31/08/2024
बीते कुछ वर्षों से बिहार के विद्युत उपभोक्ता प्रीपेड मीटरों के खिलाफ निरंतर संघर्ष कर रहे हैं। चाहे वह मांग-पत्र हो, नागरिक कन्वेंशन हो, धरना-प्रदर्शन हो, या फिर जन आंदोलन—हर मंच से इस अन्यायपूर्ण निर्णय का विरोध हो रहा है। लेकिन अफसोस की बात यह है कि राज्य सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी है।
यह कोई मामूली शिकायत नहीं है; प्रीपेड मीटरों के खिलाफ विरोध के पीछे ठोस तथ्य और अनुभवजन्य साक्ष्य हैं। हाल ही में हुई विभागीय जांच और विभिन्न अखबारों की रिपोर्टों ने इस बात की पुष्टि की है कि प्रीपेड मीटर, पुराने मीटरों की तुलना में, तेजी से यूनिट चलाते हैं। इस प्रकार, उपभोक्ताओं पर न केवल आर्थिक बोझ बढ़ रहा है, बल्कि उनके लिए बिजली का उपयोग भी कठिन हो गया है। सरकार द्वारा इसे "बनता बिहार - बढ़ता बिहार" के नाम पर लागू किया जा रहा है, लेकिन असलियत में यह गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों की जेब पर सीधा आघात है।
बिहार की आबादी का 51.91% हिस्सा गरीबी रेखा के नीचे जीवन-यापन करता है। ऐसे में प्रीपेड मीटरों की अनिवार्यता, जो उपभोक्ताओं को पहले से भुगतान करने पर मजबूर करती है, न केवल अन्यायपूर्ण है, बल्कि अमानवीय भी है। इस राज्य की जनता, जो पहले से ही राष्ट्रीय साक्षरता दर से काफी नीचे है, उस पर प्रीपेड मीटर के रिचार्ज की जवाबदेही डाल दी गई है। यह स्थिति अत्यंत निराशाजनक और दुर्भाग्यपूर्ण है।
इसी सामाजिक और आर्थिक शोषण के विरुद्ध आवाज उठाने के लिए "प्रीपेड मीटर हटाओ विद्युत उपभोक्ता मंच" का गठन किया गया है। यह मंच न केवल प्रीपेड मीटरों को हटाने के लिए प्रतिबद्ध है, बल्कि राज्यभर में विभिन्न जन संगठनों, नागरिक मंचों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं, और अन्य न्यायप्रिय जनता को संगठित कर एक व्यापक आंदोलन की शुरुआत कर चुका है। यह आंदोलन समयबद्ध और दृढ़ संकल्प के साथ सरकार के खिलाफ आर-पार की लड़ाई लड़ने का संकल्प लेकर चल रहा है।
इस संघर्ष का मुख्य उद्देश्य न केवल प्रीपेड मीटरों को हटाना है, बल्कि एक ऐसी व्यवस्था को स्थापित करना है जो सभी नागरिकों को सस्ती और सुलभ बिजली प्रदान कर सके। यह समय की मांग है कि सरकार जनता की आवाज को सुने और उनकी समस्याओं का समाधान करे, न कि उनकी जिंदगियों को और कठिन बनाए।
इसलिए, हम सभी से अपील करते हैं कि इस आंदोलन का हिस्सा बनें और एकजुट होकर सरकार पर दबाव डालें, ताकि प्रीपेड मीटरों को हटाया जा सके और जनता को उनके अधिकार वापस मिल सकें।