसी नेता को बचाना नहीं है और न ही किसी नेता को बिना प्रमाण दोषी ठहराना। उसका काम है—दस्तावेज सामने रखना, सवाल पूछना और पाठक को निष्कर्ष तक पहुंचने देना।
आज सोशल मीडिया के दौर में एक राजनीतिक आरोप कुछ ही घंटों में “घोटाला” और फिर “साबित घोटाला” बन जाता है। ऐसे समय में पत्रकारिता की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। सनसनी से ज्यादा जरूरी सत्यापन है।
इसलिए सवाल पूछा जाना चाहिए, जांच भी होनी चाहिए और अगर गड़बड़ी मिले तो जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए। लेकिन जब तक प्रमाण सामने न आएं, ईमानदार पत्रकारिता को यही कहना चाहिए—
यह आरोप है, तथ्य अभी स्थापित नहीं हुआ है।
आरोप लगाइए, लेकिन प्रमाण के साथ। सवाल उठाइए, लेकिन दस्तावेज के साथ। क्योंकि पत्रकारिता की विश्वसनीयता किसी के पक्ष या विपक्ष में खड़े होने से नहीं, बल्कि तथ्य के पक्ष में खड़े होने से बचती है।