26/12/2025
रात का सन्नाटा, पेट्रोल पंप की सफ़ेद रोशनी और उस रोशनी के नीचे बैठा एक नन्हा बच्चा, काग़ज़ पर झुका हुआ, किताबों में डूबा… पीछे खड़ी उसकी मां, थकी हुई आंखें, फटे हाथ, लेकिन हौसलों में ज़रा भी दरार नहीं। रांची में सामने आई ये तस्वीर किसी कहानी की नहीं, बल्कि उस सच्चाई की है जहां पति के निधन के बाद एक मज़दूर मां ने हालात से हार मानने के बजाय ज़िम्मेदारी को सीने से लगाया और ठान लिया कि “मैं सब संभाल लूंगी बेटा।” दिनभर मज़दूरी, रात को पेट्रोल पंप की रोशनी में बेटे की पढ़ाई, न बिजली का बिल, न कमरे की सुविधा, बस एक मां का सपना कि उसका बच्चा अंधेरे से बाहर निकले। इस तस्वीर में आंसू भी हैं, ग़रीबी भी है, सिस्टम की बेरुख़ी भी है, लेकिन सबसे ऊपर है एक मां का वो जज़्बा जो कहता है कि हालात कितने भी बेरहम हों, मां की हिम्मत उनसे कहीं ज़्यादा मजबूत होती है, यही वो मां है जो भविष्य गढ़ती है, यही वो तस्वीर है जो झकझोरती है, चुपचाप सवाल पूछती है और इंसानियत को आईना दिखा देती है।